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जल संकट: पानी की कमी से जूझ रहे इस गाँव के लोग गर्मियों में नदी किनारे बना लेते हैं बसेरा

नर्मदा किनारे बसे मध्य प्रदेश के इस गाँव के ज्यादातर लोग पलायन कर चुके हैं, जो बचे हैं हर दिन पानी की समस्या से जूझ रहे हैं।

Akash PandeyAkash Pandey   23 March 2021 1:45 PM GMT

जल संकट: पानी की कमी से जूझ रहे इस गाँव के लोग गर्मियों में नदी किनारे बना लेते हैं बसेरामहिलाएं हर दिन डेढ़-दो किमी चलकर नदी का पानी लाने जाती हैं, उबड़ खाबड़ रास्ते में कई बार उन्हें चोट भी लग जाती है. सभी फोटो: आकाश पाण्डेय

देवरी माल, डिंडोरी (मध्य प्रदेश)। सुबह चार बजे ही गाँव के ज्यादातर लोग पानी के लिए नदी की ओर निकल जाते हैं और जब मई-जून में और ज्यादा गर्मी बढ़ जाती है तो नदी के किनारे ही लोग बसेरा बना लेते हैं। पानी की कमी की वजह से बहुत से लोग गाँव छोड़ कर जा चुके हैं।

ये मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले का देवरी माल गाँव है। यहां के जहांगीर धुरवे (32 वर्ष) गाँव कनेक्शन से बताते हैं, "चार बजे सुबह से ही हम लोग पानी के लिए नर्मदा की तरफ निकल जाते हैं। नहाने-धोने का तो छोड़िए यहाँ पीने तक के लिए पानी नहीं मिल पाता है इस कारण से इस गाँव के लगभग आधे लोग गाँव छोड़कर बाहर जा चुके हैं। अभी मई जून के महीने में जब ये धरती तपने लगती है तो गाँव के लोग मवेशी लेकर नर्मदा के किनारे ही अपना बसेरा बनाते हैं।"

देवरी माल गाँव के ही भूरा सिंह की उम्र साठ साल से ऊपर हो चुकी है। अपने कपड़े दिखाते हुए वो कहते हैं कि जब यहाँ पीने का ही पानी नहीं है तो अन्य कामों के लिए पानी तो रहने ही दीजिए।

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पानी लाने के लिए सुबह चार बजे जाना पड़ता है

अपने घर की चौखट पर बैठी बालमोहतिन चल नहीं सकती, बस लाचार होकर दरवाजे पर बैठकर आते-जाते लोगों को देखती रहती हैं। वो 11 साल पहले की उस घटना को याद करती हैं, जब वो कुएं में गिर गईं थीं, वो पानी भरने के लिए झुकीं और सीधे 25-30 फीट ने कुएं में गिर गईं। क्योंकि कुएं में पानी नहीं था तो वो सीधे पत्थर से टकराईं। उसके बाद जब उनकी आंख अस्पताल में खुली। बस उस दिन से वो कभी चल नहीं पायीं।

जिस गाँव की में बालमोहतिन रहती हैं (35 वर्ष) उस गाँव में लोग पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसते हैं। ये मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले का देवरी माल गाँव है। बाल मोहतिन उस दिन को वो याद करती हैं और आंखों में आंसू लिए आज भी कोसती हैं वो गाँव कनेक्शन से बताती हैं, "पति ने इलाज के लिए बहुत कर्ज भी लिया था, लेकिन आखिर में डॉक्टर ने कहा कि अब मैं चल-फिर नहीं सकती। उस दिन के बाद से मैं कहीं नहीं गईं, उसके बाद मायके तक नहीं जा सकी, जब कोई कभी गाड़ी लेकर आ जाता है तो चली जाती हूं लेकिन गरीब लोग कहाँ से गाड़ी बुक करेंगे।" बालमोहतिन के आंसू सिर्फ उनकी नहीं बल्कि पूरे गाँव के लाचारी के आंसू हैं।

नर्मदा नदी का गंदा पानी पीने को हैं मजबूर

पानी की कमी के कारण इस गाँव के लोग नर्मदा नदी का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। नर्मदा नदी से पानी लाना ही इनके लिए सबसे मुश्किल है क्योंकि नर्मदा भी इनके गाँव से डेढ़-दो किलोमीटर दूर हैं। यहां पर लोग सुबह चार बजे उठकर पानी पाने जाते हैं, सोमबाई (36 वर्ष) भी उन्हीं में से एक हैं। सोमबाई कहती हैं, "सुबह चार बजे उठ कर पानी लेने के लिए नर्मदा नदी जाते हैं, लेकिन वहां का रास्ता इतना पथरीला और खराब है कि रोज कोई ना कोई महिला गिरकर चोटिल होती है। चोट लगने के बाद लगभग बीस किलोमीटर दूर शहपुरा अस्पताल में आना पड़ता है। गाँव से यहाँ आने के लिए भी लगातार साधन नहीं मिलता है। अपने साधन से जाइए वरना सवारी गाड़ियां तो मुश्किल से ही मिलेंगी।"


इसी गाँव की कली बाई (60 वर्ष) कहती हैं कि इस गाँव में क्या समस्या नहीं है? दाना-पानी, लकड़ी, यातायात साधन, अस्पताल हर चीज की समस्या है। यहाँ पानी की कमी के कारण खेती नहीं होती है। अगर कोई नर्मदा से पानी लाने में चोटिल हो जाए तो वो खुद ही अपना इलाज कर लेते हैं क्योंकि अस्पताल बहुत दूर है और वहाँ तक जाने के लिए लगातार साधन भी नहीं मिलता है। एक बार सुबह गाड़ी जाती है तो शाम को लेकर वापस आती है।

पिछले साल की गर्मियों में कोरोनावायरस महामारी के बीच गांव कनेक्शन ने 23 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में कोविड-19 के असर को समझने के लिए एक सर्वे कराया। सर्वे में यह भी पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या ग्रामीण क्षेत्रों के घरों में पानी की नियमित ज़रूरतों के अलावा हाथ धोने के लिए पर्याप्त पानी है? लगभग 38 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि महामारी के समय पानी की अतिरिक्त ज़रूरतें पूरी करने के लिए महिलाओं को ज्यादा दूर तक जाना पड़ा।

पानी की कमी के कारण पलायन कर चुका है आधा गाँव

गाँव के अनूप सिंह सय्याम (40 वर्ष) एक घटना का जिक्र करते हुए कहते हैं, "गाँव का ही एक आदमी कुएं से पानी निकाल रहा था, उस दौरान उसने अपने पीठ पर अपना बच्चा बांधा था। पानी भरते समय अचानक वो बच्चा आगे की तरफ कुएं में गिरा और वहीं उसकी मौत हो गई। ये घटना तकरीबन सात-आठ साल पुरानी है। पानी की कमी से गाँव में पलायन हो रहा है। गाँव की जनसंख्या 669 है लेकिन अभी गाँव में लगभग तीन-साढ़े तीन सौ लोग ही बचे हैं। वो कहते हैं कि हर जगह गए, अर्जी दिए लेकिन कुछ नहीं हुआ। बोरिंग कराए तो वहां भी पानी नहीं निकला।"

मध्य प्रदेश में 2011 की जनगणना के हिसाब से मात्र 13 प्रतिशत लोगों के पास ही अपने घर के अंदर पानी की सुविधा है। 50% प्रतिशत लोग के आस-पास पानी की व्यवस्था है वो वहां से पानी लाते हैं। यानि गांव में कुएं या हैंडपंप से पानी लाने वालों की संख्या 50% है जबकि लगभग 36% लोगों को आज भी पानी के लिए दूर-दूर जाना पड़ता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक डिंडोरी जिले के 33% लोग कुएं से और लगभग 54% लोग बोरिंग, ट्यूबेल और हैंडपंप से पानी पीते हैं। इसके अलावा क्या स्रोत बचते हैं? लेकिन इसके अलावा भी अन्य स्रोतों से तकरीबन 6% लोग पानी लेते हैं। ये 6% लोग नदियों का, नहरों, नालों का गंदा पानी उपयोग करते हैं। यहां पानी की गुणवत्ता बहुत ही खराब है।


नई बहुएं भी छोड़ देती हैं गांव-घर

देवरी माल गांव की ही रहने वाली फुलवती बाई ऊईके (47 वर्ष) कहती हैं कि पानी कि समस्या इतनी बड़ी है कि कई लड़किया जो शादी करके यहाँ आती हैं वो छोड़कर चली जाती हैं, कई उसी तरह झेल रही हैं। शांति बाई सैय्याम से जब हमने पूछा कि क्या ये सच है कि नई बहुएं शादी करके आती हैं तो पानी की दिक्कत के कारण छोड़कर चली जाती हैं तो बस उन्होंने कहा कि कुछ झेल रही हैं वरना जो नहीं झेल पाती हैं वो चली जाती हैं।

सीएजी की अगस्त 2018 में संसद में पेश की गई एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार, 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) के अपने प्रमुख, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के लक्ष्य को पूरा करने में असफल रही है। इस कार्यक्रम के तहत, सरकार ने सभी ग्रामीण बस्तियों, सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ियों तक साफ़ पानी पहुंचाने की घोषणा की थी, और 50 फीसदी ग्रामीण आबादी तक पीने योग्य पानी पहुंचाने का भी लक्ष्य था। इसके अलावा वर्ष 2017 तक 35 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को घरेलू कनेक्शन भी दिया जाना था। हालांकि सीएजी की रिपोर्ट में बताया गया कि दिसंबर 2017 तक केवल 18 फीसदी ग्रामीण आबादी को ही नल से पीने योग्य पानी (प्रतिदिन 55 लीटर प्रति व्यक्ति) उपलब्ध कराया जा सका, जबकि 17 फीसदी ग्रामीण परिवारों के पास घरेलू कनेक्शन थे।

नर्मदा नदी के सहारे ही गाँव वाले रह रहे हैं

नहीं टिकते एक साल से ज्यादा मवेशी

अर्जुन बताते हैं कि पानी की समस्या सिर्फ हम इंसान ही नहीं झेल रहे बल्कि ये जानवर भी झेल रहे हैं। पानी की कमी के कारण और सूखे के कारण यहां जानवरों के लिए चारा तक ठीक से नहीं हो पाता। जानवर चारे की तलाश में नर्मदा के किनारे लगातार भटकते रहते हैं। बारिश के मौसम में जो चारा हो जाता है वही जानवर खाते हैं गर्मियों में तो चारा बचता ही नहीं है। लगभग हर साल जानवर मर जाते हैं और हमें नया जानवर खरीदना पड़ता है। मवेशियों के लिए यहां कुछ भी नहीं है। हम हर साल मवेशी खरीदते हैं ताकि खेतीबाड़ी थोड़ी बहुत जो बरसात के समय खेती कर सकें। हमारी खेती के साधन भी मवेशी ही हैं लेकिन दुर्भाग्य कि चारा -पानी के अभाव में हमारे मवेशी मर जाते हैं और हम कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। मवेशियों की दिक्कत का अंदाजा इसी बात से लगाइए कि ढंग से खुराक ना मिल पाने के कारण मवेशी दूध भी नहीं दे पाते और हमारे बच्चे दूध-दही के लिए तरसते रह जाते हैं।

शहपुरा ब्लॉक के आंकड़े

शहपुरा की बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार ब्लॉक के 200 गांवों में से 190 गाँवों में टैप वॉटर नहीं पहुंचा है, जबकि 21 गांवों में हैंडपंप तक नहीं है। गाँव कनेक्शन ने इस पर बात करने के लिए यहां के अधिकारियों से भी संपर्क करने की कोशिश की लेकिन संपर्क नहीं हो पाया।

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