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एक युवा किसान, ऑर्गेनिक खेती और हर साल 40 करोड़ का कारोबार

महज चार एकड़ से आर्गेनिक खेती शुरू करने वाले बरेली के युवा किसान निहाल सिंह अकेले आर्गेनिक मेंथा का पिछले साल 35 करोड़ का कारोबार किया। 3000 किसानों को ट्रेनिंग से लेकर बाजार उपलब्ध कराते हैं निहाल सिंह

Manish MishraManish Mishra   12 March 2020 8:58 AM GMT

आंवला (बरेली)। जहां एक ओर किसान मुनाफे के लिए अंधाधुंध रासायनिक खादें और कीटनाशक का उपयोग करते हैं, वहीं एक युवा किसान आर्गेनिक खेती से हर साल 40 करोड़ का व्यापार करता है।

इस युवा किसान का मानना है कि अगर खाना शुद्ध होगा तो शरीर शुद्ध होगा, शरीर में विकारों से विचारों में विकार आते हैं, और इसके बाद समाज भी विकृत ही होगा।

बरेली से करीब 40 किमी दूर आंवला में करीब 60 गाँवों के 3000 किसानों को आर्गेनिक खेती सिखाकर उनका माल अपनी कंपनी के जरिए अमेरिका और जर्मनी एक्सपोर्ट करने वाले निहाल सिंह के लिए यह सब आसान नहीं था।

आए दिन किसानों की आत्महत्या और बेकारी की खबरों के बीच निहाल सिंह के माता-पिता उन्हें किसान नहीं बनने देना चाहते थे। निहाल सिंह ने नौकरी की, पर दिल नहीं लगा और जैविक खेती करने की ठान ली।

"मेरा पूरा समर्पण जैविक खेती के लिए है। हमने कुछ स्पेशल नहीं किया बस उसी पुरानी पद्धति में जो हमारे पूर्वज करते थे, उसमें थोड़ा अध्ययन किया और जैविक खेती में लागू किया," निहाल सिंह बताते हैं, "जो पहले खराब हो चुका है उसे सुधारने के लिए काम किया। जिससे पहले हम शिखर पर थे उन कारणों का भी अध्ययन किया।"

निहाल सिंह अपने खेती में किए गए प्रयोगों के बारे में बताते हैं, "एग्रीकल्चर को लोग सिर्फ खेती ही मान लेते हैं, जबकि 'कल्चर' एक पद्धति है, इसे हम लोग भूल सा गए हैं। हम पहले विश्वगुरू कृषि की ही बदौलत थे, लेकिन आज खेती को निम्न दर्जे का माना जाने लगा।"

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी की नौकरी को छोड़ कर खेती करने के अपने प्रयोग के बारे में जब निहाल सिंह ने अपने माता-पिता को बताया तो शुरुआत में किसी को यह अच्छा नहीं लगा, लेकिन निहाल अपने माता-पिता को समझाने में सफल रहे और जैविक पद्धति से खेती करने की ठान ली।

विदेशी मेहमान और ग्राहक निहाल सिंह के खेतों पर उनकी खेती की पद्धति को जानने पहुंचते रहते हैं।

जैविक मेंथा की खेती से लेकर खाने पीने की चीजें जैविक तरीके से कैसे उगाएं इसके लिए उन्होंने किसानों को ट्रेनिंग देना शुरु किया। "पहले किसानों को समझाया कि जैविक खेती क्यूं जरूरी है? कम से कम आगे की पीढ़ी को खेती लायक ज़मीन तो दी जा सके," निहाल सिंह बताते हैं, "अगर खाना शुद्ध नहीं होगा तो शरीर शुद्ध नहीं होगा, शरीर में विकार से विचारों में विकार आएंगे, और समाज भी एक विकार युक्त हो जाएगा।"

"हमने किसानों से आर्गेनिक उत्पाद पैदा कराए और जो आर्गेनिक खाना चाहते थे उन तक पहुंचाया। विदेशी कस्टमर को शुद्ध खाना, तो किसानों को बाजार उपलब्ध कराया," अपने आर्गेनिक मेंथा के खेत की मेड़ पर खड़े निहाल सिंह ने बताया।

अपनी जैविक खेती के मिशन को पूरा करने के लिए किसान निहाल सिंह का सफर आसान नहीं था। अपने दूर के खेतों में जाने और किसानों की ट्रेनिंग के लिए निहाल सिंह ने एक पुरानी मोटरसाइकिल ली और एक ड्राइवर रखा, कुछ दिन तक तो ड्राइवर ने साथ दिया लेकिन पैसों की तंगी के चलते ड्राइवर को हटाना पड़ गया, और धीरे-धीरे खुद ही मोटरसाइकिल चलानी शुरू की दी।


चार एकड़ खेत से खेती शुरु करने वाले निहाल सिंह आज अपनी काली चमचमाती गाड़ी में बैठे-बैठे हल्की सी मुस्कान लिए कहते हैं, "मुझे आज भी कार ड्राइव करना नहीं आता, मैंने सीखने की ललक भी नहीं रखी।"

निहाल सिंह जैविक खेती के प्रयोग के साथ-साथ विदेशों में उपयोग होने वाली नई तकनीक से अपने किसानों को रूबरू कराते रहते हैं, वहां प्रयोग होने वाली कृषि यंत्रों को अपने यहां आयात करके उनका प्रयोग करते हैं। साथ ही, पुराने समय में उपयोग होने वाली पत्थर की चाक आदि का भी प्रयोक करके अनाज की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कार्य भी करते हैं।

बरेली के आंवला के एक गाँव में मेंथा का तेल निकालने वाली एक बड़ी सी फैक्ट्री को दिखाते हुए निहाल सिंह बताते हैं, "प्रोसेसिंग तो हम फैक्ट्री में करते हैं, लेकिन हमारी विशेषता उत्पादन की है, तो अधिक कार्य उत्पादन पर कर रहे हैं। किसानों की आय बढ़ाने के लिए सबसे अच्छा है कि उनकी उत्पादन लागत कम करके और कृषि उत्पाद की गुणवत्ता पर कार्य किया जाए।"

किसानों के उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने के साथ ही बेहतर मूल्य दिलाने के प्रयासों के बारे में निहाल सिंह बताते हैं, "चूंकि मैं किसान परिवार से था तो किसानों की सभी चुनौतियों को भली भांति जानता था। उनके समाधान खुद से निकाले," वह आगे कहते हैं, "हम वैल्यू पर काम करते हैं, मार्केट से अधिक रेट पर उत्पाद किसानों से खरीदे। जैसे पिछले साल मेंथा का रेट 1250 रुपये था, लेकिन हमने 1391 दिया, क्यूंकि हमने गुणा-भाग लगाया तो निकला कि इसके नीचे मूल्य देंगे तो किसान का नुकसान है।"

अपने खेतों में विदेशी मेहमानों से किसानों को मिलवाते निहाल सिंह।

आज हर साल 35 करोड़ रुपये का अकेले आर्गेनिक मेंथा का एक्सपोर्ट करने वाली निहाल सिंह की कंपनी 'पवित्र मेंथा' के साथ 3000 किसान जुड़े हुए हैं। शुरुआत में किसानों को घाटा हुआ तो निहाल सिंह को खुद से पूरा करना पड़ा, लेकिन हार नहीं मानी। "हमारे पास मार्केटिंग का विभाग नहीं है, अमेरिका और जर्मनी के ग्राहक सीधे आकर मिले," किसान निहाल सिंह ने बताया।

किसान परिवारों का दर्द करीब से महसूस करने वाले निहाल सिंह बताते हैं, "मैं पढ़ने में अच्छा था, जब मैं छोटा था तो माता जी एक प्राइमरी टीचर को दिखाते हुए हमेशा कहतीं-बेटा एक दिन तू ऐसे ही प्राइमरी टीचर बनना। पिता जी भी कहते थे कि बेटा हम तुम्हें इसलिए पढ़ा रहे हैं कि आगे इस मिट्टी में न लोटो, हमने अपनी पूरी ज़िंदगी इसमें बिता दी।"

निहाल सिंह आज किसान जरूर हैं और देश की मिट्टी से प्यार भी है, लेकिन आर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों की यात्रा लगातार करते रहते हैं।

कैसे करते हैं आर्गेनिक मेंथा का कारोबार

किसान निहाल सिंह की कंपनी 'पवित्र मेंथा' ने वर्ष 2019 में कुल 40 करोड़ रुपये का कारोबार किया। इसमें से 35 करोड़ का कारोबार केवल आर्गेनिक मेंथा का रहा।

आर्गेनिक मेंथा की खेती और निर्यात के बारे में निहाल सिंह कहते हैं, "अभी मेंथा के कारोबार में धोखाधड़ी बहुत शुरू हो गई है, आज सिंथेटिक मेंथा का कारोबार ओरेजिनल मेंथ से ज्यादा है। आर्गेनिक की जरूरत ही तब पड़ी जब लोगों ने धोखाधड़ी शुरू कर दी। अब तो सिंथेटिक मेंथा भी आ गया है। जो लोग मेंथा ऑयल से अपना उत्पाद बनाते हैं वो आर्गेनिक मेंथा को तरजीह दे रहे हैं।"

अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों को आर्गेनिक मेंथा के एक्सपोर्ट के बारे में निहाल सिंह बताते हैं, "सारा मेंथा खाने वाली चीजों में जा रहा है। आर्गेनिक मेंथा कास्मेटिक या दवाइयों में जाता है, अगर केमिकल हैं तो बहुत खतरनाक होते हैं, स्किन को नुकशान पहुंचाते हैं तो फायदा नहीं होता है, सुगंध का भी असर होता है, आर्गेनिक वाले का थोड़ा अच्छा रहता है।"


"आर्गेनिक मेंथा में दिक्कत क्या है कि लोग सही तरह से समझ नहीं पा रहे। इंसेक्ट (कीट) लगते हैं बीमारी ज्यादा नहीं लगती। अगर क्राप प्रोटेक्शन (फसल का बचाव) सही रखेंगे तो कीट नहीं लगेंगे। यही हम अपने किसानों को सिखाते हैं," निहाल समझाते हैं।

निहाल अपने साथ काम कर रहे किसानों को वर्मी कम्पोस्ट आदि बनाने की ट्रेनिंग देकर उनकी यूनिट लगाने में मदद करते हैं। जिससे रासायनिक खाद की खपत कम हो और लोगों का पैसा बचे।

मिट्टी की सेहत को सुधारने के लिए निहाल कहते हैं, "कुछ कठोर निर्णय लेने होंगे, पिछली दो पीढ़ियों से केमिकल की लत पड़ गई है, जब तक केमिकल नहीं हटेगा हमारी फसलों से, तो जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानक हैं हम पूरे नहीं कर पाएंगे।

फर्जी आंकड़ों पर बनती हैं देश की कृषि योजनाएं

"हम उत्पादन में निपुण हैं, हमारे पास युवा है, ऊर्जा है। ब्रिटानिया हमारा गेहूं 150 रुपये किलो बेच रहा है, 100 ग्राम गेहूं लगा के मैकडोनॉल्ड 400 रुपये का पिज्जा बेचता है। जबकि इससे किसान को कितना मिलता है? सरकार इन कंपनियों से कहे कि आर्गेनिक किसान से अच्छे रेट पर खरीदें, इससे क्वालिटी भी सुधरेगी, और किसानों को भी फायदा होगा," निहाल सिंह कहते हैं।

आर्गेनिक का मार्केट न होने से किसान कैसे इसकी भरपाई करे इस पर निहाल सिंह कहते हैं, "भ्रष्टाचार ने बहुत सारी चीजों को निगल लिया है। भ्रष्ट वो लोग हैं जिन्हें जो जिम्मेदारी दी गई वो स्वार्थ बस ईमानदारी से काम नहीं किया। जिन्हें जिम्मेदारी दी गई कि देश की खेती को आगे बढ़ाना है, उन लोगों ने बीज और कीटनाशक कंपनियों को आगे बढ़ाया, जबकि देश पीछे चला गया। पेस्टीसाइड कंपनी का उत्थान हुआ, किसान नीचे आ गया।"

"देखिए, कई चीजों से लड़ा हूं, युवा के लिए रास्ता ही नहीं दिया जा रहा। हर जगह अदृश्य रुकावटें हैं, जब वह जाता है तो सामने वाला जिम्मेदार अधिकारी काम नहीं कर रहा, और तनख्वाह भी ले रहा है। अब उसके सामने दो ही रास्ते बचते हैं, या तो क्राइम या अवसाद।"

बरेली के आंवला में निहाल सिंह के इस सेंटर पर युवाओं और किसानों को जैविक खेती के गुर सिखाए जाते हैं।

'संभावनाओं से डर कर किसान अधिक करते हैं खर्च'

किसानों को सलाह देते हुए निहाल सिंह करते हैं, "किसान आगे की संभावनाओं से डरकर ज्यादा खर्च करता है। किसान भाइयों से कहूंगा कि खेती पेड़, पौधों और जैविक चीजों का प्रयोग है, उसमें पौधों जंतुओं और सूक्ष्म जीवों का काम है, अगर इसमें रसायन का इस्तेमाल करेंगे तो रिजल्ट हमेशा भयावह आएंगे।"

निहाल आगे कहते हैं, "किसानों के मित्र कीट और जीव बहुत सारे होते हैं, लेकिन हमने उन्हें दुश्मन कीटों के चक्कर में मार दिया। किसान ज्यादा से ज्यादा देसी हरी या आर्गेनिक खाद का प्रयोग करें। किसान यह जरूर सोचें कि जो दवाई और केमिकल हम डाल रहे हैं, वह आगे तक के लिए कितना भयावह होगा।"

किसानी को सम्मान देकर युवाओं को जोड़ सकते हैं

"खेती में बहुत सी चुनौतियां हैं, किसान की तरफ कोई भी नहीं देख रहा है। सबसे बड़ी बात किसान को सम्मान नहीं मिल रहा। युवा सम्मान पाना चाहता है, जो उसका हक है। समाज में यहां तक है कि अगर किसान अच्छा पैसा कमाता भी है तो भी लोग अपनी बेटी की शादी किसी नौकरी पेशा से ही करना पसंद करते हैं। रोटी के बिना कोई जिंदा रह सकता, तो यह मेरी नजर में दिव्य कार्य है। इसके लिए समाज को आगे आना पड़ेगा," निहाल सिंह कहते हैं।

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