अमृतसर की मशहूर पीतल क्राफ्ट कला को पुनर्जीवित कर रहे दिल्ली के युवा छात्र

ठठेरों की विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी इस कला को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2014 में यूनेस्को ने कल्चर हेरीटेज सूची में शामिल किया था। ये देश का पहला और इकलौता क्राफ्ट है, जिसे यूनेस्को की लिस्ट में शामिल किया गया था।

अमृतसर की मशहूर पीतल क्राफ्ट कला को पुनर्जीवित कर रहे दिल्ली के युवा छात्र

लखनऊ। पंजाब में जांडियाला गुरु के ठठेरों की क्राफ्ट कला को पुनर्जीवित कर वैश्विक पटल पर पहुंचाने के लिए दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स दिल्ली के युवा छात्र आगे आए हैं। ये छात्र पीतल और तांबे के बर्तनों की इन्हें आधुनिक डिजायन बनाना सिखा रहे हैं, जिससे इनके बनाए बर्तनों के बाजार में वैश्विक स्तर पर मांग बढ़े और इन्हें उसका वाजिब दाम मिल सके।

ठठेरों की विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी इस कला को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2014 में यूनेस्को ने कल्चर हेरीटेज सूची में शामिल किया था। ये देश का पहला और इकलौता क्राफ्ट है, जिसे यूनेस्को की लिस्ट में शामिल किया गया था। इस कला को विश्व स्तर पर पहचान मिलने के बाद जब सरकार का इस तरफ ध्यान नहीं गया तब इसे संजोने और पुनर्जीवित रखने के लिए 'पीतल' प्रोजेक्ट के तहत श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के छात्रों ने जीतोड़ मेहनत की। वर्ष 2017 में इस कला को पुनः यूनेस्को की लिस्ट में शामिल किया गया।


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अमृतसर जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर जांडियाला गुरु नाम का एक प्रसिद्ध कस्बा है जो देश में ठठेरों द्वारा हाथ से बने तांबे और पीतल के बर्तनो के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ हाथ से बर्तन बनाने वाले कारीगर सदियों से पीतल और तांबे के बर्तन बनाते आये हैं। बदलते परिवेश के साथ जैसे-जैसे इन बर्तनों की मांग कम होने लगी वैसे-वैसे ठठेरा समुदाय इस कला से दूर होता गया। जो संख्या पहले 500 थी अब वो गिनी चुनी ही बची है।

'पीतल' प्रोजेक्ट की कोशिश है कि महाराजा रंजीत सिंह के शासनकाल में अस्तित्व में आई ठठेरा कला कभी विलुप्त न हो। इसलिए ये छात्र चाहते हैं कि इनके बनाए बर्तनों का जोर-शोर से प्रचार-प्रसार हो और आज की युवा पीढी इसे खरीदे। जिससे इस विलुप्त हो चुकी धरोहर को पुनर्जीवित कर वैश्विक स्तर पर पुन: पहचान दिलाई जा सके।

जून 2017 में इन छात्रों ने 'ठठेरों के साथ रिसर्च करना शुरू किया और ये जानने की कोशिश की कि आखिर ये अपनी पुश्तैनी कला को क्यों छोड़ रहे हैं। इन छात्रों ने इस काम को 'पीतल'(पंजाब ठठेरा आर्ट लेगेसी) नाम दिया। तीन महीने में 'पीतल'ग्रुप के छात्रों की मेहनत रंग लाई। इन छात्रों ने अपने स्तर पर और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से अगस्त 2017 में इन ठठेरों की पुश्तैनी कला के 28 नई डिजायनों के साथ बाजार में उतारा। कुछ ऑनलाइन साइट्स, प्रदर्शनीय, स्थानीय दुकानों पर इनके बनाए हाथ के पीतल और तांबे के बर्तनों की मांग बढ़ने लगी, इन्हें इनके सामान का वाजिब पैसा मिलना शुरू हो गया। पर अभी भी ये टीम इन ठठेरों के बनाए बर्तनों के बाजार के लिए जद्दोजहद में जुटी हुई है। अगर जल्द ही सरकार का इस तरफ ध्यान नहीं गया तो अभी भी इस कला को बचाना इन छात्रों के लिए चुनौती बना हुआ है।

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"हमारा मकसद ठठेरों की इस कला को बचाने के साथ ही भारत के गौरव को भी बचाना है। हम इन ठठेरों को बिचौलियों से मुक्त करके इन्हें सीधे बाजार से जोड़ना चाहते हैं, जिससे इन्हें इनकी मेहनत का सही मेहनताना मिल सके।" अर्जुन गोयल ने बताया, "रिसर्च के दौरान ये निकलकर आया कि ये बिचौलियों से परेशान हैं दूसरा इस नये जमाने में इनके बनाए बर्तन लोग खरीदना नहीं चाहते। इन दोनों बातों का ध्यान रखकर हमने इन्हें सीधे बाजार से जोड़ने की कोशिश की। इन्हें आधुनिक डिजायने सिखाकर आज की युवा पीढ़ी को इसे खरीदने के लिए प्रेरित किया।" अर्जुन गोयल थर्ड ईयर के छात्र है और इस प्रोजेक्ट के पूर्व टीम लीडर हैं।

जांडियाला गुरु के एक बर्तन कारीगर गौरव सूरी (26 वर्ष) ने गाँव कनेक्शन संवाददाता को फोन पर बताया, "एक साल से बर्तन बनाने का काम फिर से शुरू किया है, पहले ये काम हमारे पिता जी करते थे। अब हमें अपना माल बेचने के लिए बिचौलियों का सामना नहीं करना पड़ता। बर्तन बेचकर महीने के आराम से तीस हजार रुपए कमा लेता हूँ जिससे परिवार का खर्चा चल जाता है।" ये ठठेरा समुदाय से वही गौरव सूरी हैं जो एक साल पहले घर से कई किलोमीटर दूर कम्बल बनाने की फैक्ट्री में काम करते थे। जहाँ इन्हें महीने के 10-12 हजार रुपए मिलते। किराया निकलने के बाद पांच-छह हजार ही बचा पाते जिससे इनके परिवार का खर्चा चलना बहुत मुश्किल हो रहा था। इनके हाथों में बर्तन बनाने का हुनर तो था पर भाव न मिलने की वजह से ये अपनी पुश्तैनी कला को पिता के देहांत के बड़ा छोड़ चुके थे।


श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स दिल्ली के 'एनक्टस' टीम के 46 छात्रों ने जून 2017 से जब यहां काम करना शुरू किया तब यहाँ सिर्फ 30 परिवार ही बचे थे। जिसमें से गिने चुने लोग ही बर्तन बनाने का काम करते थे। इनसे बातचीत करने के बाद इस समुदाय से गौरव जैसे 11 लोग इस काम को करने के लिए पुनः तैयार हुए। ये 11 लोग एक साथ मिलकर काम कर सकें इसके लिए इस टीम ने इनका स्वयं सहायता समूह बनाया। गौरव ने इस पुश्तैनी कला को विलुप्त होने की वजह बताई, "जिसके भी पूर्वज मर जाते उसके घर पर बर्तन बनाने का काम बंद हो जाता क्योंकि नये लड़के इस काम में आना नहीं चाहते। नये जमाने में न तो इन बर्तनों की मांग है और न ही कोई इसका सही भाव दे पाता। जबसे ये लोग मिल गये हैं तबसे हम बहुत नई डिजायन बनाना सीख गये हैं। अब बाहरी लोग हमारी नई डिजायन हमसे सीधे खरीदकर ले जाते हैं और हमें सही पैसा देते हैं।"

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'एनक्टस' स्टूडेंट इन फ्री एंटरप्राइज़ (एसआईएफई) के रूप में जाना जाता है। ये छात्रों का एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है। जो 39 देशों में 1600 से अधिक विश्वविद्यालयों में 67,000 छात्रों से सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है। 'एनक्टस' से जुड़े छात्रों का मुख्य उद्देश्य है जरुरतमंद लोगों के जीवन को बदलना और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त कर आत्मनिर्भर बनाना। इसमें छात्र अलग-अलग क्षेत्र और जरूरत के हिसाब प्रोजेक्ट शुरू करते हैं। श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) भारत में वाणिज्य और अर्थशास्त्र में उच्च अध्ययन के लिए एक प्रमुख संस्थान है। 'एनक्टस' वर्ष 2007 में श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में आया। इसमें अबतक सामाजिक उद्यमिता की 14 परियोजनाएं शुरू की गईं। जिसमें 11 को सफलतापूर्वक पूरा किया गया। तीन परियोजना असबा, विरासत और किसान बाजार अभी जारी हैं। विरासत के तहत पीतल प्रोजेक्ट आता है जिस पर अभी ठठेरों के साथ काम चल रहा है। इस दौरान समुदाय में 344 परिवारों पर सीधा प्रभाव पड़ा है जबकि 650 लोगों पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ा।


'एनक्टस' की फैकल्टी एडवाईजर एवम श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ प्रियंका भाटिया ने गाँव कनेक्शन संवाददाता को फोन पर बताया, "कालेज के फर्स्ट, सेकेण्ड और थर्ड ईयर के 50-60 बच्चों की एक टीम बनाते हैं जिसे तीन हिस्सों में बांट देते हैं। रिसर्च विंग, ऑपरेशनल विंग, फाइनेंस विंग। कोई भी प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले ये टीम अपना-अपना काम करती है। किसी प्रोजेक्ट पर टीम काम करना तबतक बंद नहीं करती जबतक समुदाय पूरी तरह से अपने पैरों पर न खड़ा हो जाये।"

उन्होंने विरासत प्रोजेक्ट के बारे में आगे बताया, "इन बच्चों ने खुद के प्रयास और सरकार की मदद से इन ठठेरों की कई प्रसिद्ध जगहों पर दुकाने खुलवा दी हैं जिससे इन्हें अपने सामान को बेचने का एक ठिकाना मिल सके। ऑनलाइन पांच साइटों पर इनका बना सामान उपलभ्ध है। अमृतसर एयरपोर्ट पर भी इनकी एक दुकान खुल गयी है। इन बच्चों के साथ अगर सरकार भी इस दिशा में ध्यान दे तो इस कला को पुनर्जीवित करना मुश्किल नहीं है।"

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पीतल प्रोजेक्ट की फाउंडर और डिज़ाइनर कीर्ति गोयल इन ठठेरों को इनकी ही बनाई डिजायन में थोड़ा सा बदलाव करके सजावट का सामान बनवाने का काम कर रहीं हैं। इनके साथ ही यूनाइटेड सिख संस्था से जुड़ी डाली सिंह भी इन ठठेरों को नई डिजायन बनाना सिखाती हैं। कीर्ति बताती हैं, "हम इनके बनाये डिजायन में ही थोड़ा फेरबदल करके हैं और उसे आज की जरूरत के हिसाब ढालते हैं। तीन ठठेरे इन नई डिजायन के साथ ढल गये हैं और बहुत अच्छा काम करने लगे हैं। इनके बनाये प्रोडक्ट की बाजार में मांग बढ़ रही है।"

ठठेरों के बर्तनों में नई डिजायनों के बारे में उन्होंने बताया, "तांबे और पीतल से निर्मित थाली-कटोरी, टी-सेट, डिनर-सेट, हांडिया, केंडल स्टैंड और सजावटी के बर्तनों को आधुनिक डिजायन से आकार दिया जा रहा है। इन बर्तनों को तीन तरह से बेचा जाता है। पहला ऑनलाइन दूसरा प्रदर्शनी तीसरा कुछ खास जगहों पर दुकान लगाकर अच्छी बिक्री हो जाती है।"

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