साइकिल बाबा और उनकी गैंग चली है गांवों को बदलने

ग्रामीण शिक्षा, सफाई और शौचालय को साइकिल से रफ्तार दे रहे बरेली के युवा, हर रविवार गाँव जाकर ग्रामीणों को कर रहे जागरूक

बरेली।" दुनिया को अगर बेहतर तरीके से देखना है तो साइकिल से चलिए। गाँव और शहर की दूरी को कम करने के लिए हमें साइकिल से चलना होगा। " ये कहना है बरेली के एक समाजसेवी का जो साइकिल चलाकर ग्रामीणों को सेहत, स्वच्छता, शिक्षा और शौचालय के लिए जागरूक कर रहे हैं।

बरेली के राजेंद्र नगर निवासी संजीव जिंदल को लोग साइकिल बाबा के नाम से भी जानते हैं। संजीव जिंदल साइकिल से ग्रामीण लोगों और किसानों को जागरूक कर रहे हैं। इनके इस मुहीम में बरेली के कुछ युवा भी इनका साथ दे रहे हैं। 12 युवाओं के इस समूह का नाम है 'टीम विंग्स'। संजीव बताते हैं, " मैं स्वस्थ रहने और समाज को करीब से देखने के मकसद से साइकिल चलाता हूं। साइकिल के जरिये गरीब, मजदूर, किसानों से घुलने मिलने में सहूलियत होती है। पैदल चलते हुए शहर के बाहर तक नहीं जा सकते हैं। मेरा बचपन गाँव में बीता है इसलिए मुझे गाँव बहुत पसंद है। साइकिलिंग करते हुए मुझे जो भी मिलता है मैं उन्हें नई बातें बताता हूं और उनसे नई चीज सीखता हूं। "

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संजीव ने बताया, " हम लोग प्रत्येक रविवार एक गाँव में जाते हैं। यहां किसानों को खेती के लिए जागरूक करते हैं। उन्हें सरकार द्वारा उनके लिए बनाई गई तमाम योजनाओं के बारे में उन्हें बताते हैं। ज्यादातर किसानों को सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी ही नहीं है। इसके साथ-साथ गरीब बच्चों और उनके परिजनों को शिक्षा के लिए प्रेरित किया जाता है। कई गांवों में बहुत गंदगी देखने को मिलती है। साफ सफाई के लिए भी हम लोग उन्हें जागरूक करते हैं। "

शहरी बच्चे रूबरू हो रहे ग्रामीण परिवेश से

" गांव को शहर से मिलाना और शहर को गाँव से मिलाना ही मेरा साइकिलिंग का मकशद है। शहर को गाँव को बताता हूं कि गाँव में क्या दिक्कत है और गाँव वालों को बताता हूं कि आप कहां पीछे रह गए है। मेरे साथ साइकिलिंग करने वाले ज्यादातर बच्चे शहरी परिवेश से हैं, उन्हें न तो किसानों के बारे में जानकारी है और न गाँव के बारे में। मेरा यही मकशद है कि इन बच्चों को असली भारत दिखाया जाए जो गांव में बसता है। शहर के बच्चों को गरीबी और ग्रामीणों के बारे में कुछ जानकारी नहीं थी। बच्चों को गाँव की समस्याओं को दिखाता हूं और उन्हें दूर करने की बात बताता हूं। बच्चे भी मेरे इस मुहीम में मेरा पूरा साथ दे रहे हैं।" संजीव जिंदल ने आगे बताया।


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स्कूटी की जगह खरीदी साइकिल

12वीं के छात्र सूरज तोमर ने बताया , " मैं चाहता हूं कि आने वाली पीढ़ी को प्रदूषण का सामना न करना पड़ा। आज हर घर में दो गाड़ियां होती ही हैं। मेरे घर से मेरा स्कूल 6 किलोमीटर दूर है। ऐसे में मैं रोज 12 किलोमीटर साइकिल चलाता हूं। इससे मैं फिट रहता हूं। इसके साथ-साथ पैसे की भी बचत होती है। 10 वीं में अच्छे मार्क आने पर पापा ने मुझे स्कूटी लेने की बात कही थी, लेकिन मुझे लगा की स्कूटी मुझे आलसी बना देगी इसलिए मैंने स्कूटी की जगह एक अच्छी साइकिल खरीदी। हम लोग प्रत्येक सप्ताह एक गाँव जाते हैं वहां ग्रामीण बच्चों को साइकिल चलाने और पढ़ाई के लिए प्रेरित करते हैं।"

वहीं आयूष मिश्रा ने बताया, " गाँव के बारे में मुझे बहुत जानकारी नहीं थी और न ही गांव की समस्याओं के बारे में जानता था। जबसे मैं गाँव जाने लगा हूं मुझे यह जानकर हैरानी होती है कि आज भी गाँव के बहुत से बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। उनके मां-बाप को भी उनकी पढ़ाई और भविष्य को लेकर कोई चिंता नहीं थी। हम लोग बच्चों और उनके अभिभावकों को शिक्षा के लिए जागरूक करते हैं। साइकिलिंग करने से पहले की तुलना में मैं फिट भी हो गया हूं। "

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शौर्य खत्री ने बताया, " मैं पहले साइकिल से स्कूल जाता था। लेकिन कॉलेज में आने के बाद साइकिल छूट गई। इसके बाद मुझे लगा की मेरे अंदर कुछ आलस आने लगा। फिर हम कुछ दोस्तों ने हर रविवार को साइकिलिंग करने का फैसला लिया। तभी हमारी मुलाकात संजीव अंकल से हुई। उनके मिलने बाद हमें पता चला कि हमारी कुछ सामाजिक जिम्मेदारी है। अब हम लोग ग्रामीणों को सफाई और शौचालय के लिए जागरूक करते हैं।

बदहाल स्कूलों की बदल रहे तस्वीर

संजीव के पास 75 हजार रुपये से लेकर 1.50 लाख रुपये तक की साइकिलें हैं। देश-विदेश में भी वो साइकिल से सैर करते हैं। संजीव ने बताया, " बिजनेस में अच्छा काम करने पर कंपनी ने मुझे बैंकॉक टूर जाने का पैकेज दिया था, लेकिन मैं बैंकॉक जाने की जगह उसी पैसे से अपनी पहली साइकिल खरीदी। इसके बाद साकिलिंग का सिलसिला शुरू हो गया।" संजीव जिंदल पुणे के उल्हास जोशी को अपना साइकिल गुरू मानते हैं। संजीव जिंदल गाँवों की खेल प्रतिभाओं को मंच दिलाने का काम भी करते हैं। ऐसे हुनरमंद ग्रामीण युवाओं को आर्थिक और जरुरत की चीजें मुहैया कराते हैं जिनसे वे आगे बढ़ सके। इसके साथ-साथ संजीव बदहाल प्राइमरी स्कूलों की दशा दिशा बदलने के लिए भी काम कर रहे हैं। कुछ समाज सेवियों की मदद से स्कूल में जरुरी संसाधन मुहैया करा रहे हैं।

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