दहेज के लिए हर घंटे होती है महिलाओं की हत्या

दहेज के लिए हर घंटे होती है महिलाओं की हत्यागाँव कनेक्शन

लखनऊ। एक तरफ महिला सशक्तिकरण का नारा लगाया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ भारत में हर महीने 700 से ज्यादा महिलाएं दहेज की बेदी पर जान गवां रही हैं। हर घंटे एक दुल्हन दहेज लोभियों के चंगुल में अपनी जान गंवाने पर मजबूर है। हैरत की बात तो यह है कि दहेज हत्या का सबसे ज्यादा मुकदमा उत्तर प्रदेश में दर्ज हुआ है। दहेज हत्या के मामले में गरीब ही नहीं बल्कि अमीर के साथ-साथ विधायक, मंत्री और उद्योगपतियों के खिलाफ भी पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। 

पिछले तीन वर्षों में 24,771 महिलाओं की मौत दहेज के कारण हुई है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक पिछले तीन वर्षों (वर्ष 2012 से वर्ष 2014 तक) में आठ लाख से भी ज्यादा मामले धारा 304 बी के तहत दर्ज हुए। 3.48 लाख मामले पति और उनके परिवार द्वारा घरेलू हिंसा के दर्ज हुए हैं। घरेलू हिंसा सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल (61,259) में, फिर राजस्थान (44,311) और फिर आंध्र प्रदेश (34,835) में आते हैं। वहीं दहेज प्रथा के कारण हुई मौतों में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। प्रदेश में 7,048 मौत हुई जबकि बिहार में 3,830 और मध्य प्रदेश में 2,252 दहेज हत्या हुई है। 

देश में औसतन हर एक घंटे में एक महिला दहेज संबंधी कारणों से मौत का शिकार होती है और वर्ष 2007 से 2011 के बीच इस प्रकार के मामलों में काफी वृद्धि देखी गई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि विभिन्न राज्यों से वर्ष 2014 में दहेज हत्या के 8,455 मामले सामने आए। आंकड़ों के मुताबिक प्रत्येक घंटे में एक महिला दहेज की बलि चढ़ रही है। 

उत्तर प्रदेश में विगत तीन वर्षों में दहेज हत्या के 7,048 मामले दर्ज हुये। आंकड़ों पर गौर करें तो हर वर्ष 2350 दहेज के लिये हत्याएं हुई हैं। प्रतिदिन लगभग सात दहेज हत्याओं का मुकदमा दर्ज हुआ है। हालांकि कई ऐसे मामले है जिसमें पुलिस के आगे गरीब परिवार ने समझौता कर लिया है। वहीं लखनऊ जनपद का मामला देखें तो हर छठवें दिन एक विवाहिता दहेज की बेदी पर जान गंवा रही है। लखनऊ जनपद में वर्ष 2015 में 54 दहेज हत्या हुई हैं जबकि वर्ष 2014 में 50 तथा वर्ष 2013 में 60 दहेज हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ। 

क्या है दहेज

दहेज का अर्थ है जो सम्पत्ति, विवाह के समय वधू के परिवार की तरफ़ से वर को दिया जाता है। दहेज को उर्दू में ‘जहेज़’ कहते हैं। यूरोप, एशिया, अफ्रीका और दुनिया के अन्य भागों में दहेज प्रथा का लंबा इतिहास है। भारत में इसे दहेज, हुंडा या वरदक्षिणा के नाम से भी जाना जाता है तथा वधू के परिवार द्वारा नक़द या वस्तुओं के रूप में यह वर के परिवार को वधू के साथ दिया जाता है। दहेज का उद्देश्य नवविवाहित पुरुष को गृहस्थी जमाने में मदद करना था, जो अन्य आर्थिक संसाधनों के अभाव में शायद वह स्वयं नहीं कर सकता था। कुछ समाजों में दहेज का एक अन्य उद्देश्य था, पति की अकस्मात मृत्यु होने पर पत्नी को जीवन निर्वाह में सहायता देना। दहेज के पीछे एक अवधारणा यह भी रही कि पति, विवाह के साथ आई ज़िम्मेदारी का निर्वाह ठीक तरह से कर सके। 

रिपोर्टर - गणेश जी वर्मा 

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