दहेज के रोग का इलाज युवा पीढ़ी को ही करना होगा

दहेज के रोग का इलाज युवा पीढ़ी को ही करना होगाgaonconnection

आज के युग में लड़कियां अपने माता-पिता, परिवार, गाँव और देश का गौरव बन रही हैं फिर भी हमारा समाज अपना सोच बदलने को तैयार नहीं। बहुत से परिवारों में लड़का पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है और लड़की पैदा होती है तो सन्नाटा छा जाता है मानो दहेज का सांप सूंघ गया हो। लड़की पैदा होने के लिए नारी को दोषी माना जाता है जबकि वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर लड़का या लड़की पैदा होने के लिए पुरुष जिम्मेदार होता है, स्त्री नहीं। विज्ञान का दुरुपयोग करके लड़कियों के भ्रूण हत्याओं के कारण प्रत्येक हजार पुरुषों पर केवल 940 के लगभग नारियां बची हैं। लड़कियों के प्रति दुराग्रह के लिए मुख्य रूप से दहेज जिम्मेदार है। तमाम सरकारी कोशिशों के बाद भी दहेज का डंक नहीं खत्म हो सका है। 

प्राचीन भारत में दहेज प्रथा नहीं थी, महिलाओं को अपना पति चुनने का अधिकार था, पिता द्वारा मिली सम्पत्ति पर उनका स्वामित्व रहता था और महिलाओं को समाज में पुरुषों से बेहतर सम्मान मिलता था। अंग्रेजों से पहले तक पैतृक सम्पत्ति पर लड़की का उतना ही अधिकार रहता था जितना लड़कों का। अंग्रेजों ने सम्पत्ति पर से महिलाओं का स्वामित्व समाप्त कर दिया और तब विवाह के समय लड़की के परिजनों द्वारा दी जाने वाले उपहारों पर भी लड़के और उसके परिवार का हक बन गया। गुलामी तो खत्म हुई लेकिन गुलामी के ज़माने की दहेज परम्परा बनी रही। अब दशकों बाद कानून में बदलाव करके सरकार ने पिता की सम्पत्ति में लड़की का बराबर का हिस्सा होने का प्रावधान किया है।

पहले जो शादियां सादगी से कुछ सैकड़ों रुपए में हो जाती थी फिर कुछ हजार में होने लगी और अब गाँवों में भी कुछ लाख में होने लगी है। अब तो लोग दिखावे के लिए फिजूलखर्ची की सीमाएं पार करते हैं, दहेज के पैसे से। किसान कर्जा लेता है खेती के लिए और खर्च करता है लड़की की शादी पर फिर चुका नहीं पाता और मौत को गले लगा लेता है। आधुनिक भारत में अपराध रिकॉर्ड के आंकड़े बताते हैं कि दहेज के कारण होने वाली मौतों में लगभग 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हालात दिन पर दिन बिगड़ ही रहे हैं। बढ़ती हुई शिक्षा, जागरूकता और महंगाई के साथ दहेज रेट भी बढ़ रहा हैं लेकिन दर्द का अहसास तभी होता है जब दहेज देना होता है तब नहीं जब लेना होता है। 

कभी-कभी टीवी या अखबारों से पता चलता है कि अमुक शहर में लड़की ने मंडप में शादी से इनकार कर दिया क्योंकि लड़के वाले दहेज के लिए उसके परिवार को ज़लील कर रहे थे, परन्तु तब तक परिवार का बहुत नुकसान हो चुका होता है। लड़की को यह क्रान्तिकारी कदम उसी समय उठाना चाहिए था जब मोल-भाव हो रहा था। दहेज विरोधी लोगों को ऐसी बारातों में नहीं जाना चाहिए और ऐसी शादियों में सम्मिलित ही नहीं होना चाहिए जिनमें दहेज का मोल भाव हुआ हो लेकिन व्यवहार में यह सरल नहीं।

व्यक्ति निर्माण में अध्यापकों की भूमिका बनती है कि वे लड़के-लड़कियों के दिमाग में कूट-कूट कर भर दें कि दहेज एक घिनौना अपराध है और यदि दहेज में मोल-भाव हुआ तो शादी नहीं करना चाहिए लेकिन अध्यापक भी माता-पिता के रूप में ऐसी सपाट बात नहीं कहेंगे क्योंकि वह भी तो हैं दहेज के अपराध में भागीदार। यदि बड़े-बूढ़ों ने दहेज से परहेज न किया तो आने वाले समय में कठिनाइयां बढ़ेंगी और बुजुर्गों को ही पीड़ा होगी। 

यदि हमारा समाज यह नहीं चाहता कि लड़कियां दहेज के कारण बिना ब्याही रह जाएं या बेमेल शादियां हों या अपनी जान दे दें तो दो विकल्प हो, या तो ऐसा रिश्ता ढूंढ़ें जो बिल्कुल सादगी से बिना दहेज और बिना दिखावे के सम्बन्ध करने को तैयार हो या फिर लड़के-लड़कियों को अपना साथी चुनने की छूट दें। ऐसी छूट का मतलब होगा पूरी तरह जाति और धर्म को नकारना। युवाशक्ति को इसके आगे झुकना नहीं चाहिए, फिर भी सामाजिक समरसता और शान्ति बचाए रखने के लिए जरूरी है कि बड़े-बूढ़े दहेज की लिप्सा छोड़ दें या फिर अपने बच्चों को पूरी आजादी दें। दुनिया के तमाम देश इस दौर से गुजर चुके हैं।

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