धरती पर जल संचय की क्षमता वृद्धि होनी चाहिए

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देश में सूखा पड़ा है यह कोई समाचार नहीं रहा। इंसान और मवेशी मर रहे हैं और उन्हें बचाने का भरसक प्रयास चल रहा है यह भी नया नहीं। समाचार यह है कि आने वाले दो महीनों के अन्दर अच्छी वर्षा होगी। सरकारें अपना धर्म निभाते हुए आपदा प्रबंधन में लगी हैं लेकिन इस काम में भी लगना चाहिए कि जब अच्छी वर्षा होगी तब और उसके पहले हम क्या कर सकते हैं। यदि हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे तो फिर सूखा पड़ेगा और फिर आपदा प्रबंधन में ही लगे रहेंगे। जब घर में आग लगेगी तब कुआं खोदने में जुटेंगे। 

देश के जलवैज्ञानिक बता सकते हैं कि हमें प्रतिवर्ष कितना पानी चाहिए लेकिन उन्होंने शायद इस बात का आंकलन नहीं किया होगा कि भारत भूमि पर जो तालाब, झीलें, जलाशय, बावली और कुएं हैं उनमें कितना पानी भरने की क्षमता है। यह आंकड़ा पंचायतवार प्रधान उपलब्ध करा सकते हैं, वो भी बिना खर्चा के। यह जानकारी क्षेत्रवार इन्टरनेट पर उपलब्ध करा सकते हैं, वर्षा के पहले। अधिकांश तालाब अब सूखे पड़े हैं। उनकी खुदाई करके उनकी जलधारक क्षमता जितनी बढ़ाई जा सकती है, बढ़ाई जाए भले ही मनरेगा का पैसा एडवांस में खर्च करना पड़े। अब समय है हम आपदा प्रबन्धन के साथ-साथ आपदा नियंत्रण और निवारण पर काम करें।

देश में भूजल पर काम करने वाली अनेक संस्थाएं हैं- भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, केन्द्रीय भूजल बोर्ड, प्रान्तों के प्रान्तीय भूजल बोर्ड, सिंचाई विभाग और ना जाने कितने विभाग धरती की ड्रिलिंग करते रहते हैं और आंकड़ें अपने कार्यालयों में जमा करते रहते हैं। उन सब में कोई सामंजस्य नहीं रहता। यदि सभी विभाग जल सम्बन्धी सभी आंकड़े इन्टरनेट पर डाल दें और वैज्ञानिकों को इस काम पर लगाया जाए कि इसे रिसर्च का विषय बनाएं। सरकारी योजनाएं बनाने में सहूलियत हो सकती है।

शहरों में जल संचय के लिए वाटर हार्वेस्टिंग की योजना चलाई जा रही है तो क्या यह योजना काम भी कर रही है, इसके मूल्यांकन का समय है। जमीन के अन्दर का पानी बराबर खर्च कर रहे हैं उसकी पूर्ति के लिए विचार करने की जरूरत है। इसके लिए आवश्यक है धरती के अन्दर का जलभंडार बढ़े। यह तभी सम्भव है जब हमारी जमीन पर वर्षा जल कुछ देर रुके। किसान अपने खेतों की मेड़ें ऊंची करके उन पर हेज यानी करौंदा जैसे पेड़-पौधे लगाकर बरसात के पानी को कुछ देर रोक सकते हैं और पानी धरती में प्रवेश कर जाएगा। यह सब अभी से या पहली वर्षा के तुरन्त बाद करना होगा।

अच्छी बात है कि हमारी सरकार जापान और इज़रायल जैसे देशों की सिंचाई तकनीक लाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन ऐसे यंत्र और तकनीक हमारे किसानों की जेब के अनुसार हो, सब्सिडी के सहारे नहीं। सब्सिडी से बाबुओं की जेबें भरती हैं किसानों की नहीं। कम दाम वाले छोटे स्प्रिंकलर बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। उस दिशा में काम होना चाहिए। कहते हैं ‘‘प्रिवेंशन इज़ बेटर देन क्योर” अर्थात उपचार से बेहतर है रोकथाम। आशा है हमारी सरकारें और एनजीओ इस दिशा में सोचेंगी।

sbmisra@gaonconnection.com

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