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मध्य प्रदेश के आदिवासी जिलों में पलायन से लौटी महिलाओं ने मनरेगा में संभाला काम

मध्य प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र और आदिवासी बाहुल्य तीन जिले धार, झाबुआ, अलीराजपुर में इन दिनों महिलाएं पसीना बहा रही हैं। तापमान औसत रूप से 41 डिग्री के आसपास है। इन तीन जिलों में स्थानीय स्तर पर करीब 37,000 मजदूरों को काम दिया जा रहा है जिसमें महिलाओं की भागीदारी 60 फीसदी है।

मध्य प्रदेश के आदिवासी जिलों में पलायन से लौटी महिलाओं ने मनरेगा में संभाला काम

भोपाल। लॉकडाउन के बाद अलग-अलग राज्यों से पलायन करके मध्यप्रदेश लौटी महिलाएं इस भीषण गर्मी में बंजर पहाड़ी को हरा-भरा करने में जुटी हैं।

मध्य प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र और आदिवासी बाहुल्य तीन जिले धार, झाबुआ, अलीराजपुर में इन दिनों महिलाएं पसीना बहा रही हैं। तापमान औसत रूप से 41 डिग्री के आसपास है। इन तीन जिलों में स्थानीय स्तर पर करीब 37,000 मजदूरों को काम दिया जा रहा है जिसमें महिलाओं की भागीदारी 60 फीसदी है।

धार जिले के बोधवाड़ा गाँव की राधाबाई (30 वर्ष) बताती हैं, "अब काम बंद है अगर कमाएंगे नहीं तो खायेंगे क्या? शहर में कोई रोजगार नहीं मिला तो गाँव आ गये। घर में छोटे-छोटे बच्चे हैं मेहनत करेंगे तभी इनका पेट भर पायेंगे।"

राधाबाई की तरह आदिवासी बाहुल्य तीन जिलों की 60 फीसदी महिलाएं मनरेगा के काम में जुट गयी हैं।

इस समय मनरेगा के तहत जो भी काम दिए जा रहे हैं वो मुख्य रूप से पानी और पर्यावरण से संबंधित है। इसमें बंजर पहाड़ियों को हरा-भरा करने के लिए कंटूर ट्रेंच निर्माण से लेकर मेढ़ बंधान और कई ऐसे काम किए जा रहे हैं जो कि आने वाले समय में ग्रामीण क्षेत्र को पानीदार बनाएंगे।

मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य तीन जिलों में 60 फीसदी महिलाओं को मिला मनरेगा का काम.

इस पानीदार काम में महिलाओं की अपनी महत्वपूर्ण और अग्रणी भूमिका है। 42 डिग्री सेल्सियस के तापमान के बीच में महिलाएं जमकर पासीना बहा रही हैं। स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना के शेष काम को पूरा करने का जिम्मा भी इनके ऊपर है। ऐसे में मजदूरों को रोजगार देने के नाम पर योजना के तहत काम हो रहा है। निर्माण काम में भी महिलाएं आगे निकल कर आयी हैं। महामारी के इस दौर में ये घर बनाने का काम पूरा कर रही हैं।

धार जिला के जनपद पंचायत सरदारपुर के सहायक परियोजना समन्यवक एसएस भाटी बताते हैं, "इस बार महिलाएं बड़ी संख्या में काम कर रही है। बीते सालों में हमें स्थानीय स्तर पर मजदूर डोंडी पिटवाने (सूचना देना) के बाद भी नहीं मिला करते थे। इस बार तो केवल सामान्य सूचना पर ही ग्रामों में लोगों ने काम पर आना शुरू कर दिया है। हमें हर रोज नए जॉब कार्ड बनाने के लिए भी काम करना पड़ रहा है।"

लॉकडाउन के वजह से ये आदिवासी मजदूर गुजरात से पसीना बहाते करीब एक लाख पांच हजार मजदूर अपने गाँव को वापस आ गये। ये मजदूर बीते कुछ सालों में गुजरात के शहर की गंदी बस्तियों और तंग गलियों में रहकर अपना जीवन यापन कर रहे थे।

सुल्तानपुर गाँव की संतोषी ने बताया, "गाँव में काम आसानी से मिल रहा है। लेकिन मजदूरी बहुत कम है। शहर में एक दिन का 500 रूपये तक कमा लेते थे लेकिन यहाँ 190 रूपये ही मिल रहे हैं। पति भी मशीन चलाकर अच्छा पैसा कम लेता था लेकिन अब तो सबकुछ बंद है। यहाँ मजदूरी एक तिहाई हो गई है।"

"बैठने से तो अच्छा है कमसेकम यहाँ काम तो मिल रहा है। अभी सब लोग बंजर पार्टी में ही काम कर रहे हैं। कम मजदूरी से फर्क तो पड़ता है लेकिन क्या करें जैसे-तैसे पेट भर रहे हैं," संतोषी ने लॉकडाउन में काम मिलने का संतोष जताया।

गाँव वापस लौटने पर इनके सामने रोजी-रोटी का बुरा संकट था। गाँव में मनरेगा और निर्माण का काम शुरू होते ही कुछ मजदूरों को काम मिल गया है।

ग्राम पंचायत सहायक मोहन भाई बताते हैं, "ग्राम पंचायत माछलिया में बड़ी संख्या में लोग बाहर से आए हैं। ये अब अपने मूल ग्राम में ही रह रहे हैं। इनको हमने रोजगार दिया है। बाहर से आने वाले मजदूरों को काम मिलने से वे यहां पर सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।"

पलायन करके गाँव लौटे मजदूरों के लिए बेरोजगारी बड़ी समस्या है, ऐसे में मध्यप्रदेश के इन जिलों में मजदूरों को मिला काम एक उम्मीद है।

"पति, बच्चों के साथ गुजरात से अपने गाँव आ गये। खेती दो बीघा है, इतनी जमीन में तीन परिवारों का खर्चा नहीं चल सकता। खेती से थोड़ा बहुत अनाज मिल जाएगा, दूसरे खर्चों के लिए गाँव में अब मजदूरी मिल गयी है," भूरी वास्केल मनरेगा में मिली इस मजदूरी से खुश हैं।

प्रेमविजय, कम्युनिटी जर्नलिस्ट,भोपाल


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