दक्षिण पूर्व एशिया में हर साल हेपेटाइटिस-सी से मरते हैं साढ़े तीन लाख लोग

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नई दिल्ली (भाषा)। डब्ल्यूएचओ ने आज कहा कि वाइरल हेपेटाइटिस से भारत समेत दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र में हर साल तीन लाख से अधिक लोगों की मौत होती है। साथ ही वह इस साल पहला हेपेटाइटिस जांच दिशा-निर्देश जारी करेगी ताकि इस बीमारी की जांच और उपचार को बढ़ाया जा सके।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए क्षेत्रीय निदेशक पूनम क्षेत्रपाल सिंह ने कहा, ‘‘HIV और मलेरिया को मिलाकर होने वाली कुल मौतों से अधिक मौतों के लिए यह जिम्मेदार है। संचारीय बीमारियों से होने वाली मौत के बड़े कारणों में तपेदिक के बाद यह दूसरे नंबर पर है।'' उन्होंने कहा, ‘‘वैश्विक तौर पर और क्षेत्र में वाइरल हेपेटाइटिस से होने वाली मौत की संख्या बढ़ रही है। हेपेटाइटिस के प्रसार को रोकने के लिए तत्काल और अविलंब कार्रवाई की आवश्यकता है।''

सुइयों का असुरक्षित प्रयोग है हेपेटाइटिस-सी संक्रमण का सबसे बड़ा कारण: डॉक्टर

सुइयों के असुरक्षित प्रयोग जैसेः उनका दोबारा प्रयोग, अनुचित निस्तारण और सीरिंज का सही रोगाणुनाशन नहीं होना भारत में हेपेटाइटिस-सी संक्रमण को बहुत तेजी से बढ़ा रहा है। विश्व हेपेटाइटिस दिवस की पूर्व संध्या पर डॉक्टरों ने यह चेतावनी दी है।

डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी का कोई टीका नहीं है और सामान्य तौर पर यह असुरक्षित तरीके से रक्त चढ़ाने या सुइयों के माध्यम से फैलता है। हालांकि जल्दी पता चलने की स्थिति में इसका पूरा इलाज संभव है। लेकिन लंबे समय तक बीमारी को नजरअंदाज करने पर यह लीवर सिरोसिस या कैंसर में भी बदल सकता है।

फोर्टिस एस्कॉर्टस लीवर एंड डाइजेस्टिव डिजीज इंस्टीट्यूट के गैस्ट्रोएन्टरालॉजिस्ट डॉक्टर मानव वधावन ने कहा, ‘‘हेपेटाइटिस-सी (HCV) HIV के मुकाबले 10 गुना ज्यादा संक्रामक है। बीमारी के शुरुआती दिनों में इसका कोई विशेष लक्षण नज़र नहीं आता है। यदि नजर आता, तो इसे आसानी से रक्त जांच में पता लगाया जा सकता है और इलाज संभव है।''

उन्होंने हेपेटाइटिस-सी के लक्षणों के रुप में थकावट, जॉन्डिस (पीलिया), पेट दर्द, भूख कम लगना आदि को गिनाया। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि भारत में 1.2 करोड़ लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं।

जीबी पंत अस्पताल में आन्त्रशोथ विभाग में कार्यरत डॉक्टर सिद्धार्थ श्रीवास्तव ने मरीजों को सतर्क रहने तथा सुरक्षित इंजेक्शन के प्रति जागरुक होने की जरुरत बतायी। उन्होंने कहा कि सीरिंज के रोगाणुशानन, सुइयों और सीरिंग का एक बार ही प्रयोग करने तथा उसका दोबारा प्रयोग नहीं करने आदि को लेकर जागरुक रहना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘अजीब बात यह है कि हेपेटाइटिस-बी का टीका है, लेकिन कोई इलाज नहीं है। जबकि हेपेटाइटिस-सी का कोई टीका नहीं है बल्कि इलाज है। 

स्वास्थ्य संस्थानों तथा डॉक्टरों को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बनाए गए सुरक्षित इंजेक्शन नियमों का पालन करना चाहिए। कर्मचारियों को इंजेक्शन लगाने से पहले हाथ धोने चाहिए और जहां इंजेक्शन लगाना है उसे अच्छे से साफ करना चाहिए।'' स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हेपेटाइटिस-सी संबंधी लीवर की बीमारियों से भारत में हर साल करीब पांच लाख लोगों की मौत होती है। जबकि सुइयों के गलत प्रयोगों के कारण करीब 47 लाख लोग इससे संक्रमित होते हैं।

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