दो जून की रोटी की चाहत में पिसता बचपन

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नई दिल्ली (भाषा)। आजादी के 68 वर्ष बाद भी सभ्य समाज की उस तस्वीर पर सवाल उठाता है, जहां हमारे देश के बच्चों को हर सुख सुविधाएं मिल सकें। चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 1.02 करोड़ बच्चे काम करते हुए अपना जीवनयापन कर रहे हैं और वे स्कूलों से दूर हैं।

2001 से 2011 के दौरान शहरी बाल श्रम में 50 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। जाने माने चिंतक के एन गोविंदाचार्य ने कहा कि हमारे ही देश का एक मासूम बचपन ऐसा भी है जो खेतों में, फैक्ट्रियों में काम कर रहा है, ठेली लगाकर सामान बेच रहा है, रेशम के धागे से कपड़े तैयार कर रहा है, चाय की दुकान पर बर्तन धो रहा है, स्कूल की बसों में हेल्परी कर रहा है, फूल बेच रहा है और न जाने क्या क्या करने पर मजबूर है। उन्होंने कहा कि इनके काम के घंटे तय नहीं होते और मजदूरी 25 से 50 रुपये तक दे कर इतिश्री हो जाती है। साथ ही इन्हें प्रताड़ित भी किया जाता है। ऐसे बच्चों के लिए शिक्षा पाना तो दूर की कौड़ी बना हुआ है।

दिल्ली जैसे महानगरों में निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों के बच्चों की स्थिति तो और भी दयनीय है, जहां उनके लिए न तो रहने का ठिकाना है और पढ़ाई-लिखाई की तो कोई व्यवस्था है ही नहीं। 

वंचित वर्ग के बच्चे मजदूरी को विवश

स्वराज आंदोलन के योगेन्द्र यादव के अनुसार, पढे़-लिखे बाबू से लेकर अनपढ़ मजदूर तक, हर कोई चाहता है कि उसका बच्चा पढ़-लिख जाये। समाज का ऐसा वर्ग जो सदियों तक विद्या से वंचित रहा वह सोच रहा है कि शिक्षा मिल गयी, तो न जाने उनके बच्चे कहां पहुंच जायेंगे। निश्चित ही हमारे समाज में शिक्षा के प्रति आग्रह बढ़ता जा रहा है, लेकिन वहनीय शिक्षा तो दूर वंचित वर्ग के बच्चे आज मजदूरी करने को विवश हैं। देश का एक कटु सत्य यह भी है कि मासूम बच्चों का जीवन कहीं तो खुशियों से भरा है तो कहीं छोटी से छोटी जरूरतों से भी महरूम है। बच्चों के हाथों में कलम और आंखों में भविष्य के सपने होने चाहिए। लेकिन दुनिया में करोड़ों बच्चे ऐसे हैं, जिनकी आंखों में कोई सपना नहीं पलता। बस दो जून की रोटी कमा लेने की चाहत पलती है।

बचपन ख़ाक में मिलाते दिख जाएंगे बच्चे

सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मी नारायण मोदी ने कहा कि सभ्य समाज के बच्चे को बहेतरीन शिक्षा और सभी सुख सुविधाएं मुहैया होनी चाहिए। हमारे देश के हर कोने में पलने वाले हर बच्चे को शिक्षा और उसकी जरुरत की हर सुख सुविधा मुहैया होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के किसी भी कोने में चले जाइये वहां पर आपको होटलों, ढाबों, दुकानों, घरों, गैराजों, पटाखों, चूड़ी एवं कालीन के कारखानों में गरीबों के बच्चे अपने बचपन को खाक में मिलाते दिख जायेंगे।

बच्चों की तस्करी गंभीर समस्या

यूनीसेफ के एक अध्ययन के अनुसार, उद्योगों, ढाबों, एवं ऐसे ही कार्यस्थलों पर बच्चों का नियोजन इसलिए भी किया जाता जा रहा है, क्योंकि उनका शोषण बड़ी आसानी और सरलता से किया जा सकता है। आज मासूम बच्चों का जीवन केवल बालश्रम तक ही सीमित नहीं बल्कि बच्चों की तस्करी और लड़कियों के साथ भेदभाव आज भी देश में एक विकट समस्या के रूप में हमारे सामने है।  वर्ष 1980 में बचपन बचाओ आंदोलन की शुरुआत हुई। बालश्रम रोकने के लिए न जाने कितनी संस्थाएं काम कर रही हैं, लेकिन अफसोस तो यह है कि उसके बावजूद बालश्रम में कमी होती नजर नहीं आ रही है। बच्चों को अभी भी अपने अधिकार पूरे तौर पर नहीं मिल पाते। अनेक बच्चों को भरपेट भोजन नसीब नहीं होता और स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की सुविधाएं तो हैं ही नहीं और यदि हैं भी तो बहुत कम।

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