दस करोड़ ‘जलधन अकाउंट’ चाहिए साहब !

दस करोड़ ‘जलधन अकाउंट’ चाहिए साहब !gaonconnection, दस करोड़ ‘जलधन अकाउंट’ चाहिए साहब !

देश में पानी को लेकर एक दो नहीं कई योजनाएं चल रही हैं। राष्ट्रीय जल नीति है, राष्ट्रीय जल मिशन है, जल क्रांति अभियान है, जल ग्राम योजना है, राज्यों की अलग-अलग योजनाएं हैं, और भी बहुत कुछ है। इन सब योजनाओं का जिक्र सरकार की तरफ से बार-बार होता है। ये भी बताया जाता है कि इस बजट में जमीन के अंदर पानी के स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए 60 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। 28.5 लाख हेक्टेयर जमीन को सिंचाई के दायरे में लाने का प्लान है। नाबार्ड के तहत सिंचाई योजना के लिए 20 हजार करोड़ रुपए रखे गए हैं। इस सबके बाद भी पानी के लिए त्राहिमाम की स्थिति क्यों है? अदालतें पानी के लिए खेल बंद करा रही हैं, कहीं स्कूलों में छुट्टी की तैयारी हो रही है, कहीं पानी की एक बाल्टी के बदले 100 रुपए मांगे जा रहे हैं, कहीं गन्ने की फसल को तो कहीं चीनी की मिलों को पानी की कमी का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है और इस सबके बीच देश के करीब 33 करोड़ लोग चुल्लू भर पानी के लिए तरस रहे हैं।

अर्थशास्त्र का एक बहुत की साधारण सिद्धांत है जिस चीज की कमी है उसकी बचत करो। पैसा कम है तो मितव्ययी बनो, पेट्रोल डीजल कम है तो गाड़ी कम चलाओ, अनाज की कमी है तो उसे बर्बाद मत करो। हमारे पूर्वजों से लेकर नए जमाने के मैनेजमेंट गुरु बचत के इस बेसिक सिद्धांत के बारे में बहुत कुछ लिख चुके हैं, कह चुके हैं।

इस रविवार को प्रधानमंत्री ने भी पानी की बचत करने को कहा। कहा कि पानी बर्बाद ना हो इसके लिए आंदोलनकारी रवैये की जरूरत है। पानी को बचाने की ये बातें तब आ रही हैं जब बचाने को कुछ नहीं है। कम से कम चालीस पचास दिन अभी पानी की किल्लत में ही काटने हैं। उम्मीद है कि महीने डेढ़ महीने बाद बारिश होगी, तालाब भरेंगे, नदी-नहर में पानी आएगा और शायद घरों के नलों में भी।

पुराना तजुर्बा कहता है कि पानी बरसने के कुछ ही घंटों में हम सब ये भूल जाएंगे कि पानी के बगैर हमने कितनी मुश्किल से दिन गुजारे। लातूर, बुंदेलखंड, कच्छ, मयूरभंज, करीमनगर सब खबरों के नक्शे से ओझल हो जाएंगे। बुरे दिनों को भुलाकर अच्छे दिन नहीं आ सकते। अच्छे दिनों को लिए जरूरी है कि बुरे दिनों की वजह का निदान ढूंढ़ा जाए। जब देश के करीब 30-40 करोड़ लोग पानी कि कमी से जूझ रहे हैं तब भी देश के कई इलाकों में पानी की इफरात है, फौव्वारे चल रहे हैं, स्वीमिंग पूल लबालब हैं, गोल्फ कोर्स की हरियाली में बड़े-बड़े लोग आनंद ले रहे हैं, नहाने के लिए बाल्टी का जगह शॉवर चल रहे हैं, और आरओ का एक गिलास पानी निकालने के लिए तीन गिलास पानी नाली में बहाया जा रहा है। क्या इस पानी का चौथाई हिस्सा भी बचाया नहीं जा सकता? इस पानी को बचाने की बातें कई साल से हो रही हैं लेकिन बचत उस माहौल में भी नहीं हो रही है जब ये कहा जा रहा है कि 2050 तक हमें पेट्रोल-डीजल की तरह पानी भी विदेशों से खरीदना पड़ेगा।

अब देखिए शहरों में रहने वाली एक बड़ी आबादी कितना पानी खर्च कर रही है। एक आकलन के मुताबिक नलों से पानी की सुविधा लेने वाली आबादी का एक बड़ा हिस्सा सबसे ज्यादा पानी नहाने में खर्च करता है। नहाने के लिए प्रति व्यक्ति 55 लीटर पानी का खर्चा आ रहा है, एक आदमी बर्तन धोने के लिए 10 लीटर पानी खर्च कर रहा है, टॉयलेट में 30 लीटर, घर धोने में 10 लीटर, खाना बनाने में 5 लीटर और पीने के लिए 5 लीटर प्रति व्यक्ति इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा बाग-बगीचे की सिंचाई और कार की धुलाई का खर्चा अलग है। कई लोग तो रोज 600 लीटर तक पानी इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या इस खर्चे में कटौती का रास्ता नहीं निकल सकता? क्या 600 लीटर पानी इस्तेमाल करना वाला एक आदमी रोज़ 50 लीटर पानी नहीं बचा सकता? 10 करोड़ लोग भी रोज 50 लीटर पानी बचाएंगे तो एक दिन में 500 करोड़ लीटर पानी बच सकता है। लातूर जैसे सूखाग्रस्त इलाके में एक दिन की पानी की खपत दो से ढाई करोड़ लीटर है। यानी 500 करोड़ लीटर पानी की बचत से लातूर जैसे 200 इलाकों की पानी की जरूरत पूरी हो सकती है। बचत का ये काम अपने आप शुरू नहीं होगा। ये काम सरकार को ही करना पड़ेगा। जिस तरह से सरकार ने जनधन का आंदोलन चलाया उसी तरह से जलधन की मुहिम भी चलानी होगी। वक्त आ गया है कि सबको ये बताया जाए कि पानी बेशकीमती है। मुफ्त में पानी बांटकर वाहवाही लूटने वाली स्कीमों से काम नहीं चलेगा। अगर मुफ्त पानी देना ही है तो उन्हें दिया जाए जो पानी का किफायत से इस्तेमाल करते हैं। लोगों को लगे की जो पानी वो इस्तेमाल कर रहे हैं वो उन्होंने कमाया है।

हर घर में पानी के डिजिटल मीटर लगने चाहिए ताकि सबको पता चले कि उन्होंने कितना पानी खर्च किया है और उनकी सीमा क्या है? पानी पर हर नागरिक का अधिकार है लेकिन पानी को बर्बाद करना किसी का अधिकार नहीं होना चाहिए। सूखे से लड़ना है तो मॉनसून के भरोसे बैठने के बजाए ’जलधन’ तैयार करना ही होगा।

(लेखक न्यूज 24 में मैनेजिंग एडिटर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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