दस साल में पूरे नहीं हुए मनरेगा के लक्ष्य

दस साल में पूरे नहीं हुए मनरेगा के लक्ष्यगाँव कनेक्शन

सा 2015-16 में 3.5 लाख करोड़ रुपए (भारत की सब्सिडी और पेंशन बजट के बराबर) लगाने के बाद भी मनरेगा के तहत करीब 50 मिलियन (500 लाख) परिवार को उनके सौ दिन के रोजगार का आधे से भी कम वेतन प्राप्त हुआ है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के डाटा पर हमारा विश्लेषण कुछ इस तरह है-यद्यपि 2015-16 में सबसे ज्यादा पैसे खर्च किए गए फिर भी संपत्ति (तालाब/नहर/कुएं) निर्माण के  मामले में यह सर्वाधिक बुरा साल रहा है।

इस मामले में साल 2014-15 से 23 फीसदी गिरावट आई है।पिछले साल मनरेगा के तहत 50 मिलियन परिवारों को काम मिला था जिनमें से 10 फीसदी से भी कम लोगों को उनकी सौ दिनों की मजदूरी मिली है। जिन मजदूरों को तनख्वाह देने में 15 दिन का इंतजार कराया गया था उनमें सिर्फ 40 फीसदी को ही उनका वेतन मिला।33 फीसदी अधिकार प्राप्त नौकरियों से ज्यादा अब मनरेगा की आधी नौकरियों में महिलाएं भी भागीदार बन रही है जिसकी वजह से रोजगार की मांग अब वृहद स्तर पर बढ़ रही है। मालूम हो कि इस मनरेगा के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार के सभी वयस्कों को एक न्यूनतम मज़दूरी पर सौ दिनों का रोज़गार देने की बात की गई थी।

मनरेगा की लॉन्चिंग के समय तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा था, ‘यह विश्व की सबसे बड़ी और शायद सबसे महत्वाकांक्षी सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक कामों का कार्यक्रम है।’इसलिए इसके 10 साल पूरे होने पर हमने इसके प्रभाव का मूल्यांकन किया लेकिन बताए गए आंकड़ों से पता चलता है कि मनरेगा के तहत आश्वस्त कामकाजी दिनों की संख्या बढ़ाना मददगार साबित नहीं होगा क्योंकि पहले से आश्वासित सौ दिनों का वेतन ही मजदूरों को नहीं मिल पाता है जिससे वे सभी आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं।

केवल 50 मिलियन परिवार को ही मनरेगा के तहत काम मिला है जिनमें से 10 फीसदी से भी कम अपना वेतनभत्ता लेने में असक्षम रहे हैं। इससे साफ है कि या तो काम उपलब्ध नहीं कराया जा रहा या फिर मांग पूरी नहीं की जा रही है। सिर्फ 40 फीसदी के करीब मजदूरों को निश्चित 15 दिनों के अंदर वेतन प्राप्त हुआ है। वहीं अप्रशिक्षित मनरेगा मजदूरों को समय से वेतन न मिल पाने की वजह से उनके घरेलू खर्चों पर असर पड़ रहा है। शायद ये हालात 210 मिलियन नए जनधन अकाउंट खुलने के साथ बदलें, जब सरकार मजदूरों को प्रत्यक्ष रूप से वेतन दे सकेगी।

हर साल संपत्ति के निर्माण की संख्या में कोई महत्त्वपूर्ण वृद्धि नहीं हो रही है। इसमें पिछला साल तो सर्वाधिक व्यर्थ रहा जैसा कि हम पहले बता चुके हैं। संपत्ति की स्थिरता पर भी सवाल उठने लगे हैं। इस समय कानून के अनुसार, मनरेगा को मिलने वाला 60 फीसदी फंड, वेतन में और 40 फीसदी फंड सामग्री में इस्तेमाल होना चाहिए। इसका साफ मतलब है कि स्कीम में मजदूरों के गहन काम की प्रचुरता है न कि बेहतर सामग्री और सरंचना की।मनरेगा का बजट हर साल बराबर मात्रा में बढ़ता रहा है लेकिन पिछले साल सबसे ज्यादा 42,084 करोड़ खर्च हुए यानी लगभग 0.3% भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बराबर। मनरेगा का 95 फीसदी से भी ज्यादा फंड आखिरी दो वर्षों में इस्तेमाल हुआ है।

यह सकारात्मक है लेकिन इसमें भ्रष्टाचार की शिकायतें भी मिली हैं। वर्षों से प्रत्येक व्यक्ति का वेतन और कीमत भी नियमित रूप से बढ़ी है। 2015-16 में औसत वेतन दर 154 रुपए प्रतिदिन थी जिसमें पिछले चार वर्षों में 27 फीसदी बढ़त हुई है लेकिन मनरेगा में अब भी मजदूरों की सहभागिता में बढ़त नहीं हुई है। इस पर आलोचकों का दावा है कि मनरेगा के बढ़ते वेतन दर की वजह से खेतों में काम करने वाले मजदूरों की संख्या कम हुई है जबकि इससे सहायकों का कहना है कि वेतन में वृद्धि अशिक्षित मजदूरों के लिए जरूरी है।

यह साफ है कि इन दस वर्षों में मनरेगा के ज्यादातर लक्ष्य पूरे नहीं हुए है। लोगों की कम भागीदारी की वजह यह है कि या तो उन्हें काम नहीं मिला या फिर उनकी मांग पूरी नहीं हुई। ग्रामीण उत्पादकता भी कमजोर रही जिससे मनरेगा के फंड से बनी संपत्ति की गुणवत्ता पर भी सवाल उठते हैं। कई मनरेगा सहयोगियों का भी मानना है कि इसके प्रोजेक्ट स्थिरता के मामले में फेल साबित हुए हैं साथ ही इसमें भ्रष्टाचार भी जुड़ा है।यह केंद्र की मेगा स्कीम थी जिसका बेहतर नियोजित तरीके से लाभ उठाया जा सकता था खासकर भारत के गरीब क्षेत्रों में जहां लोगों में काम को लेकर मांग है। सहकारी समिति के भाव से काम करना चाहिए था। मनरेगा स्कीम के तहत मिलने वाली राशि को प्रत्यक्ष रूप से राज्य सरकारों को दिया जा सकता था। इस मामले में सरकार को दोबारा मनरेगा को लेकर गंभीर होकर सोच-विचार करने की जरूरत है।

(माथुर विजन इंडिया फाउंडेशन के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं जबकि नोमेश आईआईटी दिल्ली में एसोिसएट प्रोफेसर हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

साशोभित माथुर/नोमेश बोलिया

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