गाँव हो या शहर, दुनियाभर की महिलाओं को प्रभावित कर रहे हैं ये 7 मुद्दे

गाँव हो या शहर, दुनियाभर की महिलाओं को प्रभावित कर रहे हैं ये 7 मुद्देप्रतीकात्मक तस्वीर

हाल ही में भारत सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2018 पेश की है। इस रिपोर्ट को सरकार ने गुलाबी रंग में पेश किया क्योंकि ये रंग महिला सशक्तीकरण को दर्शाता है। इस रिपोर्ट में सामने आया है कि कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां महिलाओं की दशा में सुधार हुआ है लेकिन ज़्यादातर मामलों में महिलाओं की स्थिति अभी भी वैसी है जैसी दशकों पहले हुआ करती थी, बल्कि कुछ मामलों में तो उससे भी बुरी हो गई है।

भारत के लोगों में अभी भी बेटों की चाहत ज़्यादा है। पुरुषों के लिए शिक्षा व रोजगार के ज़्यादा अवसर हैं, लगभग हर मामले में पुरुषों की स्थिति महिलाओं से बेहतर है। गाँव हो या शहर हालात हर जगह एक जैसे हैं। लैंगिक असमानता, शिक्षा की कमी, रोजगार के कम अवसर, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलना, कुपोषण, लिंग आधारित हिंसा जैसी कमियों का सामना भारत ही नहीं पूरी दुनिया की महिलाएं कर रही हैं। जानिए कुछ ऐसे मुद्दों के बारे में जिनका सामना दुनियाभर की महिलाएं कर रही हैं।

1. शिक्षा तक पहुंच

वैसे शिक्षा तक महिलाओं की पहुंच बीते वर्षों में बढ़ी है लेकिन फिर भी ये इतनी बेहतर नहीं हुई है कि समस्या को ख़त्म मान लिया जाए। असर की रिपोर्ट 2017 के मुताबिक, भारत के गाँवों में 18 साल के कम उम्र में तो लड़कियों और लड़कों की स्कूल में संख्या लगभग एक बराबर है लेकिन 18 साल के बाद धीरे - धीरे लड़कियों की संख्या कम होने लगती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 18 साल के बाद लगभग 32 फीसदी लड़कियों ने पढ़ाई छोड़ दी जबकि पढ़ाई छोड़ने वाले लड़कों की संख्या 28 फीसदी रही। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में गाँव और शहरों को मिलाकर 40 फीसदी से ज़्यादा लड़कियां हाइस्कूल के बाद स्कूल छोड़ देती हैं। 2015 में भारत की साक्षरता दर 71.96 फीसदी थी जिसमें से पुरुषों की साक्षरता दर 80.94 फीसदी थी तो महिलाओं की 62.98 फीसदी। यानि पुरुषों से 18 फीसदी कम। यूनेस्को की 2013 में आई रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में प्राथमिक स्कूल की उम्र वाली 31 मिलियन लड़कियां स्कूल नहीं जातीं और विकासशील देशों में हर चार में से एक लड़की अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाती।

2. रोजगार के अवसर

देश में महिलाओं को रोजगार के उतने अवसर नहीं मिल रहे हैं जितने पुरुषों को मिलते हैं। इस मामले में महिलाओं की स्थिति साल दर साल ख़राब होती जा रही है। आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2018 में सामने आया है कि वित्त वर्ष 2005-06 में 36 फीसदी महिलाएं कामकाजी थीं, जिनका स्तर 2015-16 में घटकर 24 फीसदी पर आ गया। 2017 में भारत विकास रिपोर्ट में कामकाजी महिलाओं की स्थिति में 131 देशों में भारत 120वें नंबर पर रहा। वर्ल्ड बैंक के 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में 39.28 फीसदी महिलाएं कामकाजी हैं लेकिन ओमान (12.9 फीसदी) अफगानिस्तान (17.3 फीसदी), जॉर्डन (17.7) अल्जीरिया (18.3 फीसदी), बहरीन (21 फीसदी), भारत (24.3) का हाल सबसे बुरा है। 1990 से 2017 तक कामकाजी महिलाओं की संख्या भारत (27.9 से 24.5 फीसदी), सीरियन अरब रिपब्लिक (20.7 से 14.4 फीसदी) यमन (19.7 से 7.9 फीसदी) पहुंच गई।

ये भी पढ़ें- आर्थिक सर्वेक्षण 2018 : क्यों कम हो रही है कामकाजी महिलाओं की संख्या 

3. असमान वेतन व्यवस्था

भारत सहित लगभग पूरी दुनिया में महिलाओं को वेतन में असमानता का सामना करना पड़ता है। हाल ही में बीबीसी लंदन की संपादक कैरी ग्रेसी ने अपने पद से इसीलिए इस्तीफा दे दिया था क्योंकि उनका वेतन ऊंची पोस्ट पर होने के बावजूद उनके पुरुष साथियों से कम था। भारत में भी महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है। वैसे तो भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को काफी बेहतर और आगे माना जाता है लेकिन कई हीरोइनों ने वहां भी वेतन की असमानता का मुद्दा उठाया है। अगर बॉलीवुड में सबसे ज़्यादा फीस लेने वाली अभिनेत्रियों की बात करें तो इसमें दीपिका पादुकोण का नाम सबसे ऊपर आता है और एक फिल्म के लिए 16 से 17 करोड़ रुपये मिलते हैं वहीं सलमान ख़ान एक फिल्म के लिए 60 से 70 करोड़ रुपये लेते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में पुरुषों को मुकाबले महिलाओं को 24.81 फीसदी कम वेतन मिलता है। भारत के गाँवों में जो महिलाएं मज़दूरी करती हैं या खेतों में काम करती हैं उन्हें भी पुरुषों के मुकाबले कम रुपये मिलते हैं। यहां तक कि सबसे विकसित देश अमेरिका में भी महिलाओं की आमदनी पुरुषों से कम है। वेबसाइट ग्लोबन सिटिजन के मुताबिक, अमेरिका में अगर एक पुरुष की औसत कमाई एक डॉलर है तो महिला को 0.77 डॉलर ही मिलता है।

4. कुपोषण

वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2017 के मुताबिक, दुनिया भर में 51 फीसदी महिलाएं एनीमिक हैं। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 18 पेश करते वक्त कहा कि भारत के लिए बाल व मातृ कुपोषण आज भी एक बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय पोषण निगरानी ब्यूरो (एनएनएमबी) के 2016 में कराए गए एक सर्वे के अनुसार, भारत में 35 फीसदी ग्रामीण महिलाओं का वजन औसत से कम है। यूनिसेफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में प्रजनन उम्र की एक तिहाई महिलाएं कुपोषित हैं और इनका बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्स) 18.5 किग्रा/मीटर2 से कम है।

इस बारे में बात करते हुए दिल्ली की पोषणविद डॉ. रुचि भाटिया बताती हैं, ''महिलाओं को उनता पोषण नहीं मिल पाता जितने की उन्हें ज़रूरत होती। इसके लिए कई मामलों में महिलाएं खुद ज़िम्मेदार होती हैं। वे दूध नहीं पीतीं, फल नहीं खातीं। महिलाओं को लगता है कि ये सब उनके बच्चे या पति खाएं तो ज़्यादा अच्छा होगा। कई परिवारों में ऐसा भी होता है कि महिलाओं की सेहत की ओर कोई ध्यान ही नहीं देता। उन्होंने क्या खाया, क्या पिया किसी को कोई मतलब नहीं होता, जिससे वे कुपोषण का शिकार हो जाती हैं।

ये भी पढ़ें- आर्थिक सर्वेक्षण 2018: महिला व बाल कुपोषण भारत के लिए अभी भी चुनौती

5. लिंग आधारित हिंसा

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, पूरी दुनिया में हर तीन में से एक महिला शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होती है। चाहे वह घरेलू हिंसा, बलात्कार या यौन शोषण हो लिंग आधारित हिंसा के मामले में महिलाओं का हाल बुरा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2018 के मुताबिक, भारत में अभी भी 46 फीसदी लोग बीवी को मारते हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 2016 में महिलाओं से लिंग आधारित हिंसा के 3,38,954 मामले दर्ज़ किए गए। गाँव हो या शहर महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं।

ये भी पढ़ें- दुनिया भर की महिलाएं बता रही हैं अपने साथ हुई यौन हिंसा की कहानियां... 

24 अगस्त 2017 को लखीमपुर खीरी में बीच सड़क पर एक युवक ने तलवार से नाबालिग लड़की पर हमला कर दिया और उसका हाथ काट दिया। 3 दिसंबर 2017 को भागलपुर के एक गाँव में कुछ बदमाशों ने खेत की रखवाली कर रही एक महिला को पहले जम कर पीटा और फिर उसी की हंसिया से उसका हाथ काट दिया, उन्होंने महिला को निर्वस्त्र कर उसकी साड़ी का फंदा बना कर उसके गले में डाल दिया उसे घसीटते हुए दफनाने के लिए ले गए लेकिन उस समय वहां कुछ लोग पहुंच गए और उस महिला को बचा लिया। ये बदमाश रंगदारी न देने से गुस्सा थे और इसके लिए इन्होंने महिला को अपना निशाना बनाया। अक्टूबर 2017 में पूरी दुनिया की महिलाओं ने मिलकर सोशल मीडया पर एक कैंपेन चलाया था #MeToo जिसमें उन्होंने अपने साथ होने वाली यौन शोषण की घटनाओं का ज़िक्र किया था। इस मुहिम को जिस तरह की प्रतिक्रिया मिली उससे पता चलता है कि विश्व में महिलाओं की क्या स्थिति है।

6. प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकार

विकासशील देशों में हर साल 74 मिलियन महिलाओं को अनचाना गर्भधारण करना पड़ता है और 36 मिलियन महिलाओं का का गर्भपात हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक, दुनिया भर में हर दिन 800 महिलाओं की मौत प्रेग्नेंसी से संबंधित मामलों के कारण हो जाती है। आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2018 के मुताबिक, भारत में महिलाओं को गर्भनिरोधक चुनना या है नहीं ये तय करने का प्रतिशत भी घटा है। 2005 - 06 में जहां गर्भनिरोधक चुनने के मामले में फैसले लेने वाली महिलाओं का आंकड़ा 93 फीसदी था वहीं 2015 - 2016 में ये घटकर 91 फीसदी हो गया। वहीं 2005 - 06 में जहां 33.8 फीसदी महिलाएं प्रतिवर्ती गर्भनिरोधक (लंबे समय वाले गर्भनिरोधक) का इस्तेमाल करती थीं वहीं 2015 - 16 में ये आंकड़ा घटकर 32.8 फीसदी हो गया।

7. बाल विवाह

एक अनुमान के मुताबिक, 2011 से 2020 से बीच दुनिया में 140 लड़कियां बाल विवाह का शिकार होंगी। 2016 के नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 के मुताबिक देश में तकरीबन 27 फीसदी लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र के पहले हो जाती है। वर्ष 2014 में आई यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विश्व में 15.6 करोड़ पुरुषों की तुलना में करीब 72 करोड़ महिलाओं की शादी 18 साल से कम उम्र में हुई। इनमें से एक तिहाई संख्या (लगभग 24 करोड़) भारतीय महिलाओं की है। बाल विवाह को लेकर इण्डिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के अनुसार 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में लगभग 17 लाख भारतीय बच्चोँ में से 6 प्रतिशत बच्चे जो 10 से 19 की उम्र के बीच में हैं, शादीशुदा हैं। कम उम्र में शादी हो जाने के कारण लड़कियों को पढ़ाई छूट जाती है, उनमें आत्मविश्वास की कमी आती है, वे घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं, उम्र से पहले मां बन जाती हैं, और भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

ये भी पढ़ें- बिहार : दहेज प्रथा, बाल विवाह के खिलाफ 5 करोड़ लोगों ने थामे हाथ

First Published: 2018-01-31 17:41:30.0

Share it
Share it
Share it
Top