जानिये कौन है ‘शी दादा’, चीन के राष्ट्रपति चुनाव में क्या है इनका महत्व 

जानिये कौन है ‘शी दादा’, चीन के राष्ट्रपति चुनाव में क्या है इनका महत्व china

नई दिल्ली। विश्व के किसी भी देश में जब राष्ट्रपति चुनाव की आहट सुनाई देती है तो पूरा विश्व उस देश की ओर टकटकी लगाए देखता रहता है कि अब नया क्या होने वाला है। ऐसी ही एक आहट अब चीन से सुनाई दे रही है। चीन में जल्दी ही नए राष्ट्रपति का चुनाव होने जा रहा है।

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हर पांच साल पर दुनिया की नज़र चीन में होने वाली सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस पर जाती है। इसी कांग्रेस में तय किया जाता है कि कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा। जिसके हाथ में कम्युनिस्ट पार्टी की कमान होती है, वो चीन के एक अरब 30 करोड़ लोगों पर शासन करता है। इसके साथ ही वो शख्स दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का संचालन करता है।

कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस, चीन

चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं कांग्रेस की बैठक 18 अक्टूबर से शुरू होने जा रही है। इसी कांग्रेस में कम्युनिस्ट पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन की उम्मीद की जाती है। हालांकि इस बार व्यापक पैमाने पर कहा जा रहा है कि शी जिनपिंग राष्ट्रपति के पद पर बने रहेंगे।

कांग्रेस ऐसे करती है चुनाव

मध्य अक्टूबर में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) देश भर से प्रतिनिधियों को नियुक्त करती है। इसके बाद बीजिंग के ग्रेट हॉल में बैठक होती है।

चीन में पोलित ब्यूरो स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य ग्रेट हॉल में (फोटो -साभार - बीबीसी)

बीबीसी में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार पार्टी के 2,300 प्रतिनिधि हैं, हालांकि 2,287 प्रतिनिधि ही इस बैठक में शामिल होंगे। रिपोर्टों के मुताबिक़ 13 प्रतिनिधियों को अनुचित व्यवहार के कारण अयोग्य ठहरा दिया गया है।

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बंद दरवाज़े के भीतर सीपीसी शक्तिशाली सेंट्रल कमेटी का चुनाव करेगी। सेंट्रल कमेटी में क़रीब 200 सदस्य होते हैं। यही कमेटी पोलित ब्यूरो का चयन करती है और पोलित ब्यूरो के ज़रिए स्थायी समिति का चयन किया जाता है। ये दोनों कमेटियां चीन में निर्णय लेने वाले असली निकाय हैं। पोलित ब्यूरो में अभी 24 सदस्य हैं जबकि स्टैंडिंग कमेटी के सात सदस्य हैं। हालांकि सदस्यों की संख्या में आने वाले सालों में परिवर्तन होता रहता है।

कहने के लिए तो एक मतदान होता है, लेकिन असल में वर्तमान नेतृत्व में ज़्यादातर लोग पहले से ही तय होते हैं और कमेटी सिर्फ़ फ़रमानों का पालन करती है। सेंट्रल कमेटी पार्टी के शीर्ष नेता का भी चुनाव करती है जिसे कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव कहा जाता है। जो सीपीसी का महासचिव होता है वही देश का राष्ट्रपति बनता है। इस बार कहा जा रहा है कि शी जिनपिंग राष्ट्रपति बने रहेंगे।

क्या होने जा रहा है?

19वीं कांग्रेस का ध्यान इस बार मुख्य रूप से दो चीज़ों पर है। पहला यह कि शी जिनपिंग अगले पांच सालों के लिए चीन की नीति की दिशा को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करेंगे और विश्लेषक इस रिपोर्ट को परखेंगे। दूसरी बात यह है कि पोलित ब्यूरो स्टैंडिंग कमिटी को पूरी तरह से बदलाव की उम्मीद है। हाल के वर्षों में पार्टी ने कुछ ख़ास पदों पर अनौपचारिक कार्यकाल और उम्र सीमा को तय किया है। उम्मीद है कि ज़्यादातर पोलित ब्यूरो सदस्य हट जाएंगे क्योंकि वो रिटायरमेंट की उम्र 68 साल को पार कर चुके हैं।

इसमें भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी के प्रमुख वॉन्ग किशान भी शामिल हैं। हालांकि वॉन्ग, शी जिनपिंग अहम सहयोगी हैं और उन्हें पद पर बने रहने दिया जा सकता है। राष्ट्रपति शी और प्रीमियर ली किकियांग की उम्र 65 के आसपास है।

उम्मीद की जाती है कि कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में चीन के भविष्य के नए नेताओं को आगे किया जाता है। संभव है कि शी का कोई उत्तराधिकारी चुना जाए जो देश को अगले पांच सालों तक चलाएगा। हालांकि ऐसी अटकलें हैं कि शी इस बार परंपरा को तोड़ सकते हैं।

शी जिनपिंग की ताक़त

2012 में जब शी जिनपिंग सत्ता में आए तब से उन्होंने अपनी ताक़त में बेशुमार बढ़ोतरी की है। शी जिनपिंग को कई टाइटलों से नवाजा गया। उन्हें 'कोर लीडर ऑफ चाइना' का भी टाइटल दिया गया। इस टाइटल के ज़रिए वो माओत्से तुंग जैसे नेताओं की पंक्ति में खड़े हो गए। कहा जा रहा है कि कांग्रेस में शी जिनपिंग के सहयोगियों की संख्या काफ़ी है। ऐसे में पार्टी चार्टर में शी जिनपिंग की नीतियों को स्थापित करना आसान होगा।

अगर ऐसा होता है तो चीन के राजनीतिक इतिहास में शी जिनपिंग माओ के स्तर तक पहुंच जाएंगे। कुछ लोगों का मानना है कि वो परंपरागत रूप से राष्ट्रपति के दो कार्यकाल की सीमा को बढ़ाने की भी घोषणा कर सकते हैं। 2012 में राष्ट्रपति बनने के बाद से शी ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को प्रभावी तरीक़े से चलाया। 10 लाख से ज़्यादा अधिकारियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई हुई। हालांकि कई लोग इसे विरोधियों के ख़िलाफ़ क़दम के रूप में भी देखते हैं।

शी के नाम से भी एक आंदोलन चला। इन वजहों से वहां के मीडिया में शी की छवि भी चमकी। इन्हीं कारणों से शी को प्यार से 'शी दादा' उपनाम भी दिया गया।

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बाक़ी दुनिया के लिए इसका मतलब क्या है?

विश्लेषकों मानना है कि स्टैंडिंग कमेटी में बड़े फेरबदल से कुछ बड़ा नीतिगत बदलाव आ सकता है। हालांकि दुनिया के लिए चीन के रुख़ में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। शी के फिर से चुने जाने पर स्थिरता बनी रहेगी। चीन में आर्थिक सुधार का कार्यक्रम अभी जारी है। इसमें शी का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और अधिनायकवादी शासन भी शामिल है।

शी के नेतृत्व में चीन वैश्विक स्तर पर कई मामलों में मुखर रूप से सामने आया है। इसमें ख़ासकर दक्षिण चीन सागर का विस्तार और 'वन बेल्ट वन रोड' अहम हैं। डोनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमरीका की जो स्थिति है, उसमें चीन ख़ुद को एक वैकल्पिक सुपर पावर के रूप में पेश कर रहा है। हालांकि एक सवाल अब भी बाक़ी है- उत्तर कोरिया और उसका परमाणु संकट।

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