गंगा के लिए छोड़ दी रासायनिक खेती, गंदा पानी साफ करने के लिए बनवाए फिल्टर

गंगा के लिए छोड़ दी रासायनिक खेती,  गंदा पानी साफ करने के लिए बनवाए फिल्टरहर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं बावजूद गंगा अभी तक मैली ही है।

कानपुर नगर। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकारी कोशिशों के साथ ग्रामीणों ने अपने स्तर पर नई पहल शुरू की है। गंगा नदी और नोन नदी के किनारे बसे पाँच गाँवों के 300 लोग गंगा मित्र बनकर 300 एकड़ खेती जैविक ढंग से कर रहे हैं, जिससे गंगा नदी प्रदूषित होने से बचे। जुलाई महीने में गंगा किनारे बसे इन गाँवों के लोगों ने गाँव में एक फिल्टर चैंबर का निर्माण करवाया, जिससे बारिश और घरों का गंदा पानी फिल्टर होकर गंगा नदी में जाये।

गंगा नदी पांच राज्यों से होकर गुजरती है, जिसमें प्रतिदिन उत्तराखंड में लगभग 44 करोड़ लीटर उत्तर प्रदेश में 327 करोड़ लीटर, बिहार में 40 करोड़ लीटर और पश्चिम बंगाल में 178 करोड़ लीटर सीवेज और फैकि्ट्रयों का प्रदूषित पानी गिरता है। इसके साथ ही भारी मात्रा में खेतों में प्रयुक्त रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों वाला पानी भी गंगा में जाता है, जिससे जलीव जीवों को नुकसान पहुंचता है। इसी लिए कुछ गैरसरकारी संस्थाओं और किसानों ने मिलकर नई मुहिम शुरु की है। जिसका नाम जीवन के लिए नदियाँ,नदियों के लिए जीवन रखा है।

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गंगा में गंदा पानी न जाए इसलिए गंगा मित्रों ने बनवाए हैं फिल्टर चैंबर।

किसानों ने बंद किया रसायनों का इस्तेमाल शुरू की जैविक खेती

कानपुर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर शिवराजपुर ब्लॉक का सीताराम मानाताला गाँव गंगा के किनारे बसा है। इस गाँव के किसानों ने गंगा मित्र बनकर ये संकल्प लिया है कि हम सब मिलकर गंगा नदी को प्रदूषित होने से रोकेंगे। इस गाँव में रहने वाले विपिन तिवारी (35 वर्ष) बताते हैं, “गंगा के करीब खेतों और गाँव का सारा गंदा पानी सीधे नदी में जाता है। इस प्रदूषित पानी को सीधे गंगा नदी में जाने से रोकने के लिए हम लोगों ने गंगा किनारे के खेतों में रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करना बंद कर दिया। फ़िल्टर चैम्बर के द्वारा अब गाँव का गन्दा पानी गंगा नदी में फ़िल्टर होकर जाता है। सीताराम मानाताला गाँव निवासी सतपाल (38 वर्ष) बताते हैं, “पिछले कई वर्षों से हम उर्वरक और कीटनाशकों की मदद से खेती कर रहे थे। पिछले वर्ष गाँव में हुई मीटिंग के दौरान ये पता चला कि रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल करने से सिर्फ खेती ही बंजर नहीं हो रही है बल्कि पवित्र मानी जाने वाली गंगा नदी भी प्रदूषित हो रही हैं। वो आगे बताते हैं कि जिस गंगा को पवित्र मानकर हम अपने घरों में पूजा के लिए इस्तेमाल करते हैं, उसी गंगा को हम लोग ही प्रदूषित कर रहे थे। पर अब हम लोग गंगा मित्र बनकर ये मुहिम चला रहे हैं कि जैविक ढंग से खेती करेंगे और गंगा को दूषित होने से बचाएंगे।”

गंगा के किनारे कम से कम 29 बड़े शहर, 70 कस्बे और हजारों गाँव स्थित हैं, अगर सभी लोग मिलकर गंगा को निर्मल बनाने के अभियान में शामिल हो तभी गंगा साफ हो सकती है। हम लोग बिजनौर, मुरादाबाद, बरेली, शाहजहांपुर, कानपुर और फतेहपुर में स्थानीय लोगों और किसानों को गंगा मित्र बना दिया है, वे जैविक खेती तो कर रही रहे हैं अपने गांव में फिल्टर चैंबर भी बनवा रहे हैं।
राजेश वाजपेयी, प्रोजेक्ट मैनेजर, डब्लूडब्लूएफ

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WWF के सहयोग से शुरू हुआ अभियान

गाँव में जैविक ढंग से खेती करने और फ़िल्टर चैम्बरों का निर्माण एक गैर सरकारी संस्था डब्लूडब्लूएफ के एक प्रोजेक्ट के तहत किया गया। डब्लूडब्लूएफ प्रोजेक्ट के जिला समन्यवक राजेश वाजपेयी कहते हैं, “गंगा नदी के किनारे कम से कम 29 बड़े शहर, 70 कस्बे और हजारों गाँव स्थित हैं, अगर सभी लोग मिलकर गंगा को निर्मल बनाने के अभियान में शामिल हो तभी हम इन आंकड़ों को समाप्त कर सकते हैं। हम लोग अभी छह जिलों (जहां से गंगा गुजरती है) बिजनौर, मुरादाबाद, बरेली, शाहजहांपुर, कानपुर और फतेहपुर में इस अभियान को चला रहे हैं। कुछ साथियों के साथ ये पहल शुरू की थी फिलहाल कानपुर नगर के शिवराजपुर ब्लॉक के 300 गंगा मित्र बन गये हैं जो इस मुहिम को आगे ले जा रहे हैं।

परियोजना समन्यवक सोम नाथ शुक्ला इस प्रोजेक्ट के बारे में बताते हैं, “जब गंगा की सफाई का काम शुरू हुआ तो सबसे ज्यादा गंदगी नदी के आस-पास के गाँवों के पास मिली, इसलिए सबसे ज्यादा जरूरी हो गया की इन गाँवों को इस सफाई अभियान में सबसे पहले शामिल किया जाए।” फिल्टर चैम्बर बनाकर इस मुहिम की शुरुवात की थी,अब जैविक ढंग से किसान खेती करे इसके लिए किसानों को प्रेरित कर रहे हैं। वो आगे बताते हैं, “गंगा नदी के किनारे काकूपुर निहाल,मुहपोछा,काकूपुर सीताराम,मनाताला गाँवों के 180 किसान और नोन नदी कि किनारे बसे गाँव हरनू और दहारुद्रपुर के 120 किसान मिलकर 300 एकड़ खेती जैविक ढंग से कर रहे हैं।”

गंगा पास होने की वजह से खेत और गाँव का सारा गंदा पानी सीधे नदी में जाता है। इस प्रदूषित पानी को सीधे गंगा नदी में जाने से रोकने के लिए हम लोगों ने गंगा किनारे के खेतों में रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करना बंद कर दिया। साथ ही गांव में फिल्टर चैंबर बनाए हैं जहां से पानी फिल्टर होने के बाद गंगा में जाता है। इससे गांव की गंदगी नदी में नहीं जाती है।
विपिन तिवारी, निवासी, सीता मानाताला, कानपुर नगर, यूपी

रसायन मुक्त खेती के साथ मूर्तियों का विर्सजन भी बंद

जैविक खेती के जानकार और श्रमिक भारती संगठन से जुड़े राना सिंह बताते हैं, “गंगा के किनारे बसे पाँच गाँव के किसानों के साथ लगातार मीटिंग होती है,उन्हें जैविक खेती के लिए जागरूक किया जा रहा हैं जिससे वो गंगा नदी के जलीय जन्तुओं को भी हानि न पहुंचायें। गंगा मित्र ने ये शपथ ली है कि वो पानी को बेवजह बर्बाद नहीं करेंगे,रसायन मुक्त खेती करेंगे।”

नदियों में उड़ेले जा रहे रासायनिक कचरे के साथ मूर्ति आदि के विसर्जन से भी काफी गंदगी होती है। इसलिए इन गांवों के लोगों ने मूर्तियों का विसर्जन गंगा में न करने का फैसला किया है। राना सिंह आगे बताते हैं, “घर की मूर्तियाँ गड्डे में खोदकर डाल देंगे, गंगा नदी में इसका विसर्जन नहीं करेंगे। इससे बहुत बड़ा परिवर्तन तो नहीं हो सकता पर ये परिवर्तन की एक शुरुवात है। किसानों को जैविक खादें जैसे घनामृत,जीवाम्रत,बीजाम्रत बनाने की विधी बतायी जा रही हैं,इससे न सिर्फ गंगा नदी प्रदूषित होने से बचेगी बल्कि लागत कम और परिवार स्वस्थ्य रहेगा।”

तीस हजार रुपये में ऐसे बनता है फिल्टर चैंबर

फिल्टर चैंबर की लागत करीब 30 हजार रुपये है। इसके लिए एक गुणा 2 मीटर गहरे दो गड्ढे खोदे जाते हैं। दोनों गड्ढ़ों के बीच के बीच एक मीटर की दूरी रखी जाती है। फिर दोनों की तली को पाइप से जोड़ दिया जाता है। दोनों गड्ढ़ों को चारों तरफ से प्लास्टर कर अमरुद के आकार दोनों में करीब 50 फीट रोड़ी डाल दी जाती है। फिर आरसीसी गिट्टी पांच फीट और 5 फीट मौरंग डाली जाती है। इसके बाद दोनों गढ्ढों को ढक्कन से ढक दिया जाता है। गाँव की मुख्य नाली को फ़िल्टर चैंबर से जोड़ दिया जाता है,एक फ़िल्टर चैंबर से दूसरे चैंबर में पानी फ़िल्टर होकर गंगा नदी में जाता है।

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