तो रोटी, कपड़ा और मकान नहीं रह जाएंगी आपकी मूलभूत ज़रूरत

तो रोटी, कपड़ा और मकान नहीं रह जाएंगी आपकी मूलभूत ज़रूरतक्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर

बचपन से आप एक कहावत सुनते आ रहे होंगे कि रोटी, कपड़ा और मकान हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं। यानि हमारे ज़रूरत की ऐसी चीज़ें जिनके बिना हमारा जीना मुश्किल हो सकता है। ये बात आपके बड़ों ने आपको समझाई होगी और आप ने भी शायद अपने से छोटों को यही बताया हो लेकिन पिछले दिनों दिल्ली में प्रदूषण का जो हाल था, उससे कहीं न कहीं ये कहावत बदलती नज़र आ रही है।

अब हमारे लिए यही बहुत है कि हमें स्वस्थ खाना, स्वच्छ हवा और शुद्ध पानी मिल जाए। किसान जिस तरह से अपनी फसल में कार्बनिक उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसने हमारे साथ - साथ पर्यावरण के लिए भी संकट पैदा कर दिया है।

दुनिया की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है और इसी के साथ खाद्य उत्पादों की मांग भी बढ़ रही है। मांग को पूरा करने और जल्दी से जल्दी ज़्यादा उत्पादन के लिए किसान अपने खेतों में हद से ज़्यादा रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल करने लगे हैं। खाद से लेकर कीटनाशक तक सब कुछ रासायनिक। इन रसायनों का हमारे स्वास्थ्य पर जितना असर पड़ता है उतना ही असर इनका जलवायु पर भी पड़ता है। खेती का अगर पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता रहा तो खाद्य सुरक्षा पर भी संकट पैदा हो सकता है।

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कृषि और जलवायु परिवर्तन के बीच का रिश्ता दो तरफा है। अगर जलवायु परिवर्तन का असर कृषि पर पड़ता है तो जलवायु पर भी कृषि का नकारात्मक असर पड़ता है। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि 19 - 29 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कृषि के कारण होता है और इसका लगभग 74 प्रतिशत अविकसित देशों से होता है। अगर कृषि क्षेत्र से ये उत्सर्जन कम नहीं किया गया तो आने वाले समय में ग्रीन हाउस गैसों के कुल उत्सर्जन का लगभग 70 प्रतिशत सिर्फ कृषि से ही होगा जिससे तापमान 2 डिग्री सेल्सियस (स्रोत) तक बढ़ जाएगा।

इस तरह पड़ रहा है प्रभाव

जलवायु परिवर्तन के कारण पहले से ही दुनिया भर में औसत तापमान बढ़ रहा है और भविष्य में, तापमान न केवल गर्म लेकिन अधिक अस्थिर भी होने का अनुमान है। इससे अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता जाएगा कि किस क्षेत्र में कब और कितनी बारिश होगी। मौसम में हो रहे इन बदलावों से तूफान, बाढ़, लू, बर्फीले तूफान और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी ज़्यादा आएंगी। इससे समुद्र का जलस्तर और लवणता बढ़ेगी, जिससे पूरे इकोसिस्टम (पारिस्थतिक तंत्र) में गड़बड़ी बढ़ती जाएगी। इन सभी परिवर्तनों के कारण कृषि, वन और मत्स्य पालन पर गहरा असर होगा।

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जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा नकारात्मक असर कृषि क्षेत्र पर ही पड़ता है क्योंकि लगभग हर फसल और पशु अलग - अलग पर्यावरणीय परिस्थिति में विकसित होता है कृषि क्षेत्र विशेषकर जलवायु परिवर्तन के लिए कमजोर है क्योंकि विभिन्न फसलों और जानवरों को विभिन्न परिस्थितियों में कामयाब होना होता है। हर फसल हर तरह की जलवायु में नहीं पैदा हो सकती, उसे विशेष तापमान और पानी की उपलब्धता की ज़रूरत होती है, जिस कारण कृषि क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन का ख़तरा हमेशा मंडराता रहता है। इसके अलावा, पौधे, कीटनाशक और बीमारियों की संभावना भी बढ़ेगी, ये कारक कृषि के लिए संकट ही पैदा करेंगे।

दिखने लगा है असर

जलवायु परिवर्तन से खेती पर काफी नकारात्मक असर हो सकता है और इसके संकेत अभी से दिखना शुरू हो गए हैं। खेतों में पैदावार कम हो रही है, मौसम का अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता जा रहा है, जिससे फसल के साथ - साथ पशुधन पर भी असर पड़ रहा है। मध्य प्रदेश के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दशरथ पांडेय का कहना है कि अगर किसानों ने जल्द ही जलवायु परिवर्तन के हिसाब से फसल चक्र को नहीं बदला तो आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा पर संकट खड़ा हो सकता है। वह कहते हैं कि क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर के ज़रिए इस समस्या से कुछ हद तक छुटकारा मिल सकता है।

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खाद्य सुरक्षा पर संकट

वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विकासशील देशों की 12.9 फीसदी आबादी भूख से जूझ रही और कुपोषण का शिकार है। इसी के साथ 1.4 अरब से ज़्यादा लोग अधिक वजन की समस्या से परेशान हैं और हम दुनिया में कुल पैदा होने वाले खाद्यान्न का एक तिहाई हिस्सा बर्बाद कर देते हैं। संयुक्त राष्ट्र की 2015 में ज़ारी एक रिपोर्ट के अनुसार 2050 दुनिया की कुल जनसंख्या 9.7 अरब तक पहुंच जाएगी। इसी बीच दुनियाभर में खाने पीने की आदतों में भी बड़ा बदलाव आने वाला है, मांसाहारी लोगों की संख्या में भी इजाफा होगा। एलेक्ज़ेंद्राटॉस और ब्रुंस्मा की 2014 में ज़ारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल जिस तरह से पूरी दुनिया में खाद्यान्न की बर्बादी हो रही है उससे ऐसा लगता है कि 2050 तक 60 प्रतिशत ज़्यादा खाद्य उत्पादन की ज़रूरत होगी।

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भारत जैसे विकासशील देशों में कृषि आज भी खाद्य, रोजगार और कमाई का मुख्य ज़रिया है, इसके बाद भी ये चौंकाने वाली बात है कि खेती दुनिया की लगभग 75 प्रतिशत ग़रीब आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। कृषि विकास अक्सर गरीबी को कम करने और खाद्य सुरक्षा बढ़ाने में दोनों के लिए सबसे प्रभावी और न्यायसंगत रणनीति है लेकिन इसका भी अब उल्टा असर हो रहा है।

ज़्यादा उत्पादकता की ज़रूरत

क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर (सीएसए) में भूमि, फसली क्षेत्र, पशुधन, जंगल, मछली पालन जैसे खेती से जुड़े सभी घटकों को जोड़ते हुए इस तरह से काम किया जाता है कि जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा पर कोई असर न पड़े। खाद्य उत्पादन को बढ़ाकर खाद्य और पोषण सुरक्षा को बढ़ाया जा सकता है। साथ ही इससे किसानों की आय भी बढ़ सकती है। खेती में रसायनिक उर्वरकों, खाद और कीटनाशकों का प्रयोग करने से भी पर्यावरण को काफी नुकसान होता है। इसलिए किसानों को जैविक खेती की ओर ध्यान देना चाहिए। प्रति किलो खाद्य उत्पादन पर कम कार्बन का उत्सर्जन, जंगलों का कटान रोककर और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देकर भी पर्यावरण में कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।,

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हरियाणा के किसान कर रहे हैं इस तरह की खेती

इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) और आईसीएआर का प्रोजेक्ट नेशनल इनीशिएटिव ऑन क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर ने हरियाणा के लगभग 27 ज़िलों में एक पार्टनरशिप के तहत क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर पर काम कर रहे हैं। हरियाणा की सरकार भी उनके इस प्रोजेक्ट में उनके साथ है। भारत के हरियाणा राज्य में, जलवायु-स्मार्ट गांवों को एनआईसीआरए के निकट सहयोग में और कई नवीन साझेदारी के माध्यम से कार्यान्वित किया गया है। अंतर्राष्ट्रीय मक्का और गेहूं सुधार केंद्र (सीआईएमएमवाईटी) खाद्य सुरक्षा और कृषि (सीसीएएफएस) राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान और विस्तार प्रणाली, व हरियाणा का कृषि विभाग मिलकर इस पर काम कर रहे हैं। (स्रोत)

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केंद्रीय मृदा लवणता शोध संस्थान के डॉक्टर आईसीएआर व सीआईएमएमवाईटी के वैज्ञानिक इसमें शामिल हैं। इसमें शामिल किसानों को ये बात समझाई गई की दक्षिणी एशिया की खेती को भी अब नई प्रौद्यगिकी, प्रासंगिक प्रथाओं के समुदाय आधारित अनुकूलन और स्थानीय निर्णय लेने मजबूती की ज़रूरत है। इन 27 क्लाइमेट स्मार्ट गाँवों में क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर का प्रसार किया जाएगा। इसमें पानी, ऊर्जा, कार्बन पोषक तत्व, मौसम और ज्ञान पर केंद्रित खेती होगी।

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