पैराडाइज पेपर में शामिल इन कंपनियों से आपका सीधा नाता, नाम जानेंगे ?

पैराडाइज पेपर में शामिल इन कंपनियों से आपका सीधा नाता, नाम जानेंगे ?पैराडाइज

भारत में 8 नवंबर 2016 को हुई नोटबंदी का एक साल पूरा होने में सिर्फ 2 दिन बाकी हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने जब नोटबंदी की थी तो इसे कालेधन पर प्रहार बताया था। इस 8 नवंबर को सरकार एन्टी ब्लैक मनी डे भी मनाने वाली है, लेकिन क्या काले धन पर प्रहार करने में सरकार पूरी तरह कामयाब हुई है? क्या भारत में टैक्स चोरी बंद हो गई है? ऐसे कई सवालों को पैदा करती एक रिपोर्ट आज मीडिया में सुर्खियां बनी हुई है। यह रिपोर्ट है पैराडाइज पेपर्स की।

पैराडाइज पेपर्स एक करोड़ 34 लाख पेपर्स का ऐसा सेट है जिसमें दुनिया के 180 देशों के ऐसे अमीर लोगों का नाम शामिल है जो पैसे को विदेशों में जमा करते हैं। इस लिस्ट में भारत का नाम 19वें नंबर है और इसमें भारत के 714 लोगों का नाम है। इस लिस्ट में शामिल अमीर लोगों का पैसा विदेशों में जमा कराने का काम दो फर्म करती हैं - बरमूदा की एप्पलबी और सिंगापुर की एशियासिटी।

आईसीआईजे की वेबसाइट के मुताबिक ये कंपनियां कुछ ऑफशोर यानि शेल कंपनियों के ज़रिए टैक्स का पैसा बचाती हैं। शेल कंपनियां ऐसी कंपनियां होती हैं जिनके पास कोई पंजीकृत दफ्तर और कर्मचारी नहीं होते। कई बार बड़ी कंपनियों के मालिक अपने छुपे हुए काले धन को अपने खाते में लाने के लिए भी शेल कंपनियां बनाते हैं। मान लीजिए किसी कंपनी के पास एक करोड़ रुपये हैं। ब्लैक मनी है। इस पैसे को खाते पर लाने के लिए कंपनी का मालिक एक लाख रुपये एंट्री आपरेटर को देता है। जो इसे 10,000 के शेयर में बांट देता है। एक शेयर की कीमत 10 रुपये होती है। एक एक शेयर को एक हज़ार रुपये की कीमत पर बेच दिया जाता है। ख़रीदने वाला शेल कंपनी का निदेशक होता है। इससे एक ही झटके में कंपनी की वैल्यू एक लाख से बढ़कर एक करोड़ हो जाता है। फिर फर्ज़ी कंपनियों के नेटवर्क के ज़रिये यही पैसा असली मालिक के पास पहुंच जाता है। यानी जिसने अपने एक करोड़ रुपये को खाते पर लाने के लिए ये सब किया है। इसके बदले में एंट्री आपरेटर कुछ शुल्क लेता है।

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कोपेनहैगेन बिजनेस स्कूल के सर्टिफाइड वेल्थ मैनेजर ब्रूक हैरिंगटन ने आईसीआईजे को बताया, ''ऑफशोर कंपनियां वे कंपनियां है जो ग़रीबों को और ग़रीब बनाती हैं और लोगों में पैसे की जो असमानता है उसे और गहरा करती हैं।

इस लिस्ट में भारत सहित कई देशों की ऐसी कई कंपनियों का भी नाम है जिनसे हम किसी न किसी रूप में जुड़े हैं। किसी कंपनी का हम उत्पाद इस्तेमाल करते हैं तो किसी कंपनी की सेवा लेते हैं। जानिए उन कंपनियों के बारे में...

हैवेल्स इंडिया

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, बिजली के उपकरण बनाने वाली कंपनी हैवेल्स इंडिया की फरवरी सन, 2000 से 50 ऑफशोर कंपनियां चल रही हैं, इनमें से ज़्यादातर टैक्स हैवेन कहे जाने वाले देशों में हैं। अपने व्यापार का पूरी दुनिया में विस्तार करने के लिए हैवेल्स इंडिया लिमिटेड ने आइल ऑफ मैन में हैवेल्स होल्डिंग्स लिमिटेड की स्थापना की। हैवल्स माल्टा में इसके बदले 14,15.25 लाख यूरो का निवेश किया गया जिससे यूरोप, लैटिन अमेरिका और एशिया में 52 सहायक कंपनियों का वैश्विक प्रसार हो गया।

फोर्टिस एस्कॉर्ट अस्पताल

फोर्टिस एस्कॉर्ट अस्पताल के चेयरमैन डॉ. अशोक सेठ जिन्हें पद्म भूषण व पद्म श्री सम्मान मिल चुका है, ने 2004 में सिंगापुर में लिस्टेड कंपनी बायोसेंसर इंटरनेशनल ग्रुप लिमिटेड के शेयर लिए थे। ये कंपनी स्टेंट बनाती है।

डॉ. अशोक ने ये शेयर कंपनी के सार्वजनिक होने से पहले लिए थे। उन्होंने 90,000 डॉलर में 2,55,000 शेयर खरीदे और लगभग 1.03 करोड़ रुपये में उन्हें बेच दिया। उन्होंने खरीद पर 54 लाख रुपये का लाभ कमाया। उन्होंने अपने मरीज़ों से इस कंपनी के स्टेंट लेने के लिए कहा और इससे लाभ कमाया।

यूनाइटेड स्प्रिट लिमिटेड

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, उस समय विजय माल्या के स्वामित्व वाली कंपनी यूनाइटेड स्प्रिट लिमिटेड, इंडिया ने 1.5 अरब डॉलर का इस्तेमाल चार ऑफशोर कंपनियां बनाने में किया। जब डायजो समूह ने यूएसएल इंडिया को माल्या से ख़रीद लिया, इसके बाद इन तीन ऑफशोर कंपनियों से छुटकारा पाने के लिए एक पुनर्गठन प्रक्रिया की। और इसलिए प्रभावी रूप से इन सहायक कंपनियों द्वारा बकाया 1.5 अरब डॉलर के ऋण को माफ़ कर दिया। 1.5 अरब डॉलर की कर्ज माफी और नौवहन के परिणामस्वरूप मल्या ने 12,500 करोड़ रुपये से अधिक का लाभ ले लिया है, जिसके बारे में डीआईजीओ ने बीएसई को सूचित किया है। यह ऐप्पलबी दस्तावेजों में 10,000 करोड़ रुपये की आमदनी है।

ओमदियार नेटवर्क

नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा, 2014 में लोकसभा चुनाव जीतने से पहले ओमदियार नेटवर्क के मैनेजिंग डायरेक्टर थे। ओमदियार नेटवर्क ने अमेरिका की कंपनी डिलाइट डिजाइन में निवेश किया था जो कैरेबियन सागर में केमैन द्वीप समूह की सहायक कंपनी है। डी लाइट डिजाइन इंक 2006 में सैन फ्रांसिस्को, कैलिफ़ोर्निया में स्थापित की गई थी।

हालांकि जयंत सिन्हा ने सफाई देते हुए कहा कि लेनदेन मैंने अपने लिए नहीं, कंपनी के लिए किया था और जब मैं राजनीति में भी नहीं था और सबकुछ बताकर किया गया था। सिन्हा का कहना है कि उन्होंने जो भी लेनदेन किया था वह कंपनी की तरफ से किया था और वह पूरी तरह से कानूनी और प्रमाणिक था।

और भी कई प्रमुख कंपनियों के नाम हैं शामिल

इस लिस्ट में भारत के हिंदुजा ग्रुप, एम्मार इंडिया, अपोलो टायर्स, जीएमआर ग्रुप, हीरानंदानी ग्रुप, जिंदल स्टील एंड पॉवर, वीडियोकॉन जैसी कंपनियों के नाम हैं। इसके आलावा, फेसबुक, याहू, मैकडोनाल्ड्स, नाइकी, एप्पल, उबर, वॉलमार्ट जैसी बड़ी कंपनियों के नाम भी इस लिस्ट में हैं।

क्या सभी ऑफशोर कंपनियां अवैध होती हैं?

ऐसा ज़रूरी नहीं है कि सभी ऑफशोर कंपनियां अवैध होती हैं।हालांकि पैराडाइज पेपर्स को जारी करने वाली अमेरिका की संस्था इंटरनेशनल कॉन्सोर्टियम ऑफ इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिस्ट्स (आईसीआईजे) ने साफ किया है कि ऐसा ज़रूरी नहीं है कि जिन लोगों के नाम इस लिस्ट में हैं। उन्होंने टैक्स चोरी की हो। अगर उन लोगों ने अपनी बैलेंस शीट में ये दिखाया है कि उनका पैसा विदेश में जमा है तो उन्हें टैक्स चोर नहीं माना जा सकता।

मुंबई में रहने वाले सीए वीरेंद्र पाडेय गाँव कनेक्शन को बताते हैं, ''भारत का अलग अलग देशों के साथ अनुबंध होता है, ताकि किसी भी नागिरक को एक साथ दो देशों में अलग - अलग टैक्स न देना पड़े। इसके लिए हर राज्य की सरकार का अलग अलग अनुबंध है।

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'मान लीजिए कि भारत का कोई नागरिक, अमेरिका में कोई ट्रांजेक्शन करता है तो उसे वहां भी टैक्स देना पड़ता है और अगर वो भारत की फर्म का कर्मचारी है तो उसे यहां भी टैक्स देना पड़ता। इस बात से बचने के लिए सरकार ने रास्ता निकाला है ताकि एक व्यक्ति को दो - दो बार टैक्स न देना पड़े। इसे डबल टैक्सेशन अवॉइडेंस एग्रीमेंट्स (DTAAs) का नाम दिया गया है। इसके मुताबिक, अगर अमेरिका में किसी ट्रांजेक्शन पर टैक्स लिया गया तो भारत में उस पर टैक्स नहीं लिया जाएगा। डीटीएए में अलग - अलग देशों के साथ अलग अलग टैक्स दरें निर्धारित हैं। ऐसे में कुछ कंपनी या लोग ऐसे देशों में अपना पैसा लगाते हैं जहां किसी भी ट्रांजेक्शन पर कोई टैक्स नहीं लगता, और भारत में भी डीटीएए के कारण उनसे कोई टैक्स नहीं लिया जाता।''

फिर क्यों हो रही है खुलासे के बारे में बात

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, ऐसे खुलासों से रेग्युलेटर्स को गोपनीयता की बाधा को दूर करने में मदद मिलती है। जैसे, पनामा पेपर्स लीक के बाद रेग्युलेटर्स को हर जगह मोसैक फोन्सेका के रिकॉर्ड में छिपे हुए टैक्स चोरी के कई मामलों की जांच करने में आसानी हो गई थी। पैराडाइज पेपरों में जो जानकारी दी गई है उससे भी टैक्स चोरों को पकड़ने में रेग्युलेटर्स को काफी आसानी होगी। आम तौर पर, एक कंपनी अपने वित्तीय मामलों को व्यवस्थित करने की हकदार है, चाहे वह अपनी टैक्स के बोझ को कम करना चाहती है।

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