मच्छर से मौत कब बनेगी चुनावी मुद्दा ? 

मच्छर से मौत कब बनेगी चुनावी मुद्दा ? सरकारी आंकड़ों के मुताबिक डेंगू से प्रदेश में 119 मौतें हो चुकी हैं।

लखनऊ। यूपी में विधानसभा चुनाव का विगुल बज चुका है। जाति, धर्म और राष्ट्रवाद के बहाने वोटरों के लुभाने और बांटने की कोशिश हो रही है, शहर और गाँव की गंदगी भी क्या चुनावी घोषणा पत्र में मुद्दा बन पाएगी, जिसमें पैदा हुए मच्छर और दूसरी बीमारियां हजारों लोगों की जान ले चुकी हैं तो कई हजार लोग इससे पीड़ित हैं।

उत्तर प्रदेश में बीते कई महीनों से डेंगू और चिकनगुनिया का प्रकोप चल रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक डेंगू से प्रदेश में 119 मौतें हो चुकी हैं। हालांकि ये आंकड़ा हाईकोर्ट के गले नहीं उतरा तो कोर्ट ने प्रदेश सरकार से स्पष्टीकरण तलब कर लिया। लेकिन इससे बदतर हालात पूर्वी उत्तर प्रदेश के हैं जहां इंसेफ्लाइटिस का कहर जारी है। सिर्फ इसी वर्ष अब तक अकेले गोरखपुर मेडिकल क़ॉलेज में 420 बच्चों की जान जा चुकी हैं। गोरखपुर और पूर्वांचल के दूसरे जिलों में जापानी इंसेफ्लाइटिस और इंसेफ्लाटिस से 37 वर्षों में 15,000 से ज्यादा बच्चों की मौत हुई है।

वर्ष 1978 से 2015 के दौरान करीब 40 हजार केस सामने आए। जलजनित ये बीमारी पूर्वांचल के लिए अभिशाप से कम नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है जब तक इन्हें महामारी घोषित करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा नहीं बनाया जाएगा, मौतों का सिलसिला जारी रहेगा।

स्थानीय पत्रकार और गोरखपुर इनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप से जुड़े जीतेंद्र चतुर्वेदी खीजते हुए कहते हैं, “दिल्ली में चिकनगुनिया से कुछ मौतें हुईं तो राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा हुई। नेताओं ने भाषण दिए, लेकिन दिल्ली और लखनऊ के डेंगू की अपेक्षा पूर्वांचल की महामारी 600 गुना ज्यादा है, हर दिन 3-4 बच्चे मरते हैं।”

हालांकि भाजपा का कहना है वो इस मुद्दे को हमेशा जोर-शोर से उठाती रही है। बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता हरीशचंद श्रीवास्तव कहते हैं, “भाजपा य़ूपी में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर हमेशा आवाज उठाती रही है। हमारे विधायकों ने विधानसभा में डेंगू और जेई को लेकर सवाल उठाए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक अपने भाषणों में पूर्वांचल में बुखार और महामारी को उठाते रहे हैं।”

2017 के विजन डॉक्यूमेंट में प्रदेश की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारना भाजपा का अहम मुद्दा होगा।”

यूपी में सियासी जमीन तलाश रही कांग्रेस भी इन मौतों के लिए प्रदेश सरकार को जिम्मेदार बताती है। पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष और संचार विभाग के चेयरमैन सत्यदेव त्रिपाठी कहते हैं, “इन बीमारियों ने महामारी का रूप ले रखा है, हजारों लोगों की असमय मौत हुई है लेकिन प्रदेश सरकार ने इसकी रोकथाम के लिए कारगर कदम नहीं उठाए। कांग्रेस इस पार्टी को अपने घोषणा पत्र में शामिल करेगी।”

इन बीमारियों ने महामारी का रूप ले रखा है, हजारों लोगों की असमय मौत हुई लेकिन सरकार ने रोकथाम के लिए कारगर कदम नहीं उठाए। कांग्रेस इसे घोषणा पत्र में शामिल करेगी।
सत्यदेव त्रिपाठी, प्रदेश उपाध्यक्ष, कांग्रेस

मच्छर से होने वाली की बीमारियों के बदतर हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, राजधानी लखनऊ के ही दो अलग-अलग इलाकों में दर्जनों लोगों की मौत हो गई। लखनऊ के ही करीब बाराबंकी जिले में अकेले एक गाँव में 11 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। जिले के सीएमओ ने इसके लिए गाँव की गंदगी को जिम्मेदार बताया था। स्वयं प्रोजेक्ट के दौरान गाँव कनेक्शन को प्रदेश के 25 जिलों से मिले 10 हजार से ज्यादा छात्रों ने अपनी समस्या में गाँव की गंदगी को बड़ी समस्या बताया।

हालांकि सत्ताधारी पार्टी का कहना है उसने रोगों की रोकथाम के लिए बहुत प्रयास किए हैं। “ मच्छर जनित रोगों और मस्तिष्क ज्वर की रोकथाम के लिए प्रदेश सरकार ने कई कदम उठाए हैं। सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से काम कर रही है। आने वाले दिनों में प्रदेश के लोगों को इस बीमारी का सामना न करना पड़े, इसके लिए समाजवादी सरकार काम करेगी।” सपा नेता और प्रवक्ता दीपक मिश्रा कहते हैं।

मच्छर से होने वाली बीमारियों पर राष्ट्रीय बहस इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पूरी दुनिया में जानलेवा जीवों में मच्छर सबसे खतरनाक प्रजाति है। आंकड़ों की मानें तो वर्ष 2015 में पूरे विश्व में मच्छर ने 8 लाख से ज्यादा लोगों की जान निगल ली। हाल की रिपोर्ट के आंकड़ों की मानें तो वर्ष 2015 में मच्छर के काटने से जनित रोगों से पूरी दुनिया में 8,30,000 लोगों ने अपनी जान गंवाई है।

भाजपा स्वास्थ्य सेवाओं पर हमेशा आवाज उठाती रही है। विधानसभा में डेंगू और जेई को लेकर सवाल उठाए गए हैं। प्रधानमंत्री भाषणों में पूर्वांचल में बुखार व महामारी को उठाते रहे हैं।
हरीशचंद श्रीवास्तव, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा

उत्तर प्रदेश की बात करें तो मच्छर के चलते सबसे ज्यादा जानें पूर्वांचल में गई हैं। एक जनवरी से लेकर अब तक सिर्फ गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए 1631 मरीज आए। अगर आकंड़ों की मानें तो मौत दर 25.46 फीसद रही। ये आंकड़ा केवल गोरखपुर मेडिकल कॉलेज मेडिकल कॉलेज का है। इसके अलावा विभिन्न प्राइवेट अस्पतालों में कितनी मौतें हुईं, इसका आंकड़ा प्रशासन के पास भी नहीं है। मेडिकल कॉलेज के नेहरू चिकित्सालय से मिले आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016 में अभी तक तीन सौ मरीज भर्ती हुए हैं और अब तक 110 लोगों की मौत हो चुकी है।

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