एक डॉक्टर के भरोसे हजारों की आबादी

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बस्ती। तहसील मुख्यालय पर संचालित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर जेई-एईएस मरीजों के इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। चिकित्सक के अभाव से यह केंद्र जूझ रहा है। यहां का जेई वार्ड सिर्फ कागजों में ही संचालित हो रहा है।

चिकित्सक और कर्मचारियों के अभाव से ग्रसित इस अस्पताल पर तीन चिकित्सकों की तैनाती विभाग द्वारा की गई थी। एक जुलाई 2016 को यहां तैनात चिकित्सक अमरेश चंद्र अग्रहरी का तबादला जौनपुर जनपद के मछलीशहर हो गया, वहीं चिकित्साधीक्षक डा. रंजीत कुमार 20 जुलाई से स्वयं के इलाज के लिए अवकाश पर हैं। अब यहां एक मात्र आयुष चिकित्सक अमीष कुमार तैनात हैं, जिसके चलते यहां आने वाले मरीजों को हर दिन दुश्वारियों से दो-चार होना पड़ रहा है।

शासन से लगायत स्वास्थ्य विभाग एक तरफ जहां जेई इंसेफ्लाइटिस की रोकथाम के लिए हर संभव प्रयास का ढिंढोरा पीट रहा है, वहीं यहां का जेई वार्ड मात्र दिखावा बनकर रह गया है। 11 जुलाई को क्षेत्र के तुलसीपुर गाँव की 12 वर्षीय रीना पुत्री रामतीरथ इस रोग से पीड़ित होकर इलाज के लिए अस्पताल लाई गई थी। चिकित्सकीय सेवा के अभाव में यहां तैनात फार्मासिस्टों द्वारा बिना उसे भर्ती किए आनन-फानन गोरखपुर मेडिकल कालेज रेफर कर दिया। ऐसे में इस अस्पताल में सरकारी मंशा तार-तार हो रही है। 

हमारे सल्टौआ प्रतिनिधि के अनुसार ब्लाक मुख्यालय पर संचालित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ही तहसील क्षेत्र का एक मात्र ऐसा अस्पताल है, जहां मरीजों के इलाज की थोड़ी-बहुत व्यवस्था मौजूद है। 

पूर्वांचल की धरती पर खतरनाक बन कर उभरी जेई व एईएस पर अंकुश के लिए आए दिन विभाग द्वारा कार्यशाला व जागरुकता सप्ताह के माध्यम से इसके रोकथाम की बात की जाती है। प्राथमिक स्तर पर इस रोग की जांच की कोई व्यवस्था न होने से चिकित्सकों को इस बीमारी की पुष्टि करने में असुविधा होती है, जिसका खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ता है।

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