एक सिलाई मशीन से इस अकेली लड़की ने पूरे गाँव को सक्षम बना दिया

एक सिलाई मशीन से इस अकेली लड़की ने पूरे गाँव को सक्षम बना दियाgaonconnection

लक्ष्मणपुर (कानपुर नगर)। एक तरफ पढ़ायी के बाद लोग बाहर नौकरी के लिए जाना चाहते हैं। वहीं स्मिता ने एमए करने के बाद गाँव में ही रोजगार शुरू किया और दूसरी लड़कियों को भी रोजगार का मौका दे रही हैं।

कानपुर नगर जिला मुख्यालय से लगभग 55 किलोमीटर दूर 1200 आबादी वाले लक्ष्मणपुर गाँव में एक साल पहले तक कोई सिलाई नहीं करता था। गाँव की महिलाओं को अपने कपड़े सिलाने के लिए दूसरे गाँव में जाना पड़ता। ऐसे में एमए की पढ़ायी करने के बाद स्मिता कुशवाहा (22 वर्ष) ने सिलाई सीखने का निर्णय किया।

अपने बारे में स्मिता बताती हैं, “जब मैंने घर वालों से सिलाई सीखने की बात की तो सभी लोग कहने लगे कि इतनी पढ़ाई करने के बाद कोई कॉम्पिटीशन की तैयारी करो। सिलाई तो अनपढ़ लोग भी कर सकते हैं। पढ़ाई करने के बाद तुम्हे सिलाई करने की जरूरत नहीं है।” लेकिन स्मिता ने हार नहीं मानी, स्मिता आगे कहती हैं, “जब मैंने ज्यादा जिद की तो घरवालों ने जैसे तैसे हां कर दी। अब जब गाँव में कोई पूछता है कि रोज-रोज कहां जाती हो तो मैं कम्प्यूटर की कोचिंग का बहाना बना देती। जब तीन महीने में मैंने सिलाई सीख ली तब मैं अपने घर पर सिलाई करने लगी। आज हमारे गाँव की लड़कियां हमसे सिलाई सीखने आती हैं।”

स्मिता ने अपने घर से 15 किलोमीटर दूर रोज साइकिल से शिवराजपुर जाती और सिलाई सीखती हैं। तीन महीने में वो सिलाई सीख गयी और आज पूरे गाँव के कपड़ों की सिलाई वो खुद करती हैं। इस गाँव में रहने वाली रमा कमल (40 वर्ष) बताती हैं, “जब से हमारी शादी इस गाँव में होकर आयी, तब से हम अपने कपड़े शिवराजपुर सिलने के लिए डालते थे। कभी समय से मिलते नहीं और जितनी सिलाई पड़ती उतना ही आने-जाने में किराया खर्च हो जाता था। जब से स्मिता बिटिया गाँव में सिलाई करने लगी। तब से हमें वक़्त पर कपड़े सिलकर मिल जाते हैं।”

दीपिका तिवारी (30) वर्ष कहती हैं, “पहले सिलाई कराने के लिए दूसरे गाँव के तमाम चक्कर काटने पड़ते थे और कभी भी समय से कपड़े नहीं मिलते थे, गुस्सा आता था, लेकिन क्या कर सकते थे। जब से हमारे गाँव में सिलाई होने लगी तब से हमारे कपड़े समय से सिलकर मिल जाते हैं। उधार भी मान जाती हैं दूसरे गाँव में नगद पैसे देने पड़ते थे।”

स्मिता खुश होते हुए कहती हैं कि पहले गाँव के सभी लोग हमारा मजाक बनाते थे और कहते थे कि रोज-रोज पता नही कहां जाती है, लेकिन अब सब लोग खुश है। घर का सारा काम करने के साथ हर दिन 100-200 रुपए कमा लेते हैं, जिससे आज हम पढ़ाई करके अपने आप को बेरोजगार महसूस नहीं कर रहे हैं और जिस समस्या से हमारे गाँव के लोग कई साल से जूझ रहे थे हमारे सिलाई सीखने से उनकी इस समस्या का भी समाधान हो गया।

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