देश में गरीब गिनने के बजाय बालाकोट में आतंकी गिने जा रहे हैं: योगेन्द्र यादव

लखनऊ। "फरवरी तक ऐसा लग रहा था कि इस बार के चुनावों में गाँव, गरीब और किसान हावी रहेंगे। लेकिन लोकसभा चुनाव नजदीक आते-आते मुद्दे ऐसे बदले जैसे एक्जाम से पहले सिलेबस बदल दिया गया हो," गाँव कनेक्शन से विशेष बातचीत में स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेन्द्र यादव ने कहा।

गाँव कनेक्शन से विशेष बातचीत में योगेन्द्र यादव ने कहा, "देश में कितने गरीब हैं यह गिनने के बजाय बालाकोट में कितने आतंकी मरे उनकी गिनती की जा रही है। ऐसा लगता है कि चुनावों को पटरी से उतारने की साजिश की जा रही है।"

लोकसभा चुनावों में किसानों और गरीबों के मुद्दों पर चर्चा के बजाय दूसरे मुद्दों पर ज्यादा बहस होने के बारे में योगेन्द्र यादव कहते हैं, "पौने पांच साल किसान अपनी समस्याओं पर रोता है, और आखिर के तीन महीने में वो किसी जाति का बन जाता है। यहां तक कि हिन्दू या मुसलमान बन जाता है," आगे कहते हैं, "किसान को बोलना पड़ेगा-मेरा धर्म किसानी, मेरी जाति किसान।"

योगेन्द्र यादव बताते हैं कि यह पहली बार नहीं है, बार-बार ऐसा हुआ है। वर्ष 1988 में चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत ने दिल्ली में डेरा डाला था, किसानों का मुद्दा अकाश में था, लेकिन 1989 आते-आते मुद्दा बदल गया, बोफोर्स पर चुनाव हो गया। "ऐसा हर बार होता है कि गाँव, खेती, किसान का मुद्दा जब उछलता है तो कुछ न कुछ ऐसा होता है कि उसे दबा दिया जाता है," योगेन्द्र यादव ने कहा।


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स्वराज इंडिया अभियान की शुरूआत करने वाले योगेन्द्र यादव लगातार किसानों और गरीबों के मुद्दे उठाते रहे हैं। किसानों समस्याएं जानने के लिए उन्होंने कई यात्राएं भी की हैं।

किसानों की बात खुल कर हो, राजनाते उनकी बात करें इसके लिए योगेन्द्र यादव कहते हैं, "किसान संगठनों को खुल कर सामने आना होगा। या तो किसान को राजनीति नचाएगी, या किसान लगाम थामेगा।

चुनावों में अहम मुद्दों पर बात हो, लोग खुली बहस करें, न कि हर बार जाति और धर्म पर चुनाव लड़े जाएं। "पांच साल बाद होना क्या चाहिए, मुद्दों पर बात हो, आप जवाब दो, हिसाब दो। आपने पांच साल काम किया जनता खुश है दोबारा मौका देगी। विपक्ष की जिम्मेदारी है कि आप भरोसा दो कि पांच साल में बेहतर काम करके दिखाएंगे," आगे कहते हैं, "चर्चा किस पर हो रही है, वायनाड में कितने हिन्दू हैं, कितने मुस्लिम और कितने क्रिश्चयन। ये हो क्या रहा है?"

किसानों के मसले विपक्ष द्वारा प्रमुखता से न उठाना भी एक बड़ा कारण रहा है। इस बारे में योगेन्द्र यादव ने कहा, "विपक्ष को सवाल पूछने का तरीका नहीं आता, चार साल तक इस सारकार के खिलाफ संघर्ष हुआ तो विपक्ष तो था नहीं। संसद का विपक्ष और सड़क का विपक्ष दो अलग-अलग मसले हैं।"

वह आगे कहते हैं, "किसान का आंदलोन दूसरे लोग चला रहे हैं, जबकि चुनाव के वक्त ये लोग खड़े हो जाते हैं। न तो इन लोगों को सवाल पूछने की भाषा आती है न तो तरीका।"

"लोगों को लगता है जब मंडी में फसल नहीं बिक नहीं रही थी तो तुम कहां थे? जब यूरिया नहीं मिल रही थी तो तुम कहां थे? जब जंगल के अधिकारों की बात हो रही थी तो तुम कहां थे? जब सवाल पूछना चाहिए था तो तुम बोल नहीं रहे थे। आज सवाल पूछ रहे हो," योगेन्द्र यादव कहते हैं।

किसानों को हर माह छह हजार रुपये देने के वादे के बारे में योगेन्द्र यादव ने कहा, "राहुल गांधी की जो स्कीम है किसान को 6000 रुपया हर माह देना, बुरा नहीं है, लेकिन कांग्रेस नहीं बता रही कि ये पैसे कहां से आएंगे? साढे तीन लाख करोड़ रुपया ऐसे ही सड़क चलते थोड़े मिल जाएगा।"


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किसान राजनीति का केन्द्र बनें, इसके लिए एक अलग तरह की राजनीति खड़ी करनी होगी, केवल आंदोलनों से बात नहीं बनेगी। किसान की राजनीति खड़ी करनी पड़ेगी। इन स्थापित राजनीतिक पार्टियों के बाहर इनसे मुकाबला भी करना पड़ेगा।

"किसान संगठन अराजनैतिक नहीं हो सकते, किसान के साथ संघर्ष कर रहे होते हैं, सरकार के खिलाफ खड़े होते हैं, तो काहे के अराजनैतिक," योगेन्द्र यादव ने कहा, "किसान संगठन पहले ही दिन से तय करें कि हम राजनीति करने आए हैं, हम राजनीति को बदलेंगे। किसान अपना एजेंडा तय करे, बजाय वह पार्टियों के मंच पर जाए, पार्टियां उसके मंच पर आएं। शर्त आप लगाएं, कहें कि किसान हित में बोलेंगे तो आना होगा।"

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किसान पूरे पांच साल अपने फसल के उचित मूल्य, सिंचाई के साधन और खाद-बीज के लिए परेशान होता है, लेकिन ऐन चुनाव के वक्त वह राजनैतिक दलों के बहकावे में आकर जाति या अन्य दूसरे मुद्दों पर वोट डालता है। इस बारे में योगेन्द्र यादव कहते हैं, "किसान इस देश का एक साधारण नागरिक है, वे पति भी है, बेटा भी है, किसी जाति का भी है, उसके घर का कोई सेना में है, इस सभी पहचान में से कौन सी उस पर हावी हो जाए यह परिस्थिति पर निर्भर करता है," आगे कहते हैं, "अगर किसान आंदोलन अच्छे से काम करें तो वोटिंग के दिन भी किसान बोलेगा कि वह किसान है।"

गाँव और किसान खुशहाल कैसे हों इसका मंत्र बताते हुए योगेन्द्र यादव ने कहा, "गाँव को एक अतीत का मुद्दा बना दिया गया है, जब तक गाँव को देश का भविष्य नहीं समझेंगे, तब तक न तो गाँव सुधरेगा न देश।"

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