किसानों की आत्महत्या, न चुनाव में चर्चा न पार्टियों को चिंता

किसानों की आत्महत्या के आंकड़े गृह मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में दर्ज किए जाते हैं, लेकिन 2015 के बाद नए आंकड़े जारी नहीं हुए। जिसे लेकर किसान नेता और जनप्रतिनिधि लगातार सवाल उठाते रहे हैं।

Arvind shukklaArvind shukkla   22 April 2019 9:50 AM GMT

farmersपिछले साल नई दिल्ली में देशभर के किसानों ने अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया था।

लखनऊ। लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के ठीक एक दिन पहले उत्तराखंड में एक किसान ने आत्महत्या कर ली, जबकि इसी हफ्ते से महाराष्ट्र में 2 किसानों ने जान दी।

महाराष्ट्र किसानों की कब्रगाह बनता जा रहा है, यहां पर औसतन आठ किसान हर रोज मौत (पिछले पांच साल 2014-2018 का औसत) को गले लगा रहे हैं। जबकि देश में ये औसत करीब 33 किसान का है। देश में 2015 के बाद किसानों की मौत के आंकड़े जारी नहीं हुए हैं। चार साल के आंकड़ों ( 2013, 2014, 2015, 2016- संसद में पेश कृषि मंत्री की रिपोर्ट) का औसत निकालेंगे तो भी 33 किसान और खेतिहर मजदूरों की जान रोज जा रहा है। बावजूद इसके राजनैतिक पार्टियों की रैलियों और भाषणों से ये मुद्दा गायब है।

"अकेले औरंगाबाद जिले में सिर्फ 2019 में कम से कम 300 किसानों ने आत्महत्या की, लेकिन चुनाव में कोई नेता पानी की बात नहीं कर रहा, जिसके लिए हमारे शेतकारी (किसान) जान दे रहे। यहां जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगे जा रहे हैं।" मुंबई से 600 किलोमीटर दूर औरंगाबाद जिले के पारंडु गाँव के किसान जाकिर जमीरुद्दीन शेख ने फोन पर कहा।

यहां तक की भारत के किसी राज्य में किसानों की आत्महत्या के मुद्दे पर चुनाव होते नजर नहीं आ रहे। महाराष्ट्र के बाद आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब से लगातार किसानों की खुदकुशी की ख़बरें आती रही हैं।

"यह देश की त्रासदी ही है कि कृषि प्रधान देश में चुनाव है और किसानों की आत्महत्या मुद्दा नहीं, क्योंकि राजनीतिक पार्टियों को किसानों की चिंता ही नहीं है।" देविंदर शर्मा कहते हैं। शर्मा देश के प्रख्यात खाद्य एवं निर्यात विशेषज्ञ हैं, पिछले 30-35 वर्षों से वो लगातार खेती और किसानों के मुद्दे पर लिखते रहे हैं।

जाकिर के पिता के नाम पर तीन एकड़ से कुछ ज्यादा जमीन है, जिसमें मौसमी और अनार की बाग लगी है। यहां आखिरी बार 2015 में अच्छी बरसात हुई थी। पिछले दो साल से वो अपने गाँव से 35 किलोमीटर दूर से पानी टैंकर से लाते हैं। जाकिर बताते हैं, "मौसमी की फसल में गर्मियों में 10 जून तक पानी देना होता है। गर्मियों के चार महीने में इस खेती पर करीब सात लाख से साढ़े सात लाख रुपए खर्च हो जाते हैं। जबकि पिछले साल सूखे और अच्छा रेट मिलने से सिर्फ तीन लाख की मौसमी बिकी थी, यानि चार लाख का कम से कम घाटा। अब ऐसे में किसान कैसे कर्ज चुकाएगा और कैसे घर चलाएगा। परेशान शेतकारी जान दे देता है।"

किसान व्यथा: मत पढ़िएगा, इसमें कुछ भी नया नहीं है

महाराष्ट्र की फणनवीश सरकार ने जून 2017 में 34,000 करोड़ की कर्जमाफी की थी। एक आरटीआई के अनुसार करीब 4500 किसानों ने कर्जमाफी के बाद जान दी। यानि कर्ज़माफी किसानों को संकट से उबार नहीं पाई। किसानों की आत्महत्या की ये जानकारी मुंबई के आरटीआई कार्यकर्ता जितेंद्र गड़ने के सवाले के जवाब में दी। भारत में किसानों और खेतिहर मजूदरों की आत्महत्या के ताजा आंकड़े सिर्फ महाराष्ट्र से ही उपलब्ध हैं।

किसानों की आत्महत्या के आंकड़े गृह मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में दर्ज किए जाते हैं, लेकिन 2015 के बाद नए आंकड़े जारी नहीं हुए। जिसे लेकर किसान नेता और जनप्रतिनिधि लगातार सवाल उठाते रहे हैं।

एनडीटीवी में प्रकाशिक ख़बर के मुताबिक 18 दिसंबर 2018 में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने लोकसभा में कृषि संकट पर चर्चा के दौरान एक सवाल के जवाब में बताया था, "कृषि मंत्रालय के पास 2015 के बाद से किसानों की आत्महत्या के आंकड़े उपलब्ध नहीं है। मंत्रालय के मार्च 2016 के अपने आंकड़ों के अनुसार (अप्रकाशित) 11,300 किसान और मजदूरों ने आत्महत्या की।" राधा मोहन सिंह टीएमसी के सांसद और पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी के सवाल का जवाब दे रहे थे।

एनसीआरबी 'भारत में दुर्घटनावश मृत्यु तथा आत्महत्या'नामक रिपोर्ट में इसका उल्लेख करता है। लेकिन 2015 के बाद प्रकाशित रिपोर्ट में किसान आत्महत्या के आंकड़े दर्ज नहीं है।

यह भी पढ़ें- राहुल गांधी जिस वायनाड से लड़ रहे हैं चुनाव, वहां के किसानों का हाल जान हैरान रह जाएंगे आप

भारत में आत्महत्याओं के आंकड़ों को दर्ज करने वाली संस्था नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की पुरानी रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में पूरे देश में 11172, वर्ष 2014 में 12,360 और 2015 में 12,602 किसानों ने जान दी। जिसमें 8,002 किसान और 4,595 खेतिहर मजदूर शामिल थे। एनसीआरबी द्वारा रिपोर्ट न जारी किए जाने को लेकर सरकार लगातार कठघरे में रही है।

मैग्सेसे पुरस्कार विजेता देश के दिग्गज ग्रामीण पत्रकार पी. साईनाथ लगातार कहते रहे हैं किसानों की बढ़ती आत्महत्या को छिपाने के लिए सरकार आंकड़े जारी नहीं कर रही है।

29 और 30 नवंबर-2018 को दिल्ली में देशभर के किसानों संगठनों ने मिलकर किसान मुक्ति संसद का आयोजन किया। इस आयोजन में कई लाख किसान दिल्ली पहुंचे थे। प्रदर्शन में शामिल हुए पी. साईनाथ ने गाँव कनेक्शन से विशेष बातचीत में कहा था, "पिछले 20-25 सालों से सरकार खेती किसानों से छीन रही है। किसानों का संकट अब उनका नहीं रह गया है ये पूरे समाज का संकट है।' साईनाथ किसान आत्महत्या, सूखा और खेती के दूसरे मुद्दों को लेकर तीन हफ्ते का संसद का विशेष सत्र भी बुलाए जाने की मांग करते रहे हैं।

किसान अपनी मांगों लेकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। ये तस्वीर पिछले साल की है जब दिल्ली में देशभर के किसान जुटे थे।


यह भी पढ़ें- बारिश आने में तीन महीने बाकी हैं, तब तक क्या होगा?

कृषि के जानकार और किसान नेता लगातार ये भी आरोप लगाते रहे हैं कि आंकड़े इसलिए देरी से प्रकाशित किए जा रहे हैं ताकि उनमें उलटफेर किया जा सके। दिसंबर 2018 में ही गाँव कनेक्शन के अपने कॉलम 'जमीनी हकीकत' में देविंदर शर्मा ने आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए लिखा था, "पंजाब में कुल 271 आत्महत्याएं दिखाई गई हैं। लेकिन यह आंकड़ा उसका एक तिहाई है जो तीन विश्वविद्यालयों ( पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना, पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला और गुरू नानक देव यूनिवर्सिटी) ने अमृतसर ने घर-घर जाकर जुटाया था।

इसके मुताबिक, सन 2000 से 17 वर्षों के बीच 16,600 किसानों और खेतिहर मजदूरों ने अपनी जान दी थी। दूसरे शब्दों में, इन विश्वविद्यालयों ने आधिकारिक तौर पर एक साल में औसतन 1000 आत्महत्याओं की बात कही थी, लेकिन एनसीआरबी के आंकड़ों ने इन्हें बहुत कम करके, महज 271 दिखाया है। मुझे भरोसा है कि दूसरे राज्यों के शोधकर्ता भी इसी तरह की विसंगतियों को उजागर करेंगे।

भारत में किसानों की दुर्दशा के बारे में योगेन्द्र यादव गांव कनेक्शन से कहते हैं, "किसान आज आईसीयू में है। उसे सबसे पहले इंजेक्शन देके आईसीयू से बाहर लाना होगा। उसके बाद जनरल वार्ड में बाहर आने पर बीमारी की दवा देनी होगी, जब अस्पताल के बाहर आ जाए तो मार्निंग वाक, प्राणायाम और डायट भी दीजिए।"

कर्ज़ में डूबे किसानों की आमहत्या का सिलसिला 1990 से चला और 1995 से एनसीआरबी ने इन्हें अलग सेक्शन में लिखना शुरु किया था। किसानों की आत्महत्या पर यूपीए नीत मनमोहन सरकार भी घिरी थी। तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार के बयानों पर काफी हंगामा भी हुआ। किसानों की आत्महत्या पर मौजूदा कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह की भी काफी आलोचना हुई, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार राधामोहन सिंह ने कहा कि किसान मीडिया में आने के लिए आत्महत्या करते हैं।

"भारत की आधी से ज्यादा जनसंख्या सीधे खेती पर निर्भर है। यानी करीब 60 करोड़ लोगों के लिए खेती बड़ा मुद्दा है। बावजूद इसके किसानों की आत्महत्या का चुनावों में मुद्दा न बनना, उस पर सवाल न उठना गंभीर विषय है।"देविंदर शर्मा कहते हैं।

यह भी पढ़ें- प्याज की राजनीति- 'किसानों के आंसुओं में वो दम नहीं कि सरकार हिला सके'

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top