आपकी ज़िंदगी से जुड़े मुद्दे क्यों नहीं हैं चुनावी बहस का हिस्सा !

यह भारत के लोकतन्त्र की बड़ी त्रासदी है कि जिस पर्यावरण पर आने वाली पीढ़ी का भविष्य टिका है वह लोकतन्त्र के महायुद्ध की राजनीतिक बहस में कहीं नहीं है। ऐसा नहीं है कि देश में पर्यावरण को लेकर सामाजिक चेतना नहीं है, लेकिन शहरी वर्ग कभी पर्यावरण को राजनीतिक पार्टियों के साथ चुनावी मोलतोल और दबाव बनाने के लिये इस्तेमाल ही नहीं करना चाहता।

Hridayesh JoshiHridayesh Joshi   12 March 2019 8:24 AM GMT

आपकी ज़िंदगी से जुड़े मुद्दे क्यों नहीं हैं चुनावी बहस का हिस्सा !

सुप्रीम कोर्ट ने भले ही हरियाणा सरकार को क़ानून में उस बदलाव के लिये फटकारा हो जिससे अरावली के इलाके में निर्माण और खनन को वैधता मिलती, भले ही केंद्र सरकार देश की सबसे बड़ी अदालत में आदिवासियों के अधिकारों को लेकर अपने ही क़ानून का बचाव करने न आई हो और बाद में उसे इस विषय पर भी अदालत की फटकार सुननी पड़ी हो, भले ही अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के तट पर रहने वाले मछुआरों और किसानों को अपने एक आदेश से राहत दी हो लेकिन देश की अगले लोकसभा के चुनावों में ये मुद्दे क्या कहीं कोई असर डालेंगे या इन पर कोई वोट मांगेगा या देगा?

यह भारत के लोकतन्त्र की बड़ी त्रासदी है कि जिस पर्यावरण पर आने वाली पीढ़ी का भविष्य टिका है वह लोकतन्त्र के महायुद्ध की राजनीतिक बहस में कहीं नहीं है। ऐसा नहीं है कि देश में पर्यावरण को लेकर सामाजिक चेतना नहीं है, लेकिन शहरी वर्ग कभी पर्यावरण को राजनीतिक पार्टियों के साथ चुनावी मोलतोल और दबाव बनाने के लिये इस्तेमाल ही नहीं करना चाहता।

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साभार: इंटरनेट

वायु प्रदूषण का उदाहरण लीजिये। दिल्ली दुनिया का सबसे अधिक प्रदूषित शहर है और दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 15 भारत के हैं। यह विषय राजनीतिक बहस में कहां है? वायु प्रदूषण की फिक्र जाड़ों में तभी होती है जब दिल्ली में सांस लेना नामुमकिन होने लगता है। जनवरी आते आते वह चिंता गायब होने लगती है और होली तक हम सब भूल जाते हैं। दिल्ली ही नहीं देश के तमाम शहर हर तरह के प्रदूषण की चपेट में हैं। मिसला के तौर पर पटना देश के 10 प्रदूषित सबसे शहरों में है और यहां वाहनों का शोर एक अलग स्तर का ध्वनि प्रदूषण करता है, क्योंकि हॉर्न न बजाने की संस्कृति या संवेदनशीलता नागरिकों में नहीं है। लेकिन बिहार में लोकसभा चुनावों में क्या वायु या ध्वनि प्रदूषण के मुद्दे सुनाई देंगे?

अब दूसरे देशों का उदाहरण लीजिये। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की जलवायु परिवर्तन पर हुये पेरिस समझौते को न मानने के लिये पूरी दुनिया में आलोचना हुई है। उन्हें प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन (कोयला, पेट्रोल, डीज़ल, गैस) को बढ़ाने वाली कंपनियों का मददगार माना जाता है। लेकिन अमेरिका के भीतर जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण को लेकर ऐसी चेतना है कि उनकी युवा पीढ़ी और बच्चे अपने राजनेताओं पर कानून में सकारात्मक बदलाव के लिये दबाव डाल रहे हैं।

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पिछले दिनों इंटरनेट में एक वीडियो वाइरल हुआ, जिसमें अमेरिकी बच्चे अपनी सीनेटरडेनीफेन्सटिन से बहस करते दिख रहे हैं। डेनीकैलिफोर्निया की सीनेटर हैं और वह क्लाइमेटएक्शन को लेकर इन बच्चों के सवालों के बीच घिर गईं। बच्चों के साथ 16 साल की ईशा क्लार्क खड़ी हैं जो विनम्रता से लेकिन अडिग होकर सीनेटरडेनी के आगे झुकने को तैयार नहीं। क्लार्क और छोटे छोटे बच्चे सीनेटर से अमेरिकी संसद में ग्लोबल वॉर्मिंग रोकने के लिये कड़े कदमों वाला प्रस्ताव पास कराने की मांग कर रहे हैं और सीनेटर के लीपापोती वाले जवाब मानने को तैयार नहीं हैं।

ईशा क्लार्क कहती हैं कि वह यूनाइटेड किंगडम में हुई छात्रों की क्लाइमेट स्ट्राइक से बहुत प्रभावित हुई हैं और ऐसी ही हड़ताल अमेरिका में करने की योजना बना रही हैं। क्लाइमेट पर जिस छात्र हड़ताल से ईशा प्रभावित हैं उसकी सूत्रधार 16 साल की ग्रेटीथुनबर्ग ने 8 दिनों के भीतर 4 देशों में रैलियां की और वह ब्रसेल्स की यूरोपीय संसद में मौजूद रही। वहां उन्होंने सांसदों को बताया कि धरती पर बढ़ रही विनाशलीला के बावजूद वह कुछ नहीं कर रहे हैं।

साभार: इंटरनेट

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लेकिन लोकसभा चुनावों में इस बात का कोई महत्व नहीं दिखता कि कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को कानून में उस बदलाव के लिये फटकारा है जिससे अरावली रेंज में निर्माण और खनन को कानूनी वैधता मिलेगी। अरावली की पहाड़ियां दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रंखलाओं में हैं और इसकी तबाही से हरियाणा, राजस्थान के साथ दिल्ली और उत्तरप्रदेश के कई हिस्सों में भी जीना मुहाल हो जायेगा। कोर्ट ने राज्य सरकार से कड़े शब्दों में कहा, "क्या आप सबके ऊपर हैं?" पिछले दिनों अरावली को बचाने के लिये हुये तमाम विरोध प्रदर्शनों का राज्य सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा और आखिरकार अदालत को कहना पड़ा, "इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। यह कोर्ट की अवमानना है।"


अब जंगलों की ओर देखिये। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI)की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल नवंबर से इस साल फरवरी के बीच जंगलों में लगने वाली बड़ी आग की घटनायें 4,225 से बढ़कर 14,107 हो गई हैं। वेबसाइट न्यूज़ क्लिक में फॉरेस्टसर्वे की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया कि मार्च के पहले हफ्ते में 58 बड़ी आग सक्रिय थीं। पिछले 2 महीनों में ही आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के राज्यों में 205 आग की घटनाओं का पता चला। डाउनटु अर्थ पत्रिका के मुताबिक तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक ने आग बुझाने के लिये निर्धारित फंड का केवल 60 प्रतिशत ही इस काम में खर्च किया है।

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अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने तक भारत में मछुआरों और किसानों को फिलहाल बड़ी संस्थाओं की मनमानी से राहत दी है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिका की निचली अदालत के उस फैसले को खारिज कर दिया जिसमें विश्व बैंक से जुड़ी संस्था इंटरनेशनल फाइनेंस कॉर्पोरेशन (IFC)को किसी भी जांच से मुक्त बताया था। IFC गुजरात में टाटा मुद्रा कोल प्लांट में पैसा लगा रहा है। इस फैसले से जहां विरोध कर रहे लोगों की मुहिम में नई जान आ गई है वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं को दुनिया भर में कई बड़े प्रोजेक्ट्स को चुनौती देने का आधार मिल गया है।

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IFC ने 2008 में इस थर्मल पावर प्लांट में 3000 करोड़ रुपये निवेश किये लेकिन किसानों, मछुआरों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि संस्था जल और वायु प्रदूषण समेत तमाम नियमों की पालना करने में नाकाम रही है। अब सवाल है कि क्या भारत में राजनेता और वोटर ऐसे मुद्दे को राजनीतिक मंथन के मध्य में लाना चाहेगा।

आखिर ऐसे मुद्दे क्यों महत्वपूर्ण नहीं हैं? लोकसभा चुनावों के लिये शंखनाद हो चुका है। अगली 23 मई को पता चलेगा कि देश की कमान अगले 5 सालों के लिये किन हाथों में होगी। लेकिन क्या इससे उन लोगों को कोई फर्क पड़ता है जो पर्यावरण, खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों को सरकार के एजेंडे का हिस्सा बनाना चाहते हैं। ये ऐसे विषय हैं जो आपकी ज़िंदगी से सबसे अधिक जुड़े हैं और हमारी अगली पीढ़ी का भविष्य कैसा होगा इस पर ही निर्भर है।

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