एलर्जी से बचें, अपनाएं पारंपरिक हर्बल ज्ञान

एलर्जी से बचें, अपनाएं पारंपरिक हर्बल ज्ञानगाँव कनेक्शन

यदि आपका शरीर एलर्जेन्स के प्रति संवेदनशील है तो इसका अर्थ यह है कि आपका रोग प्रतिरोधक तंत्र किसी भी सामान्य एलर्जेन के आपके शरीर में प्रवेश के बाद उसे घातक मान बैठता है और उस पर आक्रमण कर देता है, उसे तहस-नहस करना चाहता है। इसी आक्रमण की वजह से शरीर पर लाल धब्बों, सूजन या चकतों का होना दिखायी देता है। 

दुनिया भर में लोगों में एलर्जी होना एक आम बात है। माना जाता है कि लगभग 15-20 प्रतिशत लोग अपने जीवनकाल में किसी ना किसी तरह की एलर्जी से ग्रस्त होते हैं या उन्हें इस एलर्जी के निवारण के इलाज की जरूरत पड़ती है। 

वास्तव में हमारा रोग प्रतिरोधक तंत्र एलर्जेन्स को पहचान लेता है और जैसे ही इन एलर्जेन्स से हमारे शरीर को खतरा महसूस होता है, हमारे शरीर में एंटीबॉडीस बनने लगती है ताकि ये एंटीबॉडीस इन एलर्जेन्स पर आक्रमण कर सके, इसे सेंसीटाईजेशन कहा जाता है। ये सेंसीटाईजेशन एक दिन से लेकर कई महीनों और सालों तक चलता है या चल सकता है।

इस दौर में नाक का बंद होना, छींक आना, आंखों का लाल होना, खुजली होना, बदन पर चकते बनना, आंखों का सूजना, त्वचा पर दाग बनना, त्वचा का अनायास शुष्क होना, उल्टियां, दस्त से लेकर तमाम कई तरह के लक्षण देखे जा सकते हैं। कई तरह के खाद्य पदार्थों का सेवन, मौसम का बदलाव और पालतू पशुओं के संपर्क में आने से भी एलर्जी हो सकती है।

दूध, गेहूं, मूंगफली, सोया पदार्थों, अंडे, मछली आदि से अक्सर कई लोगों को एलर्जी हो जाती है लेकिन कई बार मौसम में बदलाव और पर्यावरण में दूषित कणों और पदार्थों के चलते भी एलर्जी का होना देखा जा सकता है। बसंत ऋतु के आते ही कई लोगों को एलर्जी होते देखा जाना आम होता है। 

इस मौसम में पेड़ों पर नयी पत्तियों और फूलों का लदना शुरु हो जाता है और ऐसे में फूलों के परागकण हवाओं में तैरते रहते हैं और इन परागकणों के सम्पर्क में आकर कई बार लोगों को एलर्जी हो जाती है और अलग अलग तरह की समस्याओं जैसे दमा, खांसी, छींक और आंखों में लालपन से जूझना होता है। बसंत ऋतु में होने वाली एलर्जी के लक्षण कई बार गर्मियों में भी होते दिखायी देती हैं। पालतू पशुओं से के संपर्क में रहने की वजह से भी अक्सर कई लोगों को एलर्जी का सामना कर पड़ सकता है। इन पशुओं के सम्पर्क में आते ही त्वचा पर खुजली या दाद का होना कई बार देखा जाता है। 

फेल डी वन नामक प्रोटीन बिल्लियों की लार में पाया जाता है, कई लोग इसकी गंध मात्र से एलर्जी महसूस करते है। इसी तरह पालतू पशुओं की पेशाब, लार, बालों और मल से भी एलर्जी होने की गुंजाइश रहती है।एलर्जी की वजह से हे फीवर आंखों का लालपन, सर्दी खांसी, कंजक्टिवायटिस, हाईव्स या अर्टिकेरिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। नाक से पानी निकलना, अचानक खांसी का तेज हो जाना या गले में खराश का होना भी एलर्जी की निशानी है। 

एलर्जी होने की कोई खास एक वजह तय नहीं होती, इसके होने की संभावनाओं के लिए अनेक वजहें हो सकती है और इससे बचने के लिए कुछ पारंपरिक तरीकों को अपनाकर काफी हद तक इसके बुरे असर से बचा जा सकता है। पारंपरिक जानकारी के अनुसार गाय के दूध से बना शुद्ध घी करीब २५ ग्राम लिया जाए और इसे गर्म किया जाए। इसमें 5-6 काली मिर्च के दानों को डाल दिया जाए। जब काली मिर्च कड़कड़ा जाए तो इसे आंच से उतारकर इसमें करीब 2 चम्मच शक्कर मिला दी जाए। एलर्जी महसूस होने पर इस मिश्रण का सेवन करें, ऐसा दिन मे कम से कम 3 बार किया जाए, एलर्जी छू मंतर हो जाएगी।

एलर्जी वास्तव में हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का ऐसा असर है, जिसकी वजह से हमारे शरीर के संपर्क में आने वाले कुछ पदार्थों और रसायनों के प्रति संवेदनशीलता बहुत तेजी से दिखती है और कई बार इस संवेदनशीलता का असर काफी लंबे समय तक दिखायी देता है। जिस पदार्थ या रसायन की वजह से शरीर में एलर्जी होती है उसे एलर्जेन कहा जाता है और एलर्जेन्स कहीं भी पाए जा सकते हैं, भोजन, पेय पदार्थों से लेकर पेड़- पौधों और यहां तक कि दवाओं में भी इन्हें देखा जा सकता है। ज्यादातर एलर्जेन हानिकारक नहीं होते या यह कहा जा सकता है कि अधिकांश लोगों को इनका असर नहीं होता है, लेकिन जिनका शरीर एलर्जेन्स के प्रति संवेदनशील होता है, उनके लिए एलर्जी की समस्या बेहद घातक हो सकती है। 

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