एटा के गांधी हैं दयाराम 'पागल'

एटा के गांधी हैं दयाराम पागल

एटा। जि़ले में खारे पानी की सबसे अधिक समस्या है। इस समस्या को लेकर जलेसर तहसील के गाँव नगला मीरा के दयाराम सिंह बीते 32 वर्षों से लगातार जंग छेड़े हैं। जि़ले के किसान उन्हें 'एटा के गांधी' नाम से बुलाते हैं।

दुबला-पतला शरीर और गांधीवादी विचारों के धनी दयाराम बगैर किसी स्वार्थ के जनहितों की जंग लड़ रहे हैं। 32 वर्षों से औरों के लिए सिंचाई, पानी, स्वास्थ्य, सड़क जैसे तमाम मुद्दों के लिए लड़ाई लड़ रहे दयाराम को 'पागल' उपनाम मिलने से भी कोई शिकवा नहीं। जलेसर के गाँव नगला मीरा में जन्मे दयाराम को 1982 तक सरकारी चपरासी की ही नौकरी पाने का जोश था कि वह दिखा सकें कि चपरासी के रूप में जनसेवा कैसे होती है। दयाराम बताते है, ''हाईस्कूल तक शिक्षित होने के बावजूद मुझे नौकरी न मिली जबकि नौकरी के लिए दिल्ली में कई बड़े नेताओं से भी गुहार लगाई थी। इसके बाद 1983 से मैंने औरों के लिए काम करने की तैयारी कर ली। सबसे पहले मैंने जलेसर क्षेत्र में 23 किलोमीटर के दायरे में खारा पानी क्षेत्र होने को लेकर सिंचाई के लिए नहर की मांग शुरू की। वर्ष 1983 से 1986 तक इसी मांग को पूरा कराने के लिए 129 बार एटा के जिलाधिकारी से भी मिला। फिर भी कामयाबी नहीं मिली तो लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष बलराम जाखड़ के पास गया। उन्होंने अनुमति दे दी। इसके बाद सिंचाई के लिए रजवाह का निर्माण हो गया।"

जनहित की जंग में दयाराम ने 14 बार आमरण अनशन पर बैठकर 84 दिनों के समय को खाली पेट बिताकर जनता को उनका हक दिलाया। घर में पत्नी और दो बेटों की उन्होंने कभी परवाह नहीं की। दयाराम बताते है, ''1997 में मैंने खारे पानी की वजह से पेयजल की समस्या के दृष्टिगत कुओं की खुदाई और बाद में पानी की टंकियां बनाने के लिए भी जिले से लेकर राजधानी तक संघर्ष किया।" आज भी दयाराम महात्मा गांधी के अंदाज में सिंचाई संसाधन, पेयजल व्यवस्थाओं, स्वास्थ्य, सड़क, चकरोडों पर अवैध कब्जों को हटवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पागलों की तरह दयाराम को औरों के लिए धूप हो या बारिश, वाहन से हों या पैदल दौड़ते देख लोगों ने उपनाम 'पागल' रख दिया। फिर भी उसे बुरा न मानकर उन्होंने अपने नाम से यह उपनाम जोड़ लिया। सत्याग्रह और कई बार हितों के लिए किसान आंदोलनों में जेल भी जा चुके दयाराम का कहना है कि वह औरों के लिए जो कर रहे हैं वह पिछले जन्म का कर्ज अदा करना ही है। प्रदेश सचिव, भाकियू अखिल यादव बताते है, ''बगैर किसी स्वार्थ के दयाराम कई वर्षों से किसानों की समस्याएं उठाते हैं। कई बार उन्होंने अनशन किया और किसानों को उससे लाभ हुआ। अहिंसात्मक तरीके से वो प्रदर्शन करते हैं, इसीलिये हम सब उन्हें एटा का गांधी कहकर बुलाते हैं।"

ऐसे मिली प्रेरणा

चार दशक पूर्व धनाभाव में पढ़ाई छोड़ छोटी-मोटी नौकरी के लिए दर-दर फिरने वाले दयाराम को जब हर तरफ  से निराशा हाथ लगी तो उसने अपनी दो बीघा जमीन से जीवन की जंग शुरू की। खेती की राह में आये खारे पानी के रोड़े ने उसे समाजसेवा की एक नई ही दिशा दे दी। दयाराम बताते है, ''मैंने देखा तो पता चला कि क्षेत्र का लगभग एक तिहाई किसान खारे पानी के कारण खेतों में कुछ भी नहीं कर पाते। बस उसी दिन से शुरू कर दी पानी की जंग।" अपने आन्दोलनों को सत्याग्रह बताने वाले गांधीवादी दयाराम का कहना है कि उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र की पानी की समस्या का निवारण कराना है। मैंने एक मई से पानी की एक और लड़ाई लडऩे का मन बना लिया है। इस बार वह आर-पार की लड़ाई के मूड में है।

अब तक 16 आन्दोलन 

सत्याग्रही दयाराम सिंह अब तक क्षेत्र की पानी की समस्या को लेकर 16 आन्दोलन कर चुके हैं। जबकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर इसके अलावा उन्होंने तीन बार अन्ना हजारे के साथ अनशन किया है। उनका कहना है कि हर बार अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन देकर अनशन तुड़वाया किन्तु धरातल पर कुछ भी नहीं कराया। 

कुर्सी में नहीं बैठते दयाराम

कुर्सी वाले अधिकारियों व नेताओं के आश्वासनों के हमेशा मिले धोखे से आहत दयाराम सिंह को कुर्सी से घृणा हो गई है। आज के युग में जहां कुर्सी की लड़ाई है, वहीं उन्होंने 2 मार्च 1990 से कुर्सी को त्याग दिया है। वे बैठने के लिए जमीन अथवा स्टूल का ही प्रयोग करते हैं।

जेब में रखता हूं फूटी कौड़ी

जनसमस्याओं के लिए एटा, अलीगढ़ से लखनऊ व दिल्ली तक की दौड़ लगाने वाले दयाराम सिंह कभी रेलगाड़ी अथवा बस में किराया नहीं देते। दयाराम बताते है, ''मैं जनसमस्याओं के लिए जाता हूं। किसी से चन्दा अथवा कोई शुल्क नहीं लेता, कमाई का भी कोई जरिया है नहीं तो फिर किराया कहां से लाऊं। मुझे कोई बेइज्जत कर ट्रेन या बस से उतार देता है तो मैं बुरा नहीं मानता। इसके साथ ही मैं जेब में फूटी कौड़ी रखकर घूमता हूं। कोई कहता है कि तुम्हारें पास तो फूटी कौड़ी नहीं है, तो मैं तुंरत निकालकर दिखा देता हूं।" 

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top