गाजर की खेती से किसान हो रहे हैं मालामाल

गाजर की खेती से किसान हो रहे हैं मालामालगाँव कनेक्शन

श्रीगंगानगर शहर के जैड एवं एलएनपी माइनर के आसपास के चकों के साथ-साथ साधुवाली गांव धीरे-धीरे गाजर हब बनता जा रहा है। जिले के तीन हजार बीघा में से अकेले साधुवाली क्षेत्र में 90 प्रतिशत गाजर की बुवाई होती है। यहां की गाजरें प्रदेश ही नहीं बल्कि दिल्ली, पंजाब एवं हरियाणा में भी बिक्री के लिए जाती है।

फोर जैड के किसान दलीप कुमार ने इस बार अपने पूरे खेत के 90 प्रतिशत हिस्से में गाजर की बुवाई की है। दलीप के अनुसार इलाके में भरपूर पानी होने के कारण साल में प्रति बीघा दो या तीन फसलें लेते हैं। इसके लिए अगस्त के अंत तक गाजरों की बुवाई करते हैं। इसके बाद गेहूं की बुवाई और अप्रेल में ककड़ी, चारा अथवा मूंग की फसल की बुआई। 

90 दिन में गाजर से एक लाख तक की कमाई

एलएनपी, डी भागसर, सी एवं जैड माइनर के आसपास के चकों के किसानों को गाजरों की खेती ऐसी रास आई कि वे यह काम जोखिम और कड़ी मेहनत से अच्छे मुनाफे वाली फसल मानने लगे। किसान अगस्त में भूमि खाली कर चार पांच बार अच्छी गहरी जुताई करते हैं। इसके बाद गोबर की खाद डालकर सिंचाई कर गाजरों की बुआई करते हैं। बुआई के दौरान पोटाश एवं सुपर फास्फेट खाद डालते हैं। जब गाजर की फसल तीन चार पत्तों पर आ जाती है तो सिंचाई पानी के साथ 20 किलो यूरिया प्रति बीघा डालते हैं। ज्यादा पानी से गाजर की उपज बढ़ती है। इसमें पांच बार सिंचाई की जाती है। 4 एलएनपी के गोपीराम के अनुसार उनके यहां 50 से 150 क्विंटल तक गाजर होती है। इस बार गर्मी अधिक रहने के कारण अगेती गाजरों की उपज कुछ कम हुई है, अन्यथा एक बीघा में ही 90 दिन की फसल में एक लाख रुपए की उपज निकल आती है। गाजरों की बुवाई अगस्त से 15 अक्टूबर तक की जाती है।

वातावरण भी गाजर पैदावार में है अनुकूल

श्रीगंगानगर जिले में पिछले कुछ वर्षों से गाजर का व्यापार जोर पकड़ रहा है। इसका कारण यहां की गाजर की राज्य से बाहर की मंडियों में अच्छी मांग होना भी है। इसमें एक मुख्य कारण स्थानीय वातावरण भी है। कृषि वैज्ञानिकों की माने तो जिले में जो वातावरण अक्टूबर से दिसंबर तक के माह में होता है उससे यहां की गाजर में रस भी भरपूर मात्रा में होता है। इससे गाजर पूरी तरह रसीली हो जाती है। इसके ट्रांसपोर्ट करने पर भी इसका रस कई दिनों तक इसे सूखने नहीं देता और यह श्रीगंगानगर से दूर अन्य राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश आदि में भी बेची जा रही है।

नहर किनारे लगती है गाजर मंडी

गाजर के विपणन में बड़ा काम उसकी धुलाई का है। सीजन में नहर किनारे रोजाना 8 से 10 हजार क्विंटल गाजरों की धुलाई होती है। इसके लिए इंजन पर मोटर पंप के जरिए पानी उठाकर गाजरों की धुलाई की जाती है। बाद में गाजर आगे जालीदार खाली रोलर में जाती है और पानी से दो तीन बार धुलकर साफ हो जाती है। इसे देखते हुए कुछ लोगों ने धुलाई मशीन लगा ली और किसान गाजर धुलाई का किराया चुका देते हैं।

गाजर धोने का काम थोड़े से स्थान पर नहीं हो पाता। पानी भी भरपूर चाहिए, इसलिए फल सब्जी मंडी समिति ने इसे अपने दायरे में लाने का प्रयास नहीं किया। यही वजह है कि गाजर बिचौलियों से मुक्त किसानों से सीधे व्यापारियों के पास पहुंच जाती है। खुले में नेशनल हाइवे-62 पर साधुवाली गांव के पास गंगनहर पर दूर दूर तक गाजरों से भरे बैग्स देखकर पंजाब एवं हरियाणा की मंडियों से व्यापारी आने लगे। अब यहीं गाजर मंडी बन गई। किसानों को भी अपनी उपज लेकर मंडी तक नहीं भटकना पड़ता और तुलाई का झंझट भी नहीं रहता। इसीलिए साधुवाली गाजर हब के रूप में विकसित होता जा रहा है।

सैकड़ों श्रमिकों को सीजन में रोजगार

साधुवाली के आसपास के करीब एक दर्जन चकों में इन दिनों खेतों में सैकड़ों श्रमिकों को रोजगार मिला हुआ है। श्रमिक गाजरें उखाड़ने का काम करते हैं, जिन्हें प्रति श्रमिक डेढ़ दो सौ रुपए दिहाड़ी मिलती है। गाजरें उखाड़ने के बाद इसके उपर से हरी शाखा को काटकर अलग कर ट्रालियों में भरकर नहर पर लाकर धुलाई की जाती है। इस प्रकार 15 नवंबर से करीब ढाई महीने तीन चार हजार लोगों को रोजगार भी मिल जाता है।

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