गाँवों के अस्पतालों में सांप काटने का इलाज नहीं

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लखनऊ। बारिश में सर्पदंश गाँव में अकाल मृत्यु की बड़ी वजह है मगर गाँव के ही आसपास इसका इलाज नदारद है। अगर सांप काटने के इलाज के लिए लोगों को गाँव से 50 किलोमीटर की दूरी तक जिला मुख्यालय पहुंचना होता है। प्रदेश के दूरदराज के पिछड़े इलाकों में ही नहीं बल्कि राजधानी लखनऊ के गाँवों में भी सर्पदंश का इलाज नहीं उपलब्ध है। जिसकी वजह से प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में ग्रामीण बेवक्त काल के गाल में समा रहे हैं।

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक सांप काटने के 75 फीसदी मामले ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं, इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक केंद्रों पर एंटी वेनोम (ज़हर प्रतिरोधक) दवाए ही हैं। लिहाज़ा लोगों को सांप काटने पर गाँव से शहर की ओर भागना पड़ता है।

रामपुर बहेरा गाँव के कप्तान वर्मा (48 वर्ष) की बहन शारदा को 10 वर्ष पहले सांप ने काट लिया था। दर्द से तड़प रही शारदा को जब वो सामुदायिक स्वास्थ केंद्र लेकर पहुंचे, तो वहां पर इसकी दवा न होने के कारण डॉक्टरों ने उन्हें तुरंत मेडिकल हॉस्पिटल, लखनऊ जाने को कहा। लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही शारदा की मौत हो गई। लखनऊ जिले के बख्शी का तालाब ब्लॉक के रामपुर बहेरा गाँव के निवासी कप्तान वर्मा बताते हैं, “घर की रसोई में गोबर लीपते वक्त मेरी बहन शारदा को सांप ने काट लिया था। काटने के थोड़ी देर बाद उसके मुंह से झाग निकलता देख हम सब उसे लेकर सरकारी अस्पताल भागे पर कोई काम नहीं बना। हमारे गाँव में अभी तक तीन लोगों की सांप काटने से मौत हो चुकी है।”

गाँवों में सीएचसी और पीएचसी पर सांपों के काटने पर उपचार की उपलब्धता के बारे में सामुदायिक स्वास्थ केंद्र, बीकेटी (लखनऊ) के प्रमुख डॉ. मिलिंद वर्धन बताते हैं, “सांपों के काटने पर मुख्यरूप से दी जाने वाली एंटी वेनोम दवा के लिए स्पेशल रेफ्रिजिरेशन सिस्टम की ज़रूरत पड़ती है। अभी तक प्रदेश में सभी प्राथमिक स्वास्थ केंद्रों पर यह सुविधा नहीं है, हां जो बड़े सीएचसी हैं उनमें एंटी वेनोम दवा मिल जाती है।”

दुनिया में हर साल 80 हजार लोगों को काटते हैं सांप

विश्व स्वास्थ संगठन (डब्ल्यूएचओ) 2013-14 की रिपोर्ट के अनुसार हर साल 80,000 लोग सांप काटने का शिकार होते हैं और उनमें से 10,500 की मौत हो जाती है। विश्व में सांप कटने से होने वाली मौतों की संख्या में भारत सबसे आगे है। इन मौतों का सबसे बड़ा कारण है लोगों को तुरंत प्राथमिक उपचार न मिल पाना। विश्व में सांपों की लगभग 550 प्रजातियां हैं।

इनमें से सिर्फ 10 फीसदी सांप ज़हरीले होते हैं। भारत में 13 किस्मों के ज़हरीले सांप पाए जाते हैं। इनमें में कोबरा, क्रेट कोबरा, रसल वाइपर, सॉ सकेल्ड वाइपर और नोज़ वाइपर जैसे सांपों के काटने के मामले ज़्यादा रहते हैं। गाँवों में सांप काटने से होने वाली मौतों के बारे में डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के प्रबंधक डॉ. दीपक मालवीय बताते हैं, “सांप काटने के अधिकतर मामले गाँवों में देखने को मिलते हैं, पर यह अफसोस की बात है कि ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों में ही एंटीवेनोम दवाओं की कमी है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग को अभियान चलाकर ग्रामीण स्वास्थ केंद्रों पर इसका इलाज उपलब्ध कराना चाहिए।” वो आगे बताते हैं कि दुनियां में पाए जाने वाले सांपों में से 90 फीसदी सांप ज़हरीले नहीं होते हैं। सांप काटने से होने वाली मौतों के ज़्यादातर मामलों में यह देखा गया है कि ज़हर फैलने से ज़्यादा लोगों की मौतें घबराहट या डर से होती हैं।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

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