गाँवों के स्वास्थ्य केन्द्रों की बीमारी ‘लाइलाज’

Arvind ShukklaArvind Shukkla   8 April 2016 5:30 AM GMT

गाँवों के स्वास्थ्य केन्द्रों की बीमारी ‘लाइलाज’gaonconnection

लखनऊ। ग्रामीण इलाकों में रहने वाली 70 फीसदी आबादी को सेहतमंद रखने की जिम्मेदारी प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर है। लेकिन यहां डॉक्टर नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में 5,000 डॉक्टरों की कमी है। ग्रामीण इलाकों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पूरे प्रदेश में करीब 16,000 डॉक्टरों की आवश्यकता है, जबकि विभाग के पास सिर्फ 11,000 ही डॉक्टर हैं।

प्रदेश में डॉक्टरों की यह कमी पिछले चार वर्षों से बनी हुई है, क्योंकि डॉक्टरों का चयन करने वाली संस्था लोक सेवा आयोग आवश्यकता के अनुसार विभाग को डॉक्टर उपलब्ध नहीं करा पा रही है। पिछले 10 वर्षों में भले ही पूरे प्रदेश में सैफई समेत पांच सरकारी मेडिकल कॉलेज और सैकड़ों निजी कॉलेज खुले हों, लेकिन उससे पहले करीब 40 वर्षों तक कोई भी मेडिकल कॉलेज प्रदेश में नहीं खुला। 

डॉक्टरों की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति उदासीन रवैये की हकीकत लखनऊ समेत आसपास के जिलों में देखी जा सकती है। लोहिया अस्पताल में बलरामपुर से आए संतोष कश्यप बताते हैं, पत्नी को दिखाना था, सुबह नौ बजे से लाइन में हैं, लेकिन दो बजे तक नंबर नहीं आया।” बाराबंकी जिले के सूरतगंज ब्लॉक के छेदा पीएचसी पर महीनों से कोई डॉक्टर नहीं है। गुरुवार को फार्मासिस्ट ने कहा, विश्व स्वास्थ्य दिवस क्या है पता नहीं, ये बड़े अस्पतालों में मनाया जाता होगा। बाराबंकी के जिला अस्पताल में 14 डॉक्टर हैं लेकिन अधिकतर छुट्टी पर रहते हैं। हॉस्पिटल की क्लर्क सविता तिवारी बताती हैं “हर दिन यहां दो सौ मरीजों को ओपीडी में देखा जाता है।” इसी तरह रायबरेली डलमऊ विकासखंड के मधुकरपुर पीएसची में बोर्ड पर लिखा मिला कि यहां 24 घंटे प्रसव की सुविधा है, लेकिन अस्पताल में फार्मासिस्ट के अलावा कोई डॉक्टर नहीं मिला। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश की वेबसाइट के अनुसार प्रदेश में 5,172 पीएचसी की ज़रूरत है, जबकि सिर्फ 3692 ही मौजूद हैं। 

एनआरएचएम के सलाहकार और पूर्व डीजी हेल्थ डॉ. बीएस अरोड़ा ने पिछले दिनों गाँव कनेक्शन को बताया था, “चार साल से 5,000 डॉक्टरों की कमी है। स्वास्थ्य विभाग, लोक सेवा आयोग को भर्तियों के लिए बोलता है, लेकिन जितनी भर्तियां होती हैं उससे ज्यादा डॉक्टर रिटायर हो जाते हैं। साथ ही, नियुक्तियों के अनुपात में डॉक्टर सरकारी नौकरी के लिए आवेदन ही नहीं करते हैं।” डॉ. अरोड़ा बताते हैं, “उत्तर प्रदेश में डॉक्टरों की ही कमी नहीं है, बल्कि उन्हें प्रशिक्षित करने वाले मेडिकल कॉलेज भी उस अनुपात में नहीं हैं। अगर मौजूदा दशक को छोड़ दें, तो पिछले 40 वर्षों से प्रदेश में कोई मेडिकल कॉलेज ही नहीं खुला। मौजूदा सरकार में जरूर चार सरकारी कॉलेज खुले हैं।” हालांकि डॉक्टर अरोड़ा बताते हैं, “समस्या सिर्फ इन ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों पर काम करने वाले डॉक्टरों की है। बाकी बिजली, पानी, सफाई व अन्य सुविधाओं के लिए पूरा बजट सीएमओ को दिया जाता है।” एक रिपोर्ट के मुताबिक करीब 75 फीसदी डॉक्टर शहरों में तैनात हैं। 

आखों देखी ---

24 घंटे तो दूर दिन में कभी नहीं मिलते डॉक्टर

रायबरेली। डलमऊ विकासखंड का मधुकरपुर पीएचसी के बोर्ड में लिखा है कि 24 घंटे प्रसव की सुविधा, लेकिन अस्पताल फार्मासिस्ट के सहारे हैं। यहां कोई डॉक्टर तैनात नहीं है। आसपास के 20 गाँवों के दस हजार लोग इसी पीएचसी के सहारे हैं। यहां पर बने कर्मचारी आवास भी जर्जर हैं। केंद्र में दो एएनएम हैं जो केवल हाजिरी लगाने ही केंद्र पर आती हैं। यहीं के सेमरी सामुदायिक केंद्र में तैनात डॉक्टर ओएन गौतम पर्चे में अधिकतर दवाइयां बाहर से लिखते हैं।

लाइन में लगे-लगे आ गया चक्कर नहीं मिले डॉक्टर

बाराबंकी। जिला महिला हॉस्पिटल में तड़के सुबह से लेकर देर शाम तक इलाज के इंतजार में भटकना पड़ता है। कहने को यहां 14 डॉक्टरों का स्टाफ है, लेकिन उनमें से ज्यादातर डॉक्टर छुट्टी पर ही रहते हैं। हॉस्पिटल की सिस्टर इंचार्ज डॉ. प्रेमलता शर्मा बताती हैं, “महिला मरीजों की संख्या तो बढ़ती है लेकिन स्टाफ की भी कुछ कमी है।” हॉस्पिटल की क्लर्क सविता तिवारी बताती हैं, ‘’हर दिन यहां दो सौ मरीजों को ओपीडी में देखा जाता है।”  बेहटा गाँव की सुमन देवी (25 वर्ष) को लाइन में लगे-लगे चक्कर आ गए। होश आने पर सुमन ने बताया, “कई दिनों से चक्कर काट रही हूं, जब तक नंबर आता है, डॉक्टर उठ जाते हैं।”

मैनपुरी में फार्मासिस्ट के पास हर मर्ज़ का इलाज

मैनपुरी। जनपद में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। सात सीएचसी, पांच पीएसची, एक संयुक्त जिला चिकित्सालय, एक महिला अस्पताल के साथ एक आयुष चिकित्सालय है। विकास खंड कुरावली के पीएसची सलेमपुर में सालभर से यहां कोई चिकित्साधिकारी नहीं है। एकमात्र फार्मासिस्ट रविन्द्र सिंह वर्मा ही जिम्मेदारी संभल रहे हैं। न दवा है ना सुविधा। सालभर से ट्रांसफार्मर फूंका होने की वजह से बिजली गुल है। मरीज बाहर से दवा लाने को मजबूर हैं।

लखनऊ में भी इंतजार का दर्द

लखनऊ। लोहिया संस्थान में न्यूरो चिकित्सक कक्ष के सामने जांच कराने आए मरीजों को डॉक्टर के न मिलने से वापस जाना पड़ा। बलरामपुर गोंडा से आए संतोष कश्यप ने बताया कि वह सुबह नौ बजे अपनी पत्नी की जांच कराने के लिए इंतजार कर रहे हैं। अभी तक नंबर नहीं आया। बस्ती से अपने बच्चे की जांच की रिपोर्ट दिखाने आए गया प्रसाद का भी यही हाल था। उन्होंने बताया कि ग्यारह बजे से अपने बीमार बच्चे के साथ डॉक्टर को रिपोर्ट दिखाने के लिए बैठे हैं। 

विश्व स्वास्थ्य दिवस ---

नई दिल्ली। देश की करीब 70 प्रतिशत आबादी गाँव में निवास करती है और छोटी के लिए लोगों को कोसों दूर जाना पड़ता है। गाँव-देहात में स्वास्थ्य केंद्रों एवं डॉक्टरों की भारी कमी है, वहीं देश में मधुमेह, टीबी से प्रभावित लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की क्षेत्रीय निदेशक पूनम खेत्रपाल ने कहा कि मधुमेह आज लोगों में तेजी से बढ़ रहा है। भारत समेत दक्षिण एशिया के देशों को मधुमेह की रोकथाम के लिए सुनियोजित पहल करनी चाहिए जो बेहद घातक बनता जा रहा है। साल 2030 से यह सातवां सबसे बड़ा जानलेवा कारक बन सकता है। जाने माने चिंतक के एन गोविंदाचार्य ने कहा कि देश की आजादी के 67 वर्ष गुजरने के बाद भी गाँव देहात में स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं का विकास नहीं हो पाया है। आज भी लोगों को छोटी-छोटी बीमारियों के उपचार के लिए कई-कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि ऐसे में देश की ग्राम पंचायतों को केंद्रीय बजट की 7 प्रतिशत राशि सीधे उपलब्ध करायी जाए ताकि ग्रामीण स्तर पर ठोस बुनियादी स्वास्थ्य व्यवस्था का विकास किया जा सके। जार्ज इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल हेल्थ के वरिष्ठ शोधकर्ता ओमन जॉन ने कहा कि भारत में मधुमेह एक जानलेवा रोग बन गया है। वर्तमान अनुमानों के अनुसार 12.5 प्रतिशत भारतीय वयस्कों में मधुमेह के लक्ष्ाण हैं। ये आंकड़े गंभीर हैं क्योंकि इससे हृदय, किडनी एवं शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंग प्रभावित होते हैं। ऐसे में इस बीमारी को सजगता और जागरुकता के साथ परास्त करने की जरूरत है।

अतिरिक्त रिपोर्टिंग-लखनऊ से ज्योत्सना सिंह, मैनपुरी-वीरभान, रायबरेली-अनुराग, बाराबंकी से सतीश कश्यप और वीरेंद्र सिंह

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