एक सूखाग्रस्त गांव ने तीन साल बाद मनाया जल उत्सव

एक सूखाग्रस्त गांव ने तीन साल बाद मनाया जल उत्सव(सभी फोटो साभार: गूगल)

लखनऊ। अगर ग्रामीण एकजुट हो जाएं तो निश्चित रूप से अपने गाँव की किस्मत बदल सकते हैं। एक वक्त था, महाराष्ट्र का एक गाँव सूखे से जूझ रहा था। गाँव के किसान सूखे के कारण खेती करना भी छोड़ रहे थे। वहीं, खेतिहर मजदूर के पास अब गाँव में काम भी नहीं था। ऐसे में काम की तलाश में कई परिवारों ने यह गाँव छोड़ दिया।

आखिरकार गाँव के हालात से त्रस्त हो चुके ग्रामीणों ने अपने गाँव को सूखे से बचाने का मन बना लिया। बस, फिर क्या था, ग्रामीण एकजुट हो गए और धीरे-धीरे अपने गाँव में सूखे से लड़ने के लिए काम करना शुरू किया। वक्त पलटा। जब पूरा महाराष्ट्र सूखे की जद में था, तो इस गाँव में पानी की कोई कमी नहीं थी। आपको जानकार हैरानी होगी कि 350 परिवारों वाले इस गाँव में आज 340 कुएं हैं, जो पानी से लबालब भरे हैं। आइये आपको इस गाँव के बारे में बताते हैं कि गाँव वालों ने कैसे अपने गाँव को सूखा दूर कर जल उत्सव मनाया।

100 फीट तक नीचे चला गया था पानी

यह गाँव महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में है और इस गाँव का नाम है हिवरे बाजार। यह गाँव 80-90 दशक में भयंकर सूखे से जूझ रहा था। गाँव में जलस्तर 100 फीट से नीचे तक पहुंच गया था। आलम यह था कि गाँव वाले पीने के पानी के लिए भी तरस रहे थे। गाँव के हालात यहां तक हो गये कि लोग गाँव से पलायन करने लगे। तब 1990 के आस-पास ग्रामीणों ने आदर्श ग्राम योजना के तहत गाँव की कायापलट करने का मन बनाया।

सबसे पहले ग्रामीणों ने ग्राम पंचायत की मदद से एक कमेटी बनाई और सरकारी अधिकारियों से योजनाओं की जानकारी के साथ उनसे मदद ली। तब पूरे गाँव के लोगों ने जल संरक्षण के प्रति काम करना शुरू किया। इस काम में गाँव के एमकॉम पास युवक पोपट राव पवार ने गाँव की सूरत बदलने में ग्रामीण वालों का साथ दिया। बाद में उन्हें गाँव का सरपंच भी बनाया गया।

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ग्रामीणों ने किया श्रमदान, ऐसे शुरू हुआ काम

गाँव की कायापलट करने के लिए धन की जरूरत थी। ऐसे में ग्रामीणों को सरकारी योजना से फंड मिला और तब ग्रामीणों ने कमेटी के तहत गाँव में कुआं खोदने और पेड़ लगाने का श्रमदान शुरू किया। गाँव में जगह-जगह पेड़ लगाए गए। पहाड़ियों से नीचे बह रहे पानी को रोकने के लिए जगह-जगह छोटे-छोटे नाले खोदे गये और बांध बनाए गए। इतना ही नहीं, बारिश के पानी का भी सरंक्षण करना शुरू किया गया और उसका सही इस्तेमाल किया गया। आखिरकार तीन साल में असर दिखाई देने लगा। गाँव में जलस्तर ऊपर आने लगा। जमीन में पानी रिसने से कुओं में पानी दिखने लगा। लगातार पेड़-पौधे लगाने से गाँव में हरियाली नजर आने लगी और सख्त जमीन में नमी पैदा होने लगी। सालों तक ग्रामीणों के लगातार श्रमदान, पानी का सही इस्तेमाल और पानी के जबर्दस्त प्रबंधन ने हिवरे बाजार गाँव को ग्राम विकास की असाधारण मिसाल बना दिया।

बैन कर दिया था ज्यादा पानी फसलों को

एक वक्त था जब कमेटी ने ग्रामीणों ने ज्यादा पानी फसलों पर रोक लगा दी। मगर आज इस गाँव में पानी की कोई कमी नहीं है। इस प्रयास में कुओं की संख्या भी बढ़ी और 340 कुएं लबालब पानी से भरे नजर आने लगे। बड़ी बात यह है कि हिवरे बाजार ग्राम पंचायत और गाँव वालों ने पानी के एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दे को एक बड़े रूप में देखा। जलसंचयन के उदाहरण भले ही आपको कई गाँव में मिल जाएं, मगर गाँव वालों ने यहां फसल पद्धति ही बदल दी। अब हर बारिश के बाद हिरवे बाजार के लोग फसल की योजना बनाते हैं। गाँव के किसान आलू, प्याज, फल, फूल और सब्जी उगाते हैं और साल में तीन बार फसल उगाते हैं। गाँव के सरपंच पोपट पवार ने एक टीवी चैनल को इंटरव्यू देने के दौरान बताया कि अब गाँव की स्थिति पूरी तरह बदल गई है और ग्रामीणों की मदद और मेहनत से गाँव अब सूखाग्रस्त नहीं रहा। अब यहां के किसान फसलों से करोड़ों रुपये तक कमाते हैं। यही कारण है कि 2007 में इस गाँव को जल संरक्षण के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

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गाँव के सरपंच रहे पोपट राव पवार।

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