सरकारी स्कूलों के बच्चे अब भी कम्प्यूटर से अंजान

सरकारी स्कूलों के बच्चे अब भी कम्प्यूटर से अंजानप्रतीकात्मक फोटो

लखनऊ। हाईटेक हो चुके इस दौर में जहां निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को कम्प्यूटर की शिक्षा दी जा रही है तो वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूल के बच्चे कम्प्यूटर से अंजान हैं। उनके लिए कम्प्यूटर देखना और छूना बस एक सपना है। कक्षा एक-दो के बच्चों ने जहां कप्यूटर के बारे में सुना तक नहीं है तो वहीं कक्षा पांच से आठ तक के बच्चों ने कम्प्यूटर को केवल टीवी के माध्यम से ही देखा है।

लखनऊ मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर काकोरी स्थित प्राथमिक विद्यालय दसदोई में कक्षा चार में पढ़ने वाले ललित धानुक कहते हैं, “कम्प्यूटर क्या होता है, कैसा होता है मुझे नहीं पता।” वह कहते हैं, “मैंने कभी कम्प्यूटर को नहीं देखा है लेकिन अब मुझे भी कम्प्यूटर देखना है।”

कम्प्यूटर सीखने की मेरी बड़ी इच्छा है, लेकिन न तो मेरे स्कूल में कम्प्यूटर है और न ही मेरे किसी रिश्तेदार के घर। ग्राम प्रधान के घर किसी काम से गये थे तो उनके घर पर कम्प्यूटर देखा था लेकिन इसको छू नहीं सके। मैं चाहता हूं कि मेरे स्कूल में भी निजी स्कूलों की तरह कम्प्यूटर लगाया जाये जिससे हम लोग भी कम्प्यूटर सीख सकें।
शिवगौतम कक्षा-6, पूर्व माध्यमिक विद्यालय- माल

वहीं आदर्श जूनियर हाई स्कूल में कक्षा सात में पढ़ने वाली पारुल कहती हैं, “मैंने कम्प्यूटर के बारे में सुना तो बहुत है लेकिन इसको ज्यादातर टीवी पर ही किसी न किसी कार्यक्रम में देखा है। मेरे स्कूल के प्रधानाध्यापक संदीप सिंह एक बार स्कूल में किसी काम के लिए कम्प्यूटर लेकर आये थे बैग में, तो जब वह चला रहे थे तब देखा था।” पढ़ाई में तेज पारुल कहती हैं कि मेरा बहुत मन करता है कि मैं भी कम्प्यूटर सीखूं लेकिन इसका अवसर अब तक नहीं मिल सका है।

अभी स्कूलों में विद्युतिकरण का काम जारी है इसके बाद हम लोग कोशिश करेंगे कि स्कूलों में कम्प्यूटर की व्यवस्था की जाए। इसके लिए कुछ एनजीओ से भी बात की जाएगी जो स्कूलों में कम्प्यूटर लगवाने में मदद करेंगे। कुछ स्कूलों में शिक्षा विभाग की ओर से कुछ वर्ष पूर्व कम्प्यूटर लगवाये गए थे, लेकिन वहां विद्वुतिकरण न होने के कारण सफलता हाथ नहीं लगी।
महेन्द्र सिंह राणा, एडी बेसिक

आदर्श जूनियर हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक संदीप सिंह कहते हैं, “स्कूल में एक-दो बार अपना लैपटॉप लाए थे जिसको कुछ बच्चों ने देखा था और पूछा भी था कि यह क्या है। अब मैं कभी-कभी अपना लैपटॉप ले आया करूंगा और बच्चों को कम से कम इसके बारे में बेसिक जानकारी तो दे ही दिया करूंगा ताकि बच्चों का ज्ञानवर्धन हो सके। सरकारी स्कूल या सहायता प्राप्त स्कूलों में कम्प्यूटर आना इतना आसान नहीं है लेकिन मैंने इसके लिए एक संस्था से भी बात की थी लेकिन स्कूल में लाइट न होने के कारण अब तक बात नहीं बन सकी। इसलिए हम लोगों की भी ड्यूटी बनती है कि अपने स्तर से ही इसके बारे में बच्चों को जानकारी देते रहें।”

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