नोटबंदी पर सवाल जो जवाब तलाश रहे हैं ... 

नोटबंदी पर सवाल जो जवाब तलाश रहे हैं ... कंचन पंत नीलेश मिसरा की लेखकों की मंडली की डिप्टी क्रिएटिव हेड हैं। 

मैं मोदी से ना इतनी नफ़रत करती हूं कि उनके हर फ़ैसले को शक की नज़र से देखूं, ना ही इतना प्यार करती हूं कि बिना सवाल किए उनके हर फैसले को सही मान पाऊं। मैं इतनी जानकार भी नहीं हूं कि बड़े-बड़े इकॉनामिक मसले समझ पाऊं, इतनी समर्थ भी नहीं हूं कि कांस्परेसी थ्योरीज़ और आरोपों की अपने दम पर पड़ताल कर सकूं, फिर भी मैं ये बात मानने को तैयार हूं कि सरकार ने ये फ़ैसला देशहित में और सोच समझकर भी उठाया होगा। मैं ये भी मानने के लिए तैयार हूं कि जब सवाल सबके भले का हो तो कुछ कड़े फ़ैसले लेने पड़ते हैं। मैं जानती हूं कि इतने बड़े देश में इतना बड़ा क़दम, चाहे वो कितनी भी तैयारी के साथ लिया जाए, कुछ ना कुछ असंतोष, असमंजस, अव्यवस्था और अराजकता लेकर आएगा ही...फिर भी मेरे कुछ सवाल, कुछ कन्सर्न हैं-

-सुना है ज़्यादातर एटीएम बस दो-तीन घंटे में 'आउट ऑफ कैश' शो करने लगे हैं। एटीएम में कैश की समस्या तो शायद एक-दो हफ़्ते में हल भी हो जाए, लेकिन क्या सरकार को वाकई लगता है कि अपना (या किसी भी देश का) बैंकिंग सिस्टम इतना सक्षम है कि करोड़ों लोगों का हज़ारों करोड़ रुपया सिर्फ 50 दिन में डिपॉज़िट या एक्सचेंज कर सके?

-गांव-देहातों में, जहां ना एटीएम हैं, ना ही लोगों के बैंक एकाउंट वहां पुराने नोट इकट्ठा करने के लिए क्या इंतज़ाम हैं? क्योंकि ये कहकर आपकी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं हो जाती कि 'हमने तो कहा था जनधन एकाउंट खुलवा लो'

-ऐसे बुज़ुर्ग, जो अपनी पेंशन के लिए भी साल में एक बार किसी तरह बैंक जा पाते हैं, उनके लिए क्या कुछ अलग इंतज़ाम नहीं किए जाने चाहिए?

-2008 का इकनॉमिक मेल्टडाउन हम झेल गए इसकी एक वजह ये भी थी की हमारे देश में लोगों के पास हार्ड कैश है। घर के कमाने वाले सदस्यों के साथ, गृहणियां भी ज़रा-ज़रा पैसे जोड़ती रहती हैं, कपड़ों की पोटलियों के बीच, चावल-चीनी के डिब्बों में, साड़ियों की गांठों में छुपा कर रखे वही रुपए आड़े वक्त में घर चलाने के काम आते रहे हैं।अब सौ-सौ, दो-दो सौ करके जमा किए हुए उन रुपयों का हिसाब आप मांगने लगे तो बताइए कैसे चलेगा?

-ऐसे देश में, जहां एक ज़रा सी अफवाह पर पैनिक करके लोग चुटकी भर ज़रूरत वाले नमक की बोरियां खरीदने लगते हैं, उस देश के लिए एकदम से ये झटका कहीं थोड़ा ज़्यादा तो नहीं हो गया?

-दुनिया कहती है, और इतिहास गवाह है कि बैंकों से ज़्यादा बड़ा लुटेरा कोई और नहीं रहा। लोग घरों का पैसा बैंक में डालेंगे, बैंकों की लिक्विडिटी बढ़ेगी... अच्छा है, बैंक फलेंगे-फूलेंगे तो भला आखिर देश का ही होगा, लेकिन क्या आप गारंटी दे सकते हैं कि हमारा पैसा बैंक फिर से उन्हीं करोड़पतियों, अरबपतियों को कर्ज़ नहीं देंगे, जो कि पहले से ही देश का लाखों करोड़ दबा कर बैठे हैं?

-और एक आखिरी सवाल! मैं दिल से चाहती हूं कि इस फ़ैसले से देश का भला हो। 'देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है' सिर्फ पंचलाइन के बजाए हकीकत बन जाए, लेकिन...मान लीजिए इस फ़ैसले का रिज़ल्ट उम्मीद के मुताबिक नहीं आता, मान लीजिए सरकार का ये फ़ैसला बस एक तुकलकी फरमान बनकर रह जाता है, तब क्या इस 'अनप्रेसिंडेंटड' फैसले की ज़िम्मेदारी लेकर प्रधानमंत्री इस्तीफ़ा देने का अनप्रेसिडेंटेड फैसला लेंगे?

अगर हां, तो हम देश के आम लोग दिन-दिन भर एटीएम की लाइन में लगने को, बैंकों के धक्के खाने को, बकाया टैक्स भरने को, 500 और 1000 के इन नामुराद नोटों को भूल जाने को तैयार है।

लेखिका, पत्रकार और साहित्यकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।

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