बस्तर का पर्व नवा खानी : धान की नई फसल पकने पर ग्रामीण मनाते हैं जश्न

नई फसल पकने पर भारत में कई त्योहार मनाए जाते हैं। ऐसे ही एक पर्व छत्तीसगढ़ में नवा खानी होता है। झारखंड में इस दौरान कर्मा त्योहार मनाया जाता है।

बस्तर का पर्व नवा खानी : धान की नई फसल पकने पर ग्रामीण मनाते हैं जश्नबस्तर जिले के छोटे कवाली गांव में नवा खानी पर्व मनाते ग्रामीण। फोटो शकील रिज़वी

बस्तर (छत्सीगढ़)। भारत त्योहारों का देश हैं। यहां हर मौसम और क्षेत्र का एक त्योहार है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में बरसात के सीजन में नई फसल तैयार होने पर एक खास त्योहार मनाया जाता है, इसे 'नवा खानी' कहते हैं।

बस्तर धुरवा और हल्बा जनजाति बाहुल क्षेत्र है,जहां पिछले दिनों नवा खानी पर्व मनाया गया। परंपरा के अनुसार धान की नई फसल की बालियों की तोड़कर उन्हें आग में भूना जाता है। ग्रामीण सबसे पहले अनाज से घर की देवी को भोग लगाते हैं। फिर पूरा परिवार खाता है। बस्तर में नवा खानी त्योहार धान के अलावा आम के सीजन में ही मनाया जाता है।

पिछले कई वर्षों से बस्तर में ग्रामीणों के बीच रह रहे सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण पर्टयन को बढ़ावा देने वाले शकील रिज़वी ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा कि बस्तर का पर्व नवा खानी में नई फसल को पकाकर गुड़ी में अर्पित करते हैं। इसमें बच्चे, बड़े और बूढ़े सभी शामिल होते हैं और गांव में घर-घर जाकर नाचते-गाते एक दूसरे को बधाई देते हैं।'

परंपरा के अनुसार धान की नई फसल की बालियों की तोड़कर उन्हें आग में भूना जाता है। ग्रामीण सबसे पहले अनाज से घर की देवी को भोग लगाते हैं। फिर पूरा परिवार खाता है।


शकील रिज़वी ने गांव कनेक्शन को बताया इस दौरान कुछ लोग लोग गेड़ी (लकड़ी का एक यंत्र) पर चढ़कर ये त्योहार मनाते हैं। नवा खानी के बाद गेड़ी को तोड़कर गांव के बाहर एक स्थान पर छोड़ दिया जाता है। इसी समस फसल और जानवरों को बीमारियों से बचाने के लिए ग्राम की गुड़ी (मंदिर) में देवी-देवताओं को भेंट भी चढ़ाई जाती है।

गेड़ी के बारे में शकील रिज़वी बताते है कि पहले बरसात के सीजन में गांवों में पानी और कीचड़ हो जाया करता था, इसलिए सभी लोग गेड़ी पर भी चढ़कर ऐसा करते थे, लेकिन अब गांवों में सड़कें बनने से ये प्रथा लगभग समाप्त हो गई है।

झारखंड में नई फसल उगने पर मनाया जाता है कर्मा फेस्टिवल

छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य झारखंड में भी नई फसल आने पर जश्न मनाया जाता है, यहां इसे करमा (कर्मा) कहते हैं। कर्मा के बारे में कहा जाता है कि कि ये पर्व कृषि और प्रकृति से जुड़ा पर्व है, जिसे झारखंड के सभी समुदाय हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। कर्मा नृत्य को नई फ़सल आने की खुशी में लोग नाच गाकर मनाते हैं। इस पर्व को भाई-बहन के निश्छल प्यार के रूप में भी जाना जाता है।

कर्मा भादों महीने की उजाला पक्ष की एकादशी को यह पर्व पूरे राज्य में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है जबकि इस पर्व की तैयारियां महीनों पहले शुरू हो जाती हैं और पूजा पाठ एकादशी के पहले सात दिनों तक चलता है।

रांची विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही आदिवासी छात्रा दीपशिखा इस पर्व के बारे में बताती हैं, "जैसे रक्षाबंधन में भाई बहनों को उनकी रक्षा की बात कहते हैं वैसे ही हमारे यहाँ करमा पर्व में बहनें व्रत रखकर भाई की रक्षा का संकल्प लेती हैं। हम व्रत करते हैं पारम्परिक परिधान पहनकर कई दिन पहले से ही नाचना गाना शुरू कर देते हैं।"

प्रकृति और भाई-बहन के निकटता का यह पर्व ये सन्देश देता है कि यहाँ की हरियाली और पेड़-पौधे इसलिए हरे-भरे हैं क्योंकि यहाँ के लोग प्रकृति की पूजा करते हैं। इनके देवता ईंट के बनाए किसी मन्दिर या घर में कैद नहीं होते बल्कि खुले आसमान में पहाड़ों में रहते हैं। झारखंडी संस्कृति के लोग किसी आकृति वाली मूर्ती की पूजा नहीं बल्कि प्रकृति की पूजा करते हैं। इनके हर पर्व की तिथियाँ, मन्त्र सबकुछ इनके अपने होते हैं। जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ हरी उरांव ने बताया, "हम लोग पेड़-पौधे और जंगल के बिना नहीं जी सकते, इसलिए इनकी रक्षा और देखरेख करने के लिए हमारे यहाँ कई पर्व मनाये जाते हैं जिसमे करमा पर्व सबसे बड़ा पर्व है।

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झारखंड में कर्मा त्योहार मनाते लोग। फोटो- नीतू सिंहझारखंड में कर्मा त्योहार मनाते लोग। फोटो- नीतू सिंह




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