यूपी के मनरेगा मज़दूरों का 235 करोड़ बकाया

यूपी के मनरेगा मज़दूरों का 235 करोड़ बकायायूपी के मनरेगा मज़दूरों का 235 करोड़ बकाया फोटो: विनय गुप्ता

लखनऊ। ललितपुर के छिंगा सहरिया ने मई-जून की शरीर झुलसाने वाली गर्मी में मनरेगा के तहत बंधी बनाने में काम किया था। छह महीने गुजर गए, बीच में दो मौसम बदल गए लेकिन उन्हें आज तक मजदूरी नहीं मिली। छिंगा सहरिया अब आगे मनरेगा का काम नहीं करना चाहते। छिंगा जैसे प्रदेश में लाखों मजदूरों को 4-6 महीने से मजदूरी नहीं मिली है।

उत्तर प्रदेश में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) के तहत 163.48 लाख जॉब कार्ड दिए गए हैं, जबकि मजदूरों की संख्या 237.03 लाख है। मनरेगा की वेबसाइट के अनुसार करीब 106.41 लाख मजदूर सक्रिय रूप से काम भी करते हैं। लेकिन अब इनमें हजारों मजदूर मनरेगा के तहत शायद ही काम करें। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में मनरेगा मजदूरों का 235 करोड़ रुपए अभी लंबित है।

हम पति पत्नी ने चार महीने पहले मनरेगा के तहत कई दिन काम किया था, लेकिन पैसा नहीं मिला, खाने के लाले हो गए। प्रधान कहते हैं पैसा ऊपर (सरकार) से नहीं आया। अब ऐसे काम करने से अच्छा है कि मनरेगा में काम ही न किया जाए।
रतना सहारिया (45 वर्ष), महिला मजदूर, ललितपुर, बुंदेलखड (यूपी)

बुंदेलखंड के ललितपुर जिला मुख्यालय से पूर्व उत्तर दिशा में 50 किलोमीटर दूर बार ब्लॉक के ग्राम पंचायत सुनवाहा में मनरेहा के तहत 150 लोगों ने बंधी समेत तीन कार्य किए थे, लेकिन उसके पैसे नहीं आए। इसी गाँव की रतना सहारिया (45 वर्ष) मायूसी के साथ बताती हैं, “हम पति पत्नी ने चार महीने पहले मनरेगा के तहत कई दिन काम किया था, लेकिन पैसा नहीं मिला, खाने के लाले हो गए। प्रधान कहते हैं पैसा ऊपर (सरकार) से आना था वो नहीं आया। अब ऐसे काम करने से अच्छा है कि मनरेगा में काम ही न किया जाए।” मनरेगा का पैसा न मिलने से सिर्फ रतना सहरिया ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के मजदूर परेशान हैं। कई जिलों में 4-6 महीनों से पैसा नहीं आया है। मजदूरों के घरों में खाने की समस्या तो है कि प्रधान भी काम करवा कर फंसे हुए हैं। ललितपुर से करीब 500 किलोमीटर दूर बाराबंकी जिले में सूरतगंज ब्लॉक में दौलतपुर ग्राम पंचायत में मनेरगा का करीब तीन लाख रुपया बाकी है।

गर्मियों के दिनों में बुंदेलखड में बंधी बनाते मजदूर। फोटो- विनय गुप्ता

मेरी पंचायत में करीब 3 लाख रुपया बाकी है। पैसा नहीं आया, तो काम बंद करना पड़ा। दिवाली पर कई मजदूर घर आ गए थे। मजबूरी में हमें भी उधार- व्यवहार लेकर उन्हें पैसे देने पड़े।
अमित सिंह, प्रधान, दौलतपुर, सूरतगंज, बाराबंकी

यहां डेढ़ महीने से कोई काम भी नहीं हुआ है। गाँव के प्रधान अमित सिंह बताते हैं, “पैसा नहीं आया, तो काम बंद करना पड़ा। दिवाली पर कई मजदूर घर आ गए, उनके घर दिए तक का इंतजाम नहीं था, मजबूरी में हमें भी उधार- व्यवहार लेकर लोगों को काम चलाने भर के पैसे देने पड़े।” कमोबेश यही हालात प्रदेश के दूसरे जनपदों में भी हैं।

इसलिए बढ़ी समस्या

भुगतान न होने से समस्या इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि मनरेगा डिमांड आधारित योजना है। इसके तहत कार्ड धारकों को काम न होने पर 100 दिन की मजदूरी देनी पड़ती है। साथ ही मजदूरों की मांग पर भी प्रधान और पंचायत सचिव कार्य का सृजन यानि नए-नए काम खोजते हैं लेकिन वो अब बेईमानी साबित हो रहे हैं। कार्यों मे पारदर्शिता व मजदूरों के तुरन्त भुगतान के लिए तमाम-नियम कानून बने हैं, फिर भी ये नियम बौने साबित हो रहे हैं।

मजदूरों का करीब 4 लाख रुपया बाकी है। 5-6 माह पहले एमडीआर फीड करवा दिए थे, फिर भी मजदूरों के खातों में पैसा नहीं आया। वो रोज दरवाजे पर आकर तगादा करते हैं। विपक्षियों को मौका मिल गया है।
छत्रपाल सिंह, प्रधान, ग्राम पंचायत, सुनवाहा, ललितपुर

प्रधानों के लिए भी समस्या

मनरेगा में ऑनलाइन भुगतान यानि पैसा सीधे बैंक खाते में आता है। बावजूद इसके लगातार लेटलतीफी होती है। जिससे प्रधानों को अपनी साख भी खतरे में नजर आती है। ललितपुर में सुनवाहा पंचायत के प्रधान छत्रपाल सिंह बताते हैं, “मजदूरों का करीब 4 लाख रुपया बाकी है। 5-6 माह पहले एमडीआर फीड करवा दिए थे, फिर भी मजदूरों के खातों में पैसा नहीं आया। वो रोज दरवाजे पर आकर तगादा करते हैं। विपक्षियों को मौका मिल गया है। मेरी तो इज्जत जा रही है।”

मेहनत के बावजूद पैसा न मिलने से मायूस ग्रामीण अब मनरेगा में काम नहीं करना चाहते।

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