नक्सली इलाके में जहां उड़ती रहती थी बारुद की गंध, अब लहालहा रही है सब्जियों की फसलें

Ashwani NigamAshwani Nigam   29 Jan 2018 11:09 AM GMT

नक्सली इलाके में जहां उड़ती रहती थी बारुद की गंध, अब लहालहा रही है सब्जियों की फसलेंसोनभद्र का एक किसान

लखनऊ/सोनभद्र। झारखंड से सटे उत्तर प्रदेश के नक्सल प्रभावित जिस इलाके में बारुद की गंध आती रहती थी, वहां आजकल हरी-हरी सब्जियां लहलहा रही हैं। हिंसा और रोजगार की समस्या के चलते जो आदिवासी पलायन कर जाते थे, वो अब सब्जियां उगाकर मुनाफा कमा रहे हैं।

दिल्ली से करीब 11 सौ किलोमीटर दूर यूपी के आदिवासी बाहुल्य सोनभद्र जिले में खनन और खत्म हो रहे जंगलों के चलते हजारों आदिवासियों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो रहा है। जिले में रहने वाले चेरो, गोंड, भुईया, धुरिया, नायक, ओझा, पतारी, अगारिया, खरवार, खैरवार, परहइया, बैगा और पंखा जैसे आदिवासियों के सैकड़ों परिवारों रोजगार न होने से पलायन कर रहे थे, लेकिन अब इनमे से सैकड़ों लोग अपने गांव में ही सब्जियां उगाकर कर जीविका चला रहे हैं।

जंगल से पत्ते आसानी से नहीं मिल रहे थे और खेती कैसे की जाए इसकी जानकारी नहीं था लेकिन बाद में कुछ अधिकारियों ने हम लोगों को अच्छे बीज और जानकारी दी, जिससे पैदावार बढ़िया हुई और अब यही हमारा रोजगार है।
राजवती चेरो, आदिवासी महिला किसान, भालुकुदरा, सोनभद्र

करीब 11 लाख आदिवासी जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में झारखंड से जुड़े इलाके में जंगल से पत्ते लाकर पत्तल बनाने वाली भालुकुदरा गांव की राजवती चेरो के पास कुछ वर्षों से पत्तों की दिक्कत हो रही थी। उनके पास जो जमीन थी उमसें खेती नहीं हो पा रही थी तो घर के पुरुष दूसरे राज्यों में कमाने जाने लगे थे। लेकिन अब वो अपने खेतों में बैंगन समेत दूसरी सब्जियां उगाती हैं। चेरो बताती हैं, जंगल से पत्ते आसानी से नहीं मिल रहे थे और खेती कैसे की जाए इसकी जानकारी नहीं था लेकिन बाद में कुछ अधिकारियों (वैज्ञानिकों) ने हम लोगों को अच्छे बीज और जानकारी दी, जिससे पैदावार बढ़िया हुई और अब यही हमारा रोजगार बन गया है।”

भालुकुदरा गांव में रमारचा किसान के खेत की मटर का निरीक्षण करते अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक।

ट्राइबल सब प्लान के जरिए आदिवासी परिवारों को ट्रेनिंग के साथ ही बेहतर बीज और जैविक खाद उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे अब तक 14 गांवों के सैकड़ों आदिवासी परिवार लाभान्वित हुए हैं।
डॉ. बिजेंद्र सिंह, निदेशक, भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी

सोनभद्र में चोपन, कोटा और पंदरच ब्लॉक में आदिवासियों की माली हालत सुधारने के लिए भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान वाराणसी उन्हें बेहतर तरीकों से सब्जियां उगाने का प्रशिक्षण दे रहा है। अनुसंधान के निदेशक डॉ. बिजेन्द्र सिंह ने इसे बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा, “ट्राइबल सब प्लान के जरिए आदिवासी परिवारों को ट्रेनिंग के साथ ही बेहतर बीज और जैविक खाद उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे अब तक 14 गांवों के सैकड़ों आदिवासी परिवार लाभान्वित हुए हैं।”

मृदा परीक्षण कर बताते हैं उपाय

डॉ. बिजेन्द्र ने बताया, “ योजना के तहत किसानों के खेत की जांचकर उन्हें बताया जाता है कि वो कौन सी फसल उगा सकते हैं। फिर वैज्ञानिकों की देखकर में फसलें उगाई जाती है। इसका बड़ा असर ये हुआ है कि एक तरफ जहां आदिवासियों की औसत आय में बढ़ेतरी हुई है वहीं उनके भोजनस्तर और स्वास्थ्य में भी सुधार हो रहा है।”

आदिवासियों में जागरूकता की कमी है। इस कारण जमीन उपजाऊ होने के बावजूद लाभ नहीं कमा पा रहे थे, सिर्फ जंगल के भरोसे थे। लेकिन अब नई तरह की खेती से इऩकी जीवनशैली भी बदलने लगी है।
डॉ. नीरज सिंह, प्रधान कृषि वैज्ञानिक, सब्जी अनुसंधान संस्थान

इस परियोजना से जुड़े संस्थान के प्रधान कृषि वैज्ञानिक डॉ. नीरज सिंह ने कहा, “आदिवासियों में जागरूकता की कमी है। इस कारण जमीन उपजाऊ होने के बावजूद लाभ नहीं कमा पा रहे थे, सिर्फ जंगल के भरोसे थे। लेकिन अब नई तरह की खेती से इऩकी जीवनशैली भी बदलने लगी है।”

पढ़ालिखा नहीं हूं। पहले जंगल में लकड़ी काटने का काम करता था लेकिन वह काम बंद हो गया शहर जाकर मजदूरी करता था। लेकिन अब मुर्गी पालन करने लगा हूं। गांव के लोग ही मुर्गी और अंडे खरीद लेते हैं तो सब ठीक हो गया है।
अंगद गोंड, आदिवासी ग्रामीण, पदरंच ग्राम पंचायत, चोपन, सोनभद्र

अंगद गोंड अब शहर में मजदूरी करने जाने के बजाए गांव में मुर्गी पालन करते हैं।

मुर्गीपालन से भी बढ़ा रहे कमाई

सोनभद्र के आदिवासियों को सब्जी की खेती के साथ ही मुर्गीपालन का भी प्रशिक्षण संस्थान की तरफ से दिया जा रहा है। इन आदिवासियों के बीच 19 हजार चूजे भी वितरित किए गए हैं। इसके जरिए यहां के आदिवासी अंडे और चिकन को बेचकर अपनी कमाई बढ़ा रहे हैं। चोपन ब्लॉक के पंदरच ग्राम पंचायत के अंगद गोंड ने बताया, ‘’पढ़ालिखा नहीं हूं। पहले जंगल में लकड़ी काटने का काम करता था लेकिन वह काम बंद हो गया तो कुछ दिन जिले मुख्यालय जाकर मजूदरी की। रहने और खाने का ठिकाना नहीं था। परिवार से भी दूर रहना पड़ता था। इसी बीच कृषि वैज्ञानिकों ने गाँव में प्रशिक्षण देना शुरू किया। इसके बाद से घर में ही मुर्गीपालन कर रहा हूं। गाँव में ही बाहर से आकर लोग मुर्गी और अंडा खरीद लेते हैं। अब कोई दिक्कत नहीं है।’’

11 लाख, 34 हजार, 273 आदिवासी रहते हैं उत्तर प्रदेश में

उत्तर प्रदेश में साल 2011 की जनगणना के अनुसार 11 लाख, 34 हजार, 273 आदिवासियों की संख्या है। जो भारत में निवास करने वाले आदिवासियों की संख्या का 1.1 प्रतिशत है। साथ ही, प्रदेश की कुल जनसंख्या का 0.6 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में भोतिया, बुक्सा, जन्नसारी, राजी, थारू, गोंड, धुरिया, नायक, ओझा, पाथरी, राज गोंड, खरवार, खैरवार, सहारिया, परहइया, बैगा, पंखा, अगारिया, पतारी, चेरो, भुइया और भुइन्या जैसे आदिवासी निवास करते हैं। सोनभद्र, मिर्जापुर, सिद्धार्थनगर, बस्ती, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी और ललितपुर ऐसे जिले हैं जहां पर आदिवासी रहते हैं।

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