नहीं रहेंगे कुम्हार तो कहाँ से आएंगे दीवाली के दिए?

मिट्टी के ये बर्तन चलन से बाहर क्यों हो गए, इनका इस्तेमाल अब गिनती के लोग क्यों करते हैं ? मिट्टी के कलश अब नवरात्र समेत कुछ पूजा-पाठ और शादी ब्याह में ही नजर आते हैं।

लखनऊ। जब फ्रीज नहीं हुआ करते थे, लोग घड़ों में रखा पानी पीते थे, ये न सिर्फ ठंडा होता था बल्कि इसका स्वाद भी कई गुना बेहतर होता था। लेकिन जैसे-जैसे मशीनरी हमारे घरों में आने लगी देसी फ्रीज कहे जाने वाले मटके, घड़े सुराही गायब हो गए। हमारी आप की उम्र के लोगों ने बचत का पहला तरीका भी मिट्टी की गुल्लक से सीखा होगा। लेकिन मिट्टी के ये बर्तन धीरे-धीरे कुछ साल पहले चलन से बाहर हो गए।


लेकिन कभी आपने कभी गौर किया है, मिट्टी के ये बर्तन चलन से बाहर क्यों हो गए, इनका इस्तेमाल अब गिनती के लोग क्यों करते हैं ? मिट्टी के कलश अब नवरात्र समेत कुछ पूजा-पाठ और शादी ब्याह में ही नजर आते हैं।

मिट्टी के बर्तन बनाने वालों की जिन्दगी को नजदीक से जानने के लिए गाँव कनेक्शन टीम ने जब लखनऊ जनपद का दौरा किया तो यात्रा का पहला चरण बेहद मायूस करने वाला था। अधिकांश गांवों में कुम्हार के चाक का घूमता पहिया थम चुका है। कभी अपनी तेज गति पर इतराने वाले चाक कही हाते (घर के बाहर का आंगन )में कोने में पड़े मिले तो कहीं भूसे की कोठरी में। लखनऊ की तराई में बसे गाँव अकड़रिया कलां के जंगली कुम्हार करीब एक दशक पहले ही पैतृक काम छोड़ शहर में चाट बेचते हैं। जंगली कुम्हार बताते हैं, " बहुत मेहनत का काम था, पिताजी करते थे उस समय सहालग (शादी ,ब्याह ,त्यौहार )में अच्छा काम मिलता था। साथ ही पैसे और जिसके यहाँ शादी हो इज्जत के साथ खाना भी मिलता था ,लेकिन धीरे धीरे समाज का नजरिया हमारे काम को लेकर बदलने लगा और कुल्हड़ की जगह फाइबर के सस्ते गिलास मार्केट में आ गये। अब तो हमलोग खुद शादी बारात में फाइबर के गिलास और पत्तल प्रयोग करते है।"


पूरे परिवार के साथ मिट्टी का काम करता हूँ दूसरो की मजदूरी करने से ये बेहतर है ..

चाक के घूमते पहिए की तलाश में जब गाँव कनेक्शन टीम लखनऊ के गाँव बाना (मामपुर) पहुंची तो वहां के कुम्हार 58 वर्षीय रमजान से मुलाकात हुई। चाक पर मिट्टी रमजान के इशारे पर नाच रही थी। रमजान ने चाक पर गुल्लक,दीपक ,मटकी ,सुराही , कप ,गिलास ,कुल्हड़ और मिट्टी की चिलम बनाकर दिखाई, रमजान के यहाँ आज भी दो चाक हैं, रमजान ने बताया की एक चाक बैरिंग पर चलता है और दूसरा चाक खूंटी पर चलता है हालांकि अब मार्केट में बिजली वाले चाक भी आ गये है पर उनमें एक तो खर्चा ज्यादा है और बाजार में इतना मांग भी नहीं है। रमजान आज भी खूंटी वाले चाक का इस्तेमाल करते हैं।
रमजान बताते हैं कि उनके परिवार में दो बेटे ,पोते और बहू हैं। दस साल की उम्र से बड़े जितने भी सदस्य परिवार में है, सब काम करते हैं पास के तालाब से तांगे से मिटटी लाना ,मिटटी को आंटे की तरह गूंथना फिर मिटटी से बर्तन बनाना,उन्हें धूप में सुखाना और उन्हें भट्ठी में पकाकर तैयार करना यही हमारे पूरे परिवार की दिनचर्या हैं। हम सिर्फ गाँव घर में जहाँ पुरखों के समय से गर्मी में घड़े व् किसी मौके पर बर्तन देने की प्रथा रही हैं उन्ही के यहाँ बर्तन लेकर जाते हैं बाकी अब छोटे कुम्हार जो चाक नहीं चलाते। उन्हें थोंक में बेचते है और वो लोग बर्तनों को फुटकर बाजार में बेचते है,पहले जैसे इस काम में फायदा तो नहीं रहा पर दूसरो की मजदूरी से ये काम आज भी बेहतर है।"
देश में लाखों लोग ऐसे हैं, जिन्हें आज भी मिट्टी के बर्तन भाते हैं। वो कुम्हार भी सफल हैं जिन्होंने काम का तरीका बदला है। टेराकोटा जैसी कलाएं और सजावटी सामान बनाने वाले कुम्हार इसे रोजगार की तरह चला रहे हैं। लेकिन मिट्टी के बर्तनों के कद्रदान कम नहीं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज के सर्जन डॉ. एके सिंह घड़े के पानी मुरीद हैं। डॉ. एके. सिंह बताते हैं, "घड़े में पानी ठंडा करने में कोई खर्च नहीं लगता, इसमें सोंधापन, मिठास के साथ लणव (मिनिरल्स) होते हैं। अगर घड़े में बराबर साफ–सफाई रखी जाए इसका पानी आज भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा है । जो लघु उद्योग खत्म होने की बात है तो उसके लिए सरकारी सुरक्षा के साथ लोगो की रूचि का भी इसमें बने रहना जरुरी हैं।"
देसी चीजों की उपेक्षा और विदेशी सामान प्रयोग बड़े होने की निशानी
यूपी में लखनऊ ढेलवासी गाँव के सेवानिवृत्त 91 वर्षीय शिक्षक कृष्ण कुमार द्विवेदी बताते हैं गर्मी ,त्यौहार में कुम्हारों को बुलाना नहीं पड़ता था ,कुम्हार खुद बर्तन दे जाते थे जब से फाइवर का चलन आया मिटटी के कुल्हड़ लोगों ने छोड़ दिए, जबकि फाइवर में पानी ,चाय, पीना सब नुकसानदायक हैं। लेकिन कुल्हड़ से सस्ता पड़ता है दूसरे आधुनिक होने की निशानी है तो लोग इसे प्रयोग कर रहे है।" वो आगे बताते हैं, गांवों में निर्भरता बाजार की तरफ तेजी से बढ़ रही है। सब कुछ खरीद कर लाने वाला चलन चल रहा है। समाज का ढांचा टूट रहा है। केवल कुम्हार ही नहीं, धोबी, माली, रंगसाज ,रंगरेज ,पनवाड़ी ,दरजी, नौवा ,लोहार ,बढई ,खटिया बीनने वाले ,छप्पर छाने वाले ये लगभग हर गाँव में होते थे और ये सब गाँव के व्यवसाय थे। मेरे देखते देखते बहुत कुछ ख़त्म हो गया। गांधीजी ने स्वदेशी के नारे को कोई मानता नहीं, विदेशी और मशीनी चीजों की मांग ने हमारे पुराने उद्योग धंधों और ग्रामीण कारोबार को चौपट कर दिया।"


जानिए कुम्हारों के बारे में ...

मिट्टी का काम करने वाले समुदाय को प्राय कुम्हार के नाम से जाना जाता है। भारत में कुम्हारों की दर्जनों उपजातिया हैं। उत्तर प्रदेश में में कुम्हारों की उपजाति की हथेलिया,कनौजिया , सुवारिया, बर्धिया, गदहिया, कस्तूर और चौहानी हैं। कुम्हारों में इन उपजातियों का चलन कब शुरू हुआ ये स्पष्ट नहीं है लेकिन जो कुम्हार बैलों पर मिट्टी लाद कर लाते हैं वे बर्धिया और जो गधों पर लाते हैं वे गदहिया कहलाते हैं। ऐसे ही बंगाल में इनकी उपजातियों की संख्या बीस के लगभग हैं। जिनमें बड़भागिया और छोटभागिया मुख्य हैं, बड़भागिया काले रंग के और छोटभागिय लाल रंग के बर्तन बनाते हैं। इसी प्रकार दक्षिण भारत में भी कुम्हारों में अनेक उपजातिया है,कुम्हार मूलतः अपना आदि पुरुष ऋषि अगस्त्य को मानते है।कर्णाटक के कुम्हार अपने को अन्य प्रदेशों के कुम्हारों से आज भी श्रेष्ठ मानते हैं।

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