"लड़की हो अकेले कैसे जाओगी? दुनिया ठीक नहीं है," सच में?

दो रिपोर्टर, एक दुपहिया, एक यात्रा। थोड़ी यायावर, थोड़ी पत्रकार बनकर गाँव कनेक्शन की जिज्ञासा मिश्रा और प्रज्ञा भारती ने बुंदेलखंड में पांच सौ किलोमीटर की यात्रा की और महिलाओं की नज़र से उनकी ज़िन्दगी, मुश्किलों और उम्मीदों को समझा।

Pragya BhartiPragya Bharti   5 April 2019 12:45 PM GMT

भाग 6:

बड़े-बड़े शहरों के एसी कमरों में बैठ, खबरों और सोशल मीडिया की दुनिया को सच माना जाए तो कोई भी विश्वास करने लायक नहीं है। असल में अकेले घूमना इतना भी मुश्किल नहीं है बल्कि ढेरों खूबसूरत अनुभव समेटने वाला है। (लड़की होने पर भी क्योंकि सबसे पहले जो सुनने को मिलता है वो यही कि, "लड़की हो अकेले कैसे जाओगी? दुनिया ठीक नहीं है।")

चित्रकूट, सतना, पन्ना (उत्तर प्रदेश/मध्यप्रदेश)।

'किसी पर विश्वास मत करना, गाँव के लोग ऐसे ही होते हैं।'

'अपना सामान कहीं भी नहीं छोड़ना, हमेशा अपने साथ ही रखना।'

जब हम अपनी यात्रा पर निकल रहे थे तो कुछ इस ही तरह की बातें हमें कही गईं। आप नई जगह जाने वाले हों तो कई तरह के सुझाव मिलते हैं। खास तौर पर सुरक्षा को लेकर और अगर आप लड़की हो तो ये सुझाव बढ़ कर चार गुना हो जाते हैं। सुझावों और उम्मीदों के साथ हमने 'दो दीवाने' यात्रा शुरू की।

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यात्रा के दूसरे दिन, हम चित्रकूट शहर से सतना जिले की ओर बढ़ रहे थे। चित्रकूट से लगभग 25 किमी दूर छोटा बरूआ गाँव पहुंचे। यहां पहुंच कर एक घर के सामने रुके, सामने लाल साड़ी पहने, सर पर पल्ला रखे एक अधेड़ उम्र की महिला खड़ी थी। हमने उनसे नमस्ते बाद में की पहले पूछा कि क्या वॉशरूम इस्तेमाल कर सकते हैं? उन्होंने भी जवाब में कुछ कहे बिना टॉयलेट का रास्ता दिखा दिया।

बरूआ-


जिस तरह की बातें हमसे कही गई थीं उसके बाद किसी से भी दो अन्जान लड़कियों की मदद करने की अपेक्षा हमें नहीं थी।

'दो दीवाने' सीरीज़ की इस कड़ी में हम बात कर रहे हैं उन लोगों के बारे में जिन्होंने बिना किसी मतलब के हमारी मदद की। जब आप बाहर निकलते हैं तो ऐसे लोग ही आपका सहारा होते हैं, किसी की छोटी सी मदद आपके लिए बहुत मायने रख सकती है।

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छोटा बरूआ गाँव पहुंचते-पहुंचते गर्मी और पेट दर्द से हालत खराब हो चुकी थी। तेज़ धूप और रास्ते में कहीं वॉशरूम नहीं मिलने के कारण दिमाग खराब हो गया था, इतना कि बड़ा लोखरिहा गांव में एक बंद मिले सार्वजनिक शौचालय के दरवाज़े को मैं लोगों के मना करने पर भी पीटे जा रही थी।

सार्वजनिक शौचालय मिला तो सही लेकिन वो सालों से बंद पड़ा था। फोटो- प्रज्ञा भारती

दो छोटे कमरों के इस टॉयलेट के दरवाज़ों पर ताला लगा था। सामने एक और बहुत छोटा सा कमरा, कमरा भी नहीं चारदीवारी खड़ी थी। इसमें किवाड़ तक नहीं था। अंदर टॉयलेट सीट रेत से भरी हुई थी।

छोटा बरूआ गाँव में जिस घर के सामने हम रुके थे वह आधा कच्चा, आधा पक्का बना था। सामने दो दरवाज़े थे। बायें दरवाज़े से अन्दर जाकर हम पीछे की तरफ निकले। पीछे ये कमरा घर के आंगन में खुलता था। फिर पीछे एक कमरा और सबसे आखिरी में खुली जगह में वॉशरूम बना हुआ था। उसे देखकर मैंने राहत की सांस ली।

पांच साल दिल्ली जैसे महानगर में रहने के बाद इस प्रेम भरे सत्कार से साक्षात्कार मेरे लिए बिल्कुल नई बात थी।

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सफर के शुरूआती दौर में ही एक बात बिल्कुल साफ हो गई थी। वो यह कि जो भी सुझाव हमें मिलें उनको दरकिनार करते हुए इन लोगों के साथ बस इनका हो कर रह जाना था।

इन बच्चों ने पन्ना की हीरा खदानों के बीच रास्ता खोजने में हमारी मदद की थी। फोटो- प्रज्ञा भारती

यहां से हम मध्यप्रदेश राज्य के सतना जिले की ओर आगे बढ़े। सतना शहर पहुंचने के अगले दिन हम यहां से लगभग 20 किमी दूर मह्कोना गाँव में थे। खबरें करते हुए हम पसीने में तरबतर थे। गर्मी शुरू हो चुकी थीं। बुंदेलखण्ड क्षेत्र में इसका प्रकोप और अधिक महसूस हो रहा था। हमारी ये हालत देख गाँव में रहने वाले विष्णु बागरी हमें अपने घर ले गए। पानी पिलाया, नाश्ता कराया। खाना खाने का आग्रह भी किया। हमें देर हो जाती इसलिए मैं और जिज्ञासा अपनी-अपनी खबरें करने में जुट गए।

मह्कोना-


इस गाँव में हमारा आना जैसे कोई उम्मीद लेकर आया था। किसान संजय बागरी ने हमें बताया कि "यहां किसी तो पहुंचने ही नहीं दिया जाता। कोई सरकारी योजना, कोई लाभ हम तक नहीं पहुंचता। अगर अधिक पैसे की योजना है तो लोगों को आने दिया जाता है वरना सरपंच के यहां से ही लौटा दिया जाता है।"

मह्कोना गाँव में किसान विष्णु बागरी के घर का आंगन। फोटो- प्रज्ञा भारती

जब हमने जानना चाहा कि ये क्या माजरा है तो उन्होंने निराशा में सर झुकाते हुए कहा-

"ज़्यादा पैसे होंगे तो सरपंच और सेक्रेटरी लोगों से अपने लिए कुछ ले लेंगे और बाकी उन्हें दे देंगे। जैसे किसी योजना के तहत बीस हज़ार रुपए मिल रहे हैं तो दो से तीन हज़ार और कभी-कभी तो पांच हज़ार रुपए तक हमें देने पड़ जाते हैं।"

मह्कोना गाँव के लोगों ने मुझे पूरा गाँव दिखाया। अपनी परेशानियां बताईं, जितना हो सकता था हमारी मदद की।

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चुनुवादी बागरी से बात करते हुए मैं अपना मोबाइल फोन उन्हीं के घर भूल गई थी। जब याद आया तो घबरा गई। वहीं पास में खेल रहे बच्चे ने अपनी तोतली आवाज़ में कहा, "दीदी परेशान मत हो, मैं अभी ला देता हूं।" ऐसे ही कैमरे के लैंस का कवर भी मैंने कहीं गिरा दिया था। इससे पहले कि मैं परेशान हो कर ढूंढने निकलती वही छोटा बच्चा अपने हाथ में कवर मेरी ओर बढ़ाए खड़ा था।

मदद करने के लिए बच्चे को बिस्किट खिलाना तो बनता ही है। फोटो- प्रज्ञा भारती

वापस लौटते हुए रामकृपाल बागरी ने अपने घर पर खाना खिलाया। हमारे बैग उन्हीं के घर के सामने रखे हुए थे।

यात्रा के चौथे दिन हम लोग पन्ना शहर में थे। इससे पहले वाली रात यहां पहुंचते-पहुंचते जिज्ञासा के फोन की स्टोरेज जवाब दे गई थी। पन्ना में उस दिन शादियां बहुत थीं तो हमें किसी होटल में कमरा नहीं मिला। एक जान पहचान के अंकल की मदद से प्राणनाथ धर्मशाला पहुंचे। जब अगले दिन गाँव की ओर बढ़ने लगे तो ख्याल आया कि स्टोरेज तो खाली करना ही पड़ेगा वरना आगे कुछ शूट ही नहीं कर पाएंगे।

पन्ना-


अब सुबह 9 बजे पन्ना शहर में न तो कोई कम्प्यूटर की दुकान खुली थी न ही हमारे पास लैपटॉप था कि हम ये जल्दी कर अपने काम पर निकल पाते। लोगों से पूछने पर पता चला कि यहां सारी दुकानें 10 या 10:30 बजे तक खुलती हैं। अब क्या करते? दुकान खोजते हुए आगे बढ़े तो गांधी चौराहे पर एक फोटोकॉपी की दुकान मिली। हमने चैन की सांस ली पर यहां के कम्प्यूटर में फोन या कैमरे का कॉर्ड कनेक्ट ही नहीं हुआ।

बाबा बकरी चराते हुए जा रहे थे। हमने नाम पूछा तो हंस दिए। फोटो- प्रज्ञा भारती

देर हो रही थी पर बिना डेटा कॉपी किए जाने का कोई मतलब नहीं था। वहां से आगे बढ़े तो एक और कम्प्यूटर की दुकान देखी। दुकान तो बंद थी लेकिन उस पर मालिक का नम्बर लिखा था। फोन घुमाया और किस्मत कि फोन लग गया। भइया को अपनी स्थिति बताई तो उन्होंने कहा दुकान तो अभी नहीं खोलेंगे अभी लेकिन आपकी मदद कर देंगे। वो दुकान तक आए, हमें अपने घर ले गए। जहां पर मिले कम्प्यूटर्स की मदद से हम अपनी सबसे बड़ी लग रही परेशानी से निजाद पा सके।

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यहां से हम मांझा गाँव की ओर आगे बढ़े तो रास्ते में दो बच्चे मिले। बड़ी सी साइकल पर एक लड़का अपने छोटे भाई को बैठाए पन्ना की ओर जा रहा था। हमने उससे रास्ता पूछा तो थोड़ा सकपका गया। हमारे अनुरोध करने पर रुक गया। हमारी तस्वीर खींचने के लिए कहा तो बोला, "हमें न आउत फोटो वोटो लेन" पर समझाने पर हमारी फोटो खींची भी और साथ फोटो खिंचवाई भी।

पन्ना से मांझा जाने के रास्ते में मिले बच्चे।

इस यात्रा के दौरान मिले लोगों ने हमें इन्सानियत की नई परिभाषा सिखाई। शहरों में एसी कमरों में बैठ, खबरों और सोशल मीडिया की दुनिया को सच माना जाए तो कोई भी विश्वास करने लायक नहीं है। असल में अकेले घूमना इतना भी मुश्किल नहीं है। (लड़की होने पर भी क्योंकि सबसे पहले जो सुनने को मिलता है वो यही कि, "लड़की हो अकेले कैसे जाओगी? दुनिया ठीक नहीं है।")

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