ये भी भारत की निवासी है: 21 साल की लड़की ने सिर्फ़ टीवी में सेनेटरी पैड देखा था

दो रिपोर्टर, एक दुपहिया, एक यात्रा।थोड़ी यायावर, थोड़ी पत्रकार बनकर गाँव कनेक्शन की जिज्ञासा मिश्रा और प्रज्ञा भारती ने बुंदेलखंड में पांच सौ किलोमीटर की यात्रा की। सफ़र के दौरान इनकी मुलाकात और बातें उन तमाम महिलाओं से हुई जो हर महीने, माहवारी के वक़्त अपने स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ करती हैं।

Jigyasa Mishra

Jigyasa Mishra   28 May 2019 5:03 AM GMT

विश्व माहवारी दिवस पर विशेष: आज जबकि दुनियाभर में पीरियड्स के दौरान स्वच्छता की बातें हो रही है, महिलाओं के लिए बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, उस दौर में भी लाखों महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंंने आज तक कभी सैनेटरी पैड का इस्तेमाल नहीं किया, सिर्फ टीवी पर विज्ञापन में देखा है। (menstruation hygiene )

चित्रकूट, पन्ना। चित्रकूट जिले के खोही गांव पहुंच रही थी मैं, कुछ ही दूर पेट्रोल पंप दिखा तो गाड़ी घुमा दी उधर। पेट्रोल लेने के बाद वापस निकली तो देखा स्कूल के कपड़ों में एक लड़की, बैग टाँगे हुए चली आ रही थी। गाड़ी रोकी और उस से नाम पूछा। कविता नाम था उसका। कविता से मैंने पूछा, "स्कूल जाती हो या नहीं?" तो तुरंत बोली, "हौ दीदी, सातवीं कक्षा में पढ़ती हूँ। आठ लड़कियां है क्लास में।" मैंने आगे फिर पूछा, "सब आती हैं?" तो कविता बोली, "अरे नहीं दुइ ठा नहीं आतीं, उनके एमसी होने लगी है तो..."


"हौ दीदी, सातवीं कक्षा में पढ़ती हूँ। आठ लड़कियां है क्लास में।" मैंने आगे फिर पूछा, "सब आती हैं?" तो कविता बोली, "अरे नहीं दुइ ठा नहीं आतीं, उनके एमसी होने लगी है तो..."

कविता का कहना था कि उसकी दो सहेलियों ने स्कूल आना बंद कर दिया है क्यों कि उन्हें माहवारी होने लगी है।

रटगर्स के डाटा के हिसाब से ग्रामीण भारत की 23% लड़कियों ने माहवारी को अपना स्कूल छोड़ने का वजह बताया। इन आंकड़ों पर यहाँ आकर विश्वास हो गया था।


दो दीवाने के इस सफ़र के दौरान मैं हर रोज़ शहर बदल रही थी और दिन भर में कई गांवों में यायावरी करते हुए तमान महिलाओं से मुलाकात हुई। हर लड़की और महिला की अपनी अलग ही कहानी थी।

यहाँ पढ़ें भाग 2 "हम घर-घर जाकर, घंटे भर टॉयलेट ढूंढते रहे…"

सतना जिले के एक गाँव उचेहरा में सुमन से मुलाकात हुई थी। सुमन ने अपनी उम्र इक्कीस बताई थी। अपनी छोटी बहन को कपड़े पहना रही थी वो जब मैं पहुंची थी। सुमन की बहन 17 या 18 साल की है लेकिन मानसिक रूप से अस्वस्थ होने की वजह से वो 10 साल के बच्चों की तरह ही व्यवहार करती है। या शायद उससे भी छोटे बच्चों की तरह। "उसको जब हो गया था तब हमको समझ में आया था। इसका दिमाग तो है नहीं, हम ही सब करते हैं। कपड़े-वपड़े तो पहन लेती है लेकिन इतना समझ नहीं आता (माहवारी हो रही है) उसे लगता है बस पेट दर्द हो रहा है, बुखार आ गया है," सुमन ने बताया।


फ़िर जब मैंने सुमन से पूछा कि वो माहवारी के दौरान क्या इस्तेमाल करती है तो धीरे से बोली, "कपड़ा ही लेते हैं।" मैंने फ़िर पूछा, "पैड नहीँ मिलता?" जिसपर उसका जवाब आया, "कपड़ा इस्तेमाल करते हैं। कभी यूज भी नहीं किया वो तो, पता भी नहीं है।" कुछ देर में उसे याद आया की पैड वही होता है जो उसने टीवी पर देखा था। "हाँ, हाँ, वो तो मालूम है, टीवी में दिखाया जाता है। लोग यूज करते हैं, करने वाले," सुमन ने कहा।

"हाँ, हाँ, वो तो मालूम है, टीवी में दिखाया जाता है। लोग यूज करते हैं, करने वाले," सुमन ने कहा।

नॅशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार भारत के आठ राज्यों में 50% महिलाएं भी माहवारी के दौरान साफ़ सफाई नहीं रखती।

सफ़र में बाकी सामानों के साथ ही मैंने कुछ एक्स्ट्रा पैकेट्स रखे थे सेनेटरी नैपकिन के। एक सुमन को निकाल कर दिया तो उसने बड़ी मासूमियत से पूछा, "दीदी, इसे इस्तेमाल कैसे करते हैं?"

लेकिन ऐसे कितनी लड़कियों को मैं वो पैकेट दे सकती थी? और कब तक!

नीतू (Photo by Jigyasa Mishra)

यूनिसेफ के एक अध्ययन के मुताबिक दक्षिण एशिया की 3 में से 1 लड़की को माहवारी के बारे में तब तक कोई जानकारी नहीं होती जब तक उन्हें खुद माहवारी नही होती।

पन्ना के कैमासन गाँव की नीतू की कहानी ढकोसलेबाजी का जीता जागता नमूना है। नीतू की शादी हुए लगभग दो साल हो चुके हैं। "खाना नहीं छू सकते, ना पानी, न ही कपड़े। अलग सोते हैं। ...न अपना बिस्तर... अलग-अलग लगाना पड़ता है। और अगर पति को छू दिया माहवारी के दौरान तो मारती भी है सास," उसने दबी सी आवाज़ में कहा फ़िर नीचे देखने लग गयी।

वाटर एड की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की 10% लड़कियों को लगता है कि माहवारी एक बीमारी है।

मुझे याद है मेरे स्कूल में सुमन राय मैडम हमें बायोलॉजी पढ़ाती थीं। वो किताब में हो न हो, लड़कियों को खुद माहवारी के बारे में बताती थीं। क्या शारीरिक बदलाव से गुज़रते उम्र में लड़कियों के साथ ऐसे शिक्षक या अभिभावक हर जगह नहीं हो सकते?

सुशीला (Photo by Jigyasa Mishra)

पन्ना के ही दूसरे गाँव की सुशीला ने बताया, "सूती कपड़े, जो फट जाते हैं वह इस्तेमाल करते हैं। जैसे, दो चार महीने लगा लिए वही कपड़ा फिर उसको जला दिया और फ़िर दूसरा कपड़ा के लेते हैं।" कपड़ा इस्तेमाल करना आम बात है गांवों में। लेकिन वही कपड़ा हर महीने इस्तेमाल करना? यहाँ हम लोग टेम्पोंस, पैड और मेंस्ट्रुअल कप में से चुनते हैं। उनमे भी ब्रांड कॉन्सियस होते हैं और दुसरे ओर ये महिलाएं हैं।

रटगर्स के अध्ययन से ये भी पता चलता है कि माहवारी के वक़्त 89% महिलाएं कपड़ा, 2% रूई, 2% राख और मात्र 7% पैड इस्तेमाल करती हैं।

यहाँ पढ़ें भाग 5 मामूली ज़रूरतों के लिए संघर्ष करते युवाओं ने कहा, "गाँव में रोज़गार मिल जाता तो बाहर न जाना पड़ता.."

आरती ने कहा था की वह मुश्किल से बच्चों का पेट भर पति है उसके बाद हर महीने चालीस रुपये का पैड का पैकेट कहाँ से लाएगी। "क्या करें दीदी, काम वाम करते नहीं है, पैसा भी तो चाहिए। पैसा भी रो जरूरत है, नहीं खरीद पाते। पैड बहुत महंगे आते हैं, 40 रुपए के। हर महीने थोड़े लगाएंगे 40 रुपए का।" आरती के घर भी वही नियम कब्ज़ा किये हुए थे जो गांव के बाकि औरतों के घर में थे। "जब हम लोग एमसी होते हैं ना, तो ना मतलब, खाना वाना भी नहीं बनाते हैं, पती को भी नहीं छूते हैं, न संग में लेटते हैं। अपने लिए खाना बना लेते हैं और घर के लिए नहीं। अपने लाने तो हम बना लेते हैं लेकिन और किसीको नहीं बना के खबा सकते," आरती ने आगे कहा।

भाग- 7

दो दीवाने के इस सफ़र के दौरान हमारी मुलाकात और बातें उन तमाम महिलाओं से हुई जो हर महीने, माहवारी के वक़्त अपने स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ करती हैं।

यहाँ पढ़ें भाग 6 "लड़की हो अकेले कैसे जाओगी? दुनिया ठीक नहीं है," सच में?


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