लोग, किस्से और मुद्दे जो हमेशा याद रहेंगे

दो रिपोर्टर, एक दुपहिया, एक यात्रा।थोड़ी यायावर, थोड़ी पत्रकार बनकर गाँव कनेक्शन की जिज्ञासा मिश्रा और प्रज्ञा भारती ने बुंदेलखंड में पांच सौ किलोमीटर की यात्रा की।

भाग- 10


दो राज्य, चार जिले, 20 गांव और 500 किलोमीटर का सफ़र। गांव-गांव भटकते, थोड़ी पत्रकारिता और थोड़ी यायावरी करते 6 दिन कैसे गुज़र गए, कुछ पता ही नहीं चला। सफ़र के हर दिन हमें अलग-अलग उम्र की महिलाओं से मिलने का मौका मिला। उनकी कहानियां, उनके मुद्दों को समझने का मौका मिला।

सतना में एक सुबह जब नाश्ता करने निकले तो फ़िर वही पोहे जलेबी नज़र आए। अब मुझे लगने लगा था कि पूरे मध्यप्रदेश में और कुछ नहीं क्या लोग? खैर, आसपास के लोगों से पुछा कि और कुछ मिलेगा या नहीं तो उन्होंने बस स्टैंड के पास एक ठेले पर जाने को बोला। सुनने में आया कि उनके यहाँ काफ़ी अच्छा पोहा-जलेबी और समोसा मिलता हैं।


पहुंचे तो देखा एक छोटे से ठेले पर 'गुप्ता टी स्टॉल' लिखा है जिसके बहार 5-6 लोग चाय सुड़क रहे थे और साथ ही पोहा भी खा रहे थे। फ़िर ठेले के पीछे बने छोटे से कमरे पर नज़र पड़ी जहाँ एक महिला समोसे बना रही थी और पोहा बनाने की तैयारी में थी। शकुंतला नाम बताया उन्होंने अपना।

ये भी भारत की निवासी है: 21 साल की लड़की ने सिर्फ़ टीवी में सेनेटरी पैड देखा था

शकुंतला ने बताया, "वैसे तो ये दुकान हम तीस साल से चला रहे हैं लेकिन इस जगह पर 15 साल से हैं। सुबह-सुबह 6 बजे खोल देते हैं और तभी 20-25 बच्चे आते हैं चाय-नाश्ता करने उसके बाद दिन-भर में करीब 200 लोग आ जाते हैं हमारे यहाँ।"

वो अपने पति और बेटे के साथ ये दुकान पन्ना के और जाने वाले चौराहे पर चलाती हैं। "ये लोग ग्राहकों को देखते हैं और पैसे का हिसाब करते हैं। मुझे पता होता है कि कितना, क्या बनाना है। हमें तो बड़ा मज़ा आता है ये काम करने में साथ मिलकर। दिन में करीब 700 रुपये का फ़ायदा हो जाता है।"


थोड़े से ही फायदे से इतनी खुश थीं शकुंतला। शायद परिवार के साथ रहकर काम करने की संतुष्टी होगी। वरना आज-कल कौन परिवार के साथ समय बिता पाता है शहरों में?

सतना से पन्ना जा रहे थे तो रास्ते में कई छोटे-छोटे गांवों में रुके थे। रुकते रुकाते अनुमान लगाया था कि शाम के पांच, साढ़े पांच तक पन्ना पहुंच जायेंगे। लेकिन रात के आठ बजने वाले थे और हम अभी भी 40 किलोमीटर दूर थे पन्ना थे। पहली बार ऐसी सुनसान सड़क पर स्कूटर चलायी थी मैंने। थोड़ा डर भी लग रहा था जब कुछ 20 किलोमीटर पहले 'बाघ वितरण क्षेत्र' का बोर्ड दिख गया था।

"हम घर-घर जाकर, घंटे भर टॉयलेट ढूंढते रहे…"

रात के नौ बजे हम पन्ना पहुंचे और गाँधी चौक पर लस्सी पिया। काउंटर पर लगी भीड़ से काफ़ी मशहूर मालूम होती थी वो दुकान; 'कड़ा लस्सी भण्डार'।

अगले दिन सुबह जनवार गांव पहुंचे हम। रहा होगा पन्ना शहर से कुछ 25-30 किलोमीटर। गांव में एक प्राथमिक स्कूल था जिसके पीछे, एक पार्क में ढेर सारे बच्चे स्केटिंग करते दिखे। बड़ा ही अनूठा दृश्य था ये। जिस गांव में हम थे, दूर-दूर तक सिर्फ़ कच्चे घर नज़र आ रहे थे। ऐसे में बच्चों और स्केट-बोर्ड से भरा एक स्केटिंग पार्क, वाकई में बड़ी बात थी।


स्केट -बोर्ड पर पैर रखते ही छू-मंतर हो जा रहे थे सब। सेकेंड में इधर से उधर। पार्क में बने ऊंचे कंक्रीट के टीलों से भी ऊपर-नीचे कर रहे थे वो बच्चे। बात करने पर पता चला कोई विदेशी महिला है जिसने आकर उनको स्केट बोर्ड्स दिए और स्केटिंग सिखाई भी। "मैंने तो सोच लिया है मुझे आगे जाके स्केट-बोर्ड देश के लिए खेलना है। हमको दीदी विशाखापटनम भी ले गए थी कॉम्पिटेशन में भाग लेने। वहां समुद्र भी देखा था हमने और होटल में रुके थे," 12 साल की प्रिया ने बताया।


पन्ना को 'हीरे का शहर' भी कहा जाता है। ऐसे में हीरे की खदान जाना तो बनता था। हम जिस वक़्त वहां पहुंचे थे, खदान में एंट्री बंद हो चुकी थी तो अगले दिन शहर के बाहर, पत्ते पर ज़मीन लेकर हीरे की खुदाई करवाने वाले लोगों से मिलने चल दिए।

बुंदेलखंड की सड़कों के किनारे पेड़ काम और चट्टानें ज़्यादा देखने को मिलती हैं। यहाँ, पन्ना में भी वही हाल था। सुबह के दस बजे होंगे जब शहर से थोड़ा ही बाहर निकले थे, खुदाई करने वालों से मिलने। मृगतृष्णा सड़क पर लगातार पानी होने का आभास करा रही थी कि दूर, मैदान में खुदाई करती एक औरत नज़र आई और उसके पीछे एक ताल भी नज़र आया। मृगतृष्णा वाले से काफ़ी बड़ा था।

वहां पहुंचे तो पथरीले मैदान से होकर उस महिला तक पहुंचे। उसके पास ही तीन और लोग थे जो अपनी अलग ज़मीन पर हीरे खुदाई कर रहे थे। उनमें से एक खोदे हुए पत्थरों को धो रहा था और तीसरा छान कर सूखा रहा था। सब अपनी किस्मत आजमा रहे थे।


उस महिला के पास गई मैं और नाम पुछा। "रामकली," कहकर, जो पत्थर उसने खोद कर निकाले थे उन्हें धुलने लग गई। साफ़ लग रहा था कि हमसे बात नहीं करना चाहती थी। पर हमने भी हर नहीं मानी।

मैंने उनसे पूछा कि अकेले ही कर लेती हैं काम तो बस सर हिला दिया रामकली ने। पता नहीं क्या सूझा मुझे जो अपने बैग से निकाल कर एक चॉकलेट थमाई उनको और कहा, "अरे आप परेशान न होइए बस जानना चाहते हैं कि आप कैसे कर लेती हैं अकेले ही उधर वो तीन लोग मिल के कर रहे हैं।" इसके बाद जो मुस्कान आयी उनके चेहरे पर वो हमारे साथ ही वापस आई।

खुद ही बात करने लग गईं फ़िर वो हमसे। रामकली ने बताया वो अकेली रहती हैं। देख कर लग रहा था कुछ 60-65 वर्ष की रही होंगी। "उमर? अब वो तो बिटिया याद नहीं हमको..." कह कर फ़िर ठहाका लगा कर हैंड पड़ीं वो।


"हम लोग पट्टे पर लेते हैं ज़मीन। 200 रुपये में साल भर के लिए। फिर खोदते हैं। और लोग तो मजूर रख के खुदाई करवाते हैं लेकिन हम खुदई करते हैं। सुख से रोटी खा रहे हैं, सुख से बैठे हैं। अपने मन मौजी हैं। अपन अगर दूसरे के साथ रहेंगे तो उसके हिसाब से चलेंगे, कहाँ रहीं, कहाँ बैठीं। आपै हँसते-हँसते मिल गए वरना तो हम बीएस काम पर आये और बस चले गए, रामकली ने कहा और अपने दुसरे काम पर चल दी। सुबह 7 से 10:30 हीरे की खुदाई के बाद वो मजदूरी भी करती हैं। उन्होंने अब तक शादी नहीं की है और अकेले ही अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं।


इनसे बात कर के निकल ही रहे थे कि एक औरत दिखाई पड़ी... अपने एक हाथ में झोला सा लिए, दुसरे से अपनी बकरी को हाँक रही थी। मैंने पुछा कहाँ जा रही हैं आप तो बोली, "हियाँ बीड़ी कॉलोनी में घर हओ हमार। उन्हे जा गए।" शबनम बीड़ी बनाने का काम कर के अपने घर वालों का पेट भरती हैं। "ये बीड़ी कॉलोनी में सबए तेंदू पत्ता से बीड़ी बनाते हैं। यहीं कोई 100-200 एक दिन में बना लेत हैं," उन्होंने आगे बताया।


6 दिनों में इन सब लोगों से मिलकर, सबके किस्से संजोकर, वापस हो लिए थे हम, पर सफ़र ख़तम नहीं हुआ...

Share it
Top