भ्रामक विज्ञापनों की बाढ़; कैसे बचेंगे आप?

उपभोक्ताओं द्वारा एएससीआई (ASCI) को की गयी 1034 विज्ञापनों की शिकायतों में 35% विज्ञापन ऐसे हैं जो टेलीविज़न पर आने वाले हैं, उसके आसपास ही 34% विज्ञापन प्रिंट (अखबार, मैगज़ीन आदि) पर आने वाले हैं और 15% विज्ञापन डिजिटल प्लेटफार्म/ इंटरनेट पर आने वाले हैं।

लखनऊ। आराधना की तबियत कुछ दिनों से खराब होने के कारण जब वह डॉक्टर के पास गयी तो पता चला कि उनका शुगर लेवल बढ़ा हुआ है। थोड़ा सोचने पर याद आया कि पिछले दिनों लगातार उन्होंने 'नो एडेड शुगर' वाले डायजेस्टिव बिस्किट खाये हैं। आराधना डाइबेटिक है और अब डॉक्टर ने किसी भी तरह के बिस्किट खाने के लिए उन्हें सख्त मना किया है।


आराधना ने बिस्किट पे लगे 'नो एडेड शुगर' के खिलाफ एएससीआई (एडवर्टाइज़िंग स्टैंडर्ड्स कौंसिल ऑफ़ इंडिया) में शिकायत भी दर्ज़ कर दी है। "कई बार हम सिर्फ़ उत्पादों पर लगे लेबल या उनके किये गए दावों पर विश्वास कर उनका इस्तेमाल करते हैं और परिणाम, उत्पाद या उसके विज्ञापन द्वारा किये गए दावे से काफ़ी अलग होता है," उत्तर प्रदेश फ़ूड एन्ड ड्रग्स विभाग के ड्रग्स कंट्रोलिंग और लाइसेंसिंग अथॉरिटी, ए के जैन बताते हैं।

वर्ष 2017-18 में एएससीआई ने कुल 2179 शिकायतों पर कार्रवाई की जिसमें सर्वाधिक शिकायतें स्वास्थ्य सम्बन्धी सेवाओं और उत्पादों की रही। स्वास्थ्य सेवा व सम्बंधित उत्पाद के ख़िलाफ़ 874 शिकायतें, शिक्षा सम्बंधित 729 शिकायतें, खाद्य और पेय उत्पाद सम्बंधित 298 शिकायतें और व्यक्तिगत देखभाल के उत्पादों के ख़िलाफ़ 278 शिकायतों पर काम किया गया। एएससीआई की जनरल सेकरेटरी श्वेता पुरंदरे बताती हैं, "जब से हमने मिनिस्ट्री ऑफ़ आयुष के साथ एमओयू साइन किया है, हमें काफी रिस्पांस मिलने लगे हैं। अब ऑनलाइन शिकायतें भी आ रहीं हैं और राज्य स्तर पर भी काम हो रहे हैं।"


किसी भी मैगज़ीन, अखबार में आप प्रकाशित वर्गीकृत विज्ञापनों को देखेंगे तो कोई ना कोई ऐसा विज्ञापन जरूर मिलेगा जो DMR को ढेंगा दिखाता है। इसके अलावा मोबाइल पर शॉर्ट कोड्स के जरिए भी भ्रामक विज्ञापन आए दिन देखे जा सकते हैं।

उपभोक्ताओं द्वारा एएससीआई (ASCI) को की गयी 1034 विज्ञापनों की शिकायतों में 35% विज्ञापन ऐसे हैं जो टेलीविज़न पर आने वाले हैं, उसके आसपास ही 34% विज्ञापन प्रिंट (अखबार, मैगज़ीन आदि) पर आने वाले हैं और 15% विज्ञापन डिजिटल प्लेटफार्म/ इंटरनेट पर आने वाले हैं।


12 फरवरी 2017 को एक अंग्रेजी अखबार में छपे 'डॉ। बत्राज़ पॉजिटिव हेल्थ क्लीनिक- डॉ। बत्राज़ होम्योपेथिक क्लीनिक' के विज्ञापन के खिलाफ़ एएससीआई को शिकायत की गई थी जिसमे क्लिनिक के "विश्व के सबसे बड़े होम्योपेथिक क्लीनिक की चेन" होने का दावा किया गया था। एएससीआई के जांच पड़ताल के बाद शिकायत कर्ता के पक्ष में फैसला हुआ क्यों कि एएससीआई कोड के चैप्टर I.1 और I.4 के मुताबिक विज्ञापन द्वारा किया गया दावा गलत और भ्रामक था।

आर्थराइटिस, मोटापा कम करने या वजन बढ़ाने वाले उत्पादों से लेकर यौवन शक्ति को बढ़ाने वाले उत्पादों में भी सेलिब्रिटीज नज़र आते हैं। दर्शकों को प्रलोभित किया जाता है, कॉल करके तुरंत बुकिंग करने के लिए प्रेरित किया जाता है जबकि इस तरह के रोगों या समस्याओं के उत्पादों को विज्ञापित किया जाना भी जुर्म है। यंत्रों, अंगूठियों, लाल किताब, ज्योतिष और कई अन्य तरीकों से भी भ्रामक प्रचार किए जाते हैं जिनपर अभी तक कोई लगाम नहीं कसी जा सकी है। "कभी-कभी बच्चों के साथ टीवी देखना असहज हो जाता है कुछ ऐसे उत्पादों के प्रचार टीवी पर आते हैं जिनका वास्तविकता से कोई नाता ही नहीं होता। मेरा सात साल का बेटा हाइट (लम्बाई) बढ़ने वाले ड्रिंक का प्रचार देखकर उसे मांगने की ज़िद करता है," बनारस की रहने वाली अनुजा सिन्हा फ़ोन पर बताती हैं।

'वीएलसीसी पर्सनल केयर लिमिटेड' के एक अंग्रेजी अखबार में छपे विज्ञापन में कंपनी ने 'केवल 90 मिनट में व्यक्ति को स्लिम (पतला/दुबला)' करने का दावा किया था जिसको साबित करने के लिए उन्हें सात दिन का वक़्त दिया गया था। दिए गए वक़्त में कंपनी अपने दावे साबित नहीं कर पायी और शिकायत को सही मानते हुए विज्ञापन को निरस्त कर दिया। यह विज्ञापन भी एएससीआई कोड के चैप्टर I.1 और I.4 के मुताबिक विज्ञापन द्वारा किया गया दावा गलत और भ्रामक था।

जाने-माने ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स पर यदि आप अभी भी चेक करें तो 'अर्थराइटिस के उपचार के लिए ग्लव्स (हाथों के दास्ताने)', 'वज़न घटाने के लिए मैग्नेटिक ईयर-रिंग्स और टो-रिंग (कान व पैर में पहन ने वाले छल्ले)' चंद दिनों में बालों की लम्बाई बढाने जैसे ढेरों उत्पाद खुले-आम बिक रहे हैं।


जैन आगे बताते हैं, "भारत के ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स नियम, 1945 की सेक्शन-जे में रोगों और बीमारियों की एक सूची है जिन्हें कोई भी दवा, रोकने या इलाज करने का दावा नहीं कर सकती है। ड्रग्स एंड प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के नियम 106 के तहत, कोई दवा किसी भी बीमारी का इलाज या रोकथाम या सूचीबद्ध शर्तों में सुधार करने का दावा नहीं कर सकती है। त्वचा को गोरा करना, नए बाल उगाना, स्तन के आकर में परिवर्तन, यौन आनंद के लिए इंसान की क्षमता में सुधार, मोटापा/ वज़न (ओबेसिटी), अंधापन, बहरापन, मधुमेह जैसे अन्य 51 शारीरिक तकलीफों के सुधार का दावा करने वाली दवाओ का बेचा जाना गलत है।"

अहमदाबाद से हर्बल एक्सपर्ट और वैज्ञानिक डॉ दीपक आचार्य बताते हैं "टेलीविज़न पर आने वाले 'शक्तिवर्धन वैक्यूम थैरेपी' के विज्ञापन खिलाफ एस्की से शिकयत दर्ज़ की थी जिसमें पुरुष के लिंग के आकर को बढ़ाने का दवा किया गया था। MOIAB/2016/00740 वाले वाले इस शिकायत को एएससीआई ने सूचना अवं प्रसारण मंत्रालय तक पंहुचा दिए जाने का नोटिफिकेशन तो आया था लेकिन कोई फाइनल रिस्पांस नहीं आया की वह विज्ञापन और उत्पाद बंद हुआ कि नहीं।"

कुछ महीने पहले खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफ.डी.ए) ने ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1955 की धाराओं के तहत महाराष्ट्र के पुलिस को शिकायत दर्ज की थी। इन शिकायतों में बॉलीवुड के प्रमुख कलाकारों द्वारा किये जा रहे अनेक आयुर्वेदिक प्रोडक्ट्स के विज्ञापन भी शामिल थे जिसमें गठिया से लेकर मोटापा और डायबिटीज के विज्ञापन शामिल थे। एफडीए ने दवा निर्माताओं, पटकथा लेखक और अभिनेताद्वारा ऐसे झूठे उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए ऐसे टी वी चैनल्स के खिलाफ कार्रवाई की मांग की शिकायत दर्ज कराई थी।


यदि टेलीविज़न/ अखबार/ मैगज़ीन अदि पर कोई आपत्तिजनक विज्ञापन दिखे तो इन तरीकों से एएससीआई को कर सकते हैं शिकायत-

1. इस नंबर पर अपनी शिकायत व्हाट्सऐप कर सकते हैं - 7710012345

2. एएससीआई वेबसाइट- https://ascionline.org/index.php/lodge-ur-complaints.html

3. ईमेल भेज कर- contact@ascionline.org

5. टोल फ्री नंबर पर कॉल कर के- 1800-22-2724

6. पोस्ट के ज़रीए-

महा सचिव, 717 / बी,औरस चैंबर,

एस एस अमृतवार मार्ग,

वरली, मुंबई 400018।

लैंडमार्क: महिंद्रा टावर्स के पीछे

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गाँव कनेक्शन की तरफ से सलाह/ सुझाव:

1. किसी प्रोडक्ट के रजिस्ट्रेशन से पहले अथॉरिटीज प्रोडक्ट्स की गुणवत्ता प्रमाणित करने वाली क्लीनिकल रिसर्च रिपोर्ट की डिमांड करे।

2. टीवी ब्रॉडकास्टर, रेडियो और तमान कम्युनिकेशन एजेंसीज एक कमिटी की निगरानी में विज्ञापनों को चुने ताकि उनके दर्शक/ श्रोता ठगे ना जाएं और भ्रामक प्रचार पर रोग लग सके।

3. प्रोडक्ट्स के लेबल और उन पर दी जाने वाली जानकारियों को लेकर संबंधित विभाग जागरूकता अभियान चलाए।

4. उपभोक्ता संरक्षण कानून और ड्रग मैजिक रेमेडी को कठोरता से लागू किया जाए।

5. भ्रामक प्रचार और प्रसार कर उत्पादों को बेचने वाली कम्पनी/ संस्थान/ व्यक्ति को ब्लैक लिस्ट किया जाए ना कि सिर्फ एक उत्पाद पर बैन लगे।


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