मामूली ज़रूरतों के लिए संघर्ष करते युवाओं ने कहा, "गाँव में रोज़गार मिल जाता तो बाहर न जाना पड़ता.."

दो रिपोर्टर, एक दुपहिया, एक यात्रा।थोड़ी यायावर, थोड़ी पत्रकार बनकर गाँव कनेक्शन की जिज्ञासा मिश्रा और प्रज्ञा भारती ने बुंदेलखंड में पांच सौ किलोमीटर की यात्रा की। सफ़र के दौरान इनकी मुलाकात हुई बुंदेलखंड के कुछ युवाओं से जो पहले बार मतदान करेंगे और जाना कि उनकी क्या अपेक्षाएं हैं...

भाग-5

"अपने पहले मतदान के लिए उत्सुक 18-19 साल की युवतियों ने जब अपनी समस्याएं और ख्वाहिशें खुल कर बताईं, मन बस यहीं अटका था कि इनका नाम तो मतदाता सूची में जुड़ गया है लेकिन छोटे गांवों की इन बच्चियों की आवाज़ क्या शहर तक पहुंच पायेगी?"

पन्ना, सतना। बुंदेलखंड के चार जिले और करीब 20 गाँवों में भटकते, ग्रामीणों के घर खाना खाते और दिल खोल कर हँसते, उनकी समस्याएं सुनते हुए पता नहीं छह दिन कब बीत गए। रास्ते में मैंने कई युवाओं से बात की, खासतौर पर उनसे जो पहली बार मतदान करेंगे। हर गाँव के युवा से बात कर यही एहसास हुआ कि जिसके लिए वह संघर्ष कर रहे हैं कितनी मामूली ज़रूरतें हैं।


लगातार नासाज़ बने रहने वाली तबियत की वजह से रोशनी गौड़ की पढ़ाई बीच में ही छूट गयी थी और उसके तुरंत बाद उसकी शादी करा दी गयी। वो इस बार पहली दफ़ा वोट देने वाली हैं और उनकी आस तो बस इतनी सी है कि कोई उनके गांव में शौचालय बनवा दे। "घर के बाहर खेत में जाना पड़ता है हम लोगों को लैट्रीन। खेत से लगे हुए जंगल है तो जानवर भी आते हैं और लगातार खतरा बना रहता है। हम बस यही चाहते हैं की सभी के घर में लैट्रीन बन जाये ताकी किसी को बाहर जंगल में न जाना पड़े," रौशनी ने कहा। "हमारा घर टाइगर रिज़र्व के पास है, डर बना रहता है जानवरों का।"

रोशनी गौड़ (Photo by Jigyasa Mishra)

इकोनोमिक टाइम्स के अनुसार 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक लगभग 2 करोड़ युवा हर साल 18 साल के हो जाते हैं। जिसका मतलब है कि 2019 के चुनाव में 10 करोड़ ऐसे युवा हो सकते हैं जो पहली बार मतदान करेंगे।

किशोरावस्था से लेकर मध्यम आयु तक की जनसंख्या को मुख्य रूप से युवा कहा जाता है। भारत में राष्ट्रीय युवा नीति (2003) ने 13 से 35 वर्ष की आयु के लोगों को युवा के रूप में परिभाषित किया।

महकोना गाँव की प्रियंका वागरी ने बारहवीं तक पढ़ाई की है। प्रियंका को गाँव से कॉलेज के लिए सतना जाने में दिक्कत होती थी जिस वजह से उसने पढ़ाई छोड़ दी। "यहाँ तो पानी, शौचालय, सड़क सबकी दिक्कत है।यहाँ बस आठवीं तक का स्कूल है, नौबस्ता जाना पढ़ता है आठवीं के बाद। सड़क ख़राब है तो पानी के मौसम में भर जाता है।" जब प्रियंका से मैंने पुछा दिन कितने बार दिन में हज़ार बार जाना पड़ जाता है पानी भरने। गाँव से एक किलोमीटर दूर जाना होता है। हमारे यहाँ पानी की व्यवस्था हो जाए, सड़क बन जाए," प्रियंका ने कहा।

फैक्ट चेकर डॉट इन के अनुसार वर्ष 2000 से, उच्च शिक्षा पर भारत का खर्च सकल घरेलू उत्पाद का 0.73% -0.87% रहा है जो कि वर्ष 2015 में 0.62% तक सिमट गया। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (प्रधानमंत्री कौशल विकास कार्यक्रम) का परिणाम निर्धारित लक्ष्य से 64% कम पाया गया।

बड़ा लोखरिहा पहुंचे तो 18 वर्षीय सोनम द्विवेदी से बात हुई। सोनम ने बताया, "हमारे यहाँ एक तो नाली की व्यवस्था नहीं है, ना ही लैट्रीन हैं घर-घर और हैंडपंप भी नहीं है। बहुत दिक्कत होती है गर्मियों में। पानी, फिर हो गया इधर-उधर से लाते हैं, बोर-वोर से। एकै, दो (एक या दो) बोर तो हैं हमारे गाँव में बस।

जिन पांच भारतीय राज्यों में नए मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा है, वे लोकसभा में अधिकतम सीटों वाले राज्य भी हैं और जनसंख्या के मामले में उच्च स्थान पर हैं। राज्य की आबादी के अनुपात में लोकसभा सीटें राज्यों को दी जाती हैं और बड़ी आबादी वाले राज्यों को इसमें बहुमत प्राप्त करने के असार होते हैं।


रंजना कॉलेज में पढ़ती हैं और पहली बार मतदान करने वाली हैं। रंजना चाहती हैं उनके गाँव में हर वो सुविधा हो जो आम तौर पर हर जगह होती है। "पढ़ने लिखने की हर सुविधाएं हों हमारे गाँव में। लड़कियों के लिए हर सुविधा होनी चाहिए। अब हम लोगों का पेपर है वहां तीन बजे से छः बजे तक है तो जाने में बहुत दिक्कत होती है है, सतना, रामकृष्ण कॉलेज में। लौटने में तो और भी दिक्कत हो जाती है क्युकी लड़के रहते हैं केवल बस में। सुविधाएं इस तरह कि हो जायें कि जाने में कोई दिक्कत न हो," रंजना द्विवेदी ने कहा।


रंजना ने कैमरा पे हमसे बात करने के बाद बड़े आग्रह के साथ अपने खेत की दाल, रोटी, सब्ज़ी और चावल भी खिलाया। कहने लगी थी, "अरे बहुत घाम है दीदी, खाना खा के ही जाओगी आप लोग अब।" कितना बड़ा दिल होता है न गांव के लोगों का? वरना हमारे यहाँ तो आए दिन तपती धूप में फ़ूड डिलीवरी और ऑनलाइन शॉपिंग के डिलीवरी वाले लोग आते रहते हैं। कितनों को पानी पूछ लेते हैं हम?

भाग 3: "इस सफ़र में हमें पेपर-स्प्रे और चाकू नहीं, पानी की ढेर सारी बोतलों की जरुरत थी"

मोहन सिंह (Photo by Jigyasa Mishra)

18 वर्षीय मोहन सिंह अपने माता-पिता के इकलौते बेटे हैं। पन्ना जिले के मांझा गाँव में रहते हैं अपने परिवार के साथ। अभी तो मोहन ग्रेजुएशन कर रहे हैं पर जल्द ही नौकरी कर के घरवालों का खर्चे में हाथ बंटाना चाहते हैं। मोहन बताते हैं, "पहले यहाँ पत्थर खदान थी तो लोगों को काम मिल जाता था अब तो वो भी नहीं है। हम तो यही चाहते हैं कि हमारे गाँव में ही रोज़गार की व्यवस्था हो जाये ताकि किसी को बाहर ना जाना पड़े काम ढूंढने।" मोहन के पिता को कुछ सैलून के लिए हिमाचल में रहना पड़ा था, किसी प्लास्टिक के डब्बे बनाने वाली कंपनी में काम करने के लिए। "कोई छोटा मोटा कारखाना, कंपनी कुछ तो खुल जाये गाँव के आसपास।"

भाग 2:"हम घर-घर जाकर, घंटे भर टॉयलेट ढूंढते रहे…"


मांझा की ही रहने वालीं प्रियंका यादव से जब हमने बात की तो अलग ही किस्म पॉजिटिव एनर्जी मिली। 18 वर्षीय प्रियंका आर्मी में जाना चाहती हैं और अपने गाँव वालों के लिए कुछ अच्छा करना चाहती हैं। "मैं आगे जाकर आर्मी में जाना चाहती हूँ और कुछ ऐसा करना चाहती हूँ जिस से मेरे गांव में और भी लोगों को रोज़गार मिले। मैं चाहती हूँ मेरे गांव की तरक्की हो। आने-जाने की सुविधा नहीं है, लोकल गाड़ियां भी नहीं चलती। सात-आठ किलोमीटर दूर है स्कूल कॉलेज। जंगल है तो लड़कियों के लिए तो सेफ रस्ता नहीं है," प्रियंका ने कहा। "मैं आगे जाकर आर्मी में जाना चाहती हूँ और कुछ ऐसा करना चाहती हूँ जिस से मेरे गांव में और भी लोगों को रोज़गार मिले। मैं चाहती हूँ मेरे गांव की तरक्की हो। आने-जाने की सुविधा नहीं है, लोकल गाड़ियां भी नहीं चलती।"

एक ओर हम शहर वाले हैं जिनके घर में जितने सदस्य, उतनी गाड़ियां और कहीं-कहीं ज़्यादा भी।


छोटा लोखरिहा की रहने वाली चांदनी चाहती है कि उसके गाँव में पानी की बेहतर सुविधा हो। "हमारे गाँव में पानी नहीं है, हम यही चाहते हैं कि हमारे गाँव में पानी आये। पानी नहीं मिलता है तो हम बहुत दूर जाते हैं। कुआँ हैं, वहीँ से लाते हैं। दो किलोमीटर दूर है। डब्बे में, सर पर ले कर आते हैं," चांदनी ने गाँव कनेक्शन को बताया।

बात-चीत ख़तम कर मैंने पानी का बोतल निकलने के लिए स्कूटर कि दिग्गी खोली। बोतल खाली था।

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