'80 लाख किसान उठा रहे 20 रुपए के वेस्ट डीकंपोजर का फायदा', देखिए Video

वेस्ट डीकंपोजर को किसान फसल अवशेष को सड़ाने, जमीन व बीज के शोधन और जैविक तरल खाद के रूप में करते हैं। इसकी एक शीशी की कीमत 20 रुपए है, जिसे कई वर्षों तक हजारों लीटर तरल खाद (कल्चर) बनायी जा सकती है। देखिए वीडियो

लखनऊ। "वेस्ट डीकंपोजर के इस्तेमाल से डीएपी यूरिया की जरूरत 50 फीसदी कम हो जाती है, जबकि कीटनाशक की 80 फीसदी तक। वेस्ट डीकंपोजर की अब तक 20 लाख बोतलें बेची जा चुकी हैं और देश के 70-80 लाख किसान इसका फायदा उठा रहे हैं।"डॉ. कृष्णचंद्र, निदेशक, जैविक खेती केंद्र, गाजियाबाद बताते हैं।

वेस्ट डीकंपोजर एक प्रकार का कचरा अपघटक है, यानि कचरे को सड़ाने वाले। भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के आधीन नेशनल सेंटर ऑफ ऑर्गेनिक फॉर्मिग (NCOF) ने इसे गाय के गोबर से तैयार किया है। किसान इसका इस्तेमाल फसल अवशेष को सड़ाने, जमीन व बीज के शोधन और जैविक तरल खाद के रूप में करते हैं। इसकी एक शीशी की कीमत 20 रुपए है, जिसे कई वर्षों तक हजारों लीटर तरल खाद (कल्चर) बनायी जा सकती है।

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अक्टूबर 2018 में लखनऊ में आयोजित देश के पहले कृषि कुंभ में वेस्ट डीकंपोजर की उपयोगिता को लेकर गाँव कनेक्शन के डिप्टी न्यूज एडिटर अरविंद शुक्ला ने एनसीओएफ के निदेशक कृष्णचंद्र से विस्तार से बात की। उनके मुताबिक वेस्ट डीकंपोजर एक जैविक रसायन है, जिसमें गाय के गोबर में पाए जाने वाले जीवाणु हैं जो किसान के लिए बहुत उपयोगी हैं। इससे जमीन में केंचुए बनते हैं, पराली समेत दूसरे फसल अवशेषों से खाद बनाई जा सकती है। इसके उपयोग से मिट्टी में कार्बन और सूक्ष्म तत्वों की मात्रा बढ़ती है। खेती की लागत घटती है और उत्पादन बढ़ता है।

सवाल: वेस्ट डीकंपोजर से पराली की खाद बन सकती है? और कितने दिनों में?

जवाब: वेस्ट डीकंपोजर के जरिए आसानी से बिना ज्यादा खर्च के 5 से लेकर 40 दिनों में खाद बनाई जा सकती है। बीस रुपए की एक शीशी के जरिए ही टनों पराली को अच्छी खाद में बदला जा सकता है। दरअसल पराली में सीएन रेशियो और सेल्यूलोज की मात्रा ज्यादा होती है। पराली में या दूसरे फसल अवशेष में इन तत्वों की मात्रा ज्यादा होने से वो जल्दी सड़ते (अपघटित) नहीं हैं। लेकिन वेस्ट डीकंपोजर के जैविक रसायन और जीवाणु से भी गला देते हैं।

फसल अवशेषों में सबसे ज्यादा कठोर गन्ने की पराली होती है। आईसीआर मोदीपुरम के शोध के मुताबिक गन्ने की पत्तियों में 40 फीसदी तक सेल्यूलोज होता है, लेकिन वो भी 42 दिन में खाद बन जाता है। देखिए अगर कोई किसान पहले से खेत में वेस्ट डीकंपोजर का इस्तेमाल कर रहा है तो 20 दिन में ही पराली खाद बन सकती है। अगर नहीं तो 40-42 दिन लगेंगे। इसकी एक प्रक्रिया है।

सवाल: वेस्ट डीकंपोजर कैसे इस्तेमाल करें कि खेत को फायदा पहुंचे?

जवाब: धान काटने के बाद खेत में 1,000 लीटर वेस्ट डीकंपोडर का छिड़काव करना चाहिए। सात दिन में आधी पराली गल जाएगी उसके बाद फिर 1,000 लीटर का छिड़काव कर हैरो से जुताई कर देना चाहिए। मिट्टी में मिली बाकी 90 फीसदी पराली भी 20-25 दिन में खाद बन जाएगी। फिर आप कुछ भी बोइए, उत्पादन बढ़ेगा और डीएपी-यूरिया की जरूरत कम पड़ेगी।

अगर आपने मशीन चलाकर उसे भूसा बना दिया और उस पर 1000 लीटर का छिड़काव कर उसे लगातार चलाते रहे तो पहले 5 दिन में आधा और 10-15 दिन में पूरा फसल अवशेष खाद बन जाएगा। इससे सबसे ज्यादा फायदा इसलिए है क्योंकि ये फसल कोल्ड प्रोसेज है। बाकी हॉट प्रासेज होते हैं। जिनके अपने नुकसान होते हैं।

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सवाल: कोल्ड प्रोसेज से कचरा अपघटन के क्या फायदे हैं?

जवाब: अगर किसी और तरीके से फसल अवशेषों को सड़ाया जाता है तो उससे कार्बन डाईआक्साइड (Co2) और मिथेन गैस निकलती है क्योंकि गर्म तरीकों में अगर तापमान 70 डिग्री तक नहीं गया तो फसल के पैथाजिन्स नहीं मरते हैं, जिससे वो सड़ते भी नहीं हैं। जबकि वेस्ट डीकंपोजर कोल्ड तरीका है। इसमें एंजाइम और जीवाणु हैं जो तापमान बढ़ने नहीं देते, बल्कि इसका बड़ा फायदा ये है कि इससे बनने वाली खाद में कार्बन तत्व (जीवाश्म) 10 फीसदी तक ज्यादा होते हैं। पंजाब से लेकर यूपी तक हजारों किसान इसका फायदा उठा रहे हैं।

सवाल: वेस्ट डीकंपोजर के और क्या उपयोग हैं? इसमें कितना खर्च आता है?

जवाब: वेस्ट डीकंपोजर की 20 ग्राम की शीशी का मूल्य 20 रुपए है। इसे दही का जामन समझिए एक बार ले लिया तो वर्षों तक चलाते रहे। खर्चा सिर्फ गुड़ का है। 200 लीटर पानी में एक शीशी (सिर्फ पहली बार में) डालिए और 2 किलो गुड़ डालना होता है। एक एकड़ खेत में 1000 लीटर हर महीने डालने से छह महीने में 5 लाख केचुएं आ जाएंगे। जमीन उपजाऊ होती है। उसमें सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ता है। अगर आप 6 महीने बाद मिट्टी की रासायनिक जांच कराएंगे तो फास्फोरस से लेकर पोटाश और कार्बन तत्व सब ज्यादा मिलेंगे।

सवाल: किसान वेस्ट डीकंपोजर से माइक्रोन्यूटेंट कैसे बनाएं?

जवाब: हम लोग किसानों से कहते हैं कि वेस्ट डीकंपोजर को टॉनिक बनाकर भी इस्तेमाल करना चाहिए। माइक्रोन्यूटेंट बनाने के लिए वेस्ट डीकंपोजर में तिलहन और दालों को कूट-पीस कर मिलाया जाए और उसमें तांबे को कोई टूटा बर्तन, लोहे का कोई टुकड़ा और गेरु डालकर कुछ दिनों के लिए रखा जाए। उनसे निकलने वाले ऑर्गेनिक एसिड और एंजाइम से पानी में लोहे और तांबे के पोषक तत्व आ जाएंगे, इसका छिड़काव करने से फसल का उत्पादन डेढ़ गुना तक बढ़ जाएगा।

वेस्ट डीकंपोजर बनाने का तरीका

एक ड्रम में 200 लीटर पानी लेना होगा। जिसमें दो किलो गुड़ डालेंगे। उसके बाद एक शीशी वेस्ट डीकंपोजर मिला देंगे। उसके बाद इसे ड्रम को ढककर रख देंगे। ड्रम में भरे पानी को 3-5 दिन तक दिन में कई बार घड़ी की दिशा में चला देंगे। 3 से 5 दिन में वेस्ट डीकंपोजर बनकर तैयार हो जाएगा। जैविक कृषि केंद्र के मुताबिक 3 से 5 दिन वाले वेस्ट डीकंपोजर को फसल के ऊपर से छिड़काव करते हैं जबकि 5 दिन के बाद वाले को पानी के साथ सिंचाई कर देना चाहिए।

राष्ट्रीय जैविक कृषि केंद्र की वेबसाइट https://ncof.dacnet.nic.in/ यहां से एड्रेस और नंबर लीजिए

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