"सूप हमारा रोजगार है, इससे हमें बहुत मोहब्बत है": मेरी ज़िन्दगी का एक दिन: सूप बनाने वाले की कहानी

सूप शगुन, लग्न व पूजा पाठ के समय तो काम आता ही है, साथ ही अनाज पछोरने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। कहा जाता है कि जिस घर में सूप न हो वह घर गृहस्थी अधूरी मानी जाती है।

लखनऊ। गाँव में आज भी जब अनाज तैयार होता है तो उसे साफ़ करने के लिए कोई बहुत बड़ी मशीन का प्रयोग नहीं किया जाता है, बल्कि एक लकड़ी के बने सूप का प्रयोग करके अनाज को आसानी से साफ़ कर लिया जाता है।आप ने भी अपनी दादी, नानी को उस सूप का प्रयोग करते हुए देखा होगा। सूप का काम धीरे-धीरे कम होता जा रहा है, लेकिन उसके प्रयोग पर अभी कोई ज्यादा असर नहीं पड़ा है। सूप बनाने वालों से गाँव कनेक्शन टीम ने बात की तो उनसे ये पता चला कि सूप बनाने के काम पर कोई ज्यादा असर नहीं हुआ है क्योंकि सूप का प्रयोग अनाज में सफाई के आलावा कई धार्मिक कार्यों में भी कियाजाता है।

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लखनऊ जिले में बख्शी का तालाब क्षेत्र के बगहा गाँव में रहने वाले पटेश्वरी, जोकि पिछले 40 वर्षों से सूप बनानेका काम कर रहे हैं, बताते हैं,"हम सूप बनाने के लिए सारा सामान पास की एक बाजार सिधौली से लेकर आते हैं। सूप बनाने के लिए सबसे पहले ढांचा बांधा जाता है। उसके बाद खेन बांधा जाता है, फिर कठियाते, जुभियाते, पुतियाते और मुड़ीयाते हैं। इतनी प्रक्रिया करने के बाद सूप पछोरने वाला हो जाता है। एक सूप बनाने में एक घंटा लग जाता है हम एक दिन में 10 सूप बनाते हैं।"

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"सूप बनकर तैयार होने के बाद उससे गेहूं, चावल, दाल सब पछोरा (साफ़) किया जाता है। पहले सूप चमड़े का बनता था अब अलग तरीके का बनने लगा है। पहले की तुलना में आमदनी में भी अच्छी बढ़ोतरी हुई है। सूप का प्रयोग भी बहुत हो रहा है। एक सूप 80-100 रुपये तक बिक जाता है।"पटेश्वरी बताते हैं। वह आगे कहते हैं,"हम सूप बेचने के लिए इटौंजा और बख्शी का तालाब जाते हैं। सूप हमारा रोजगार है, इससे हमें बहुत मोहब्बत है। सूप हमारा पूरा परिवार बनाता है। सूप अगर नहीं बनायेंगे तो कोई काम तो नहीं बंद होगा लेकिन मेहनत ज्यादा लगेगी।" सूप शगुन, लग्न व पूजा पाठ के समय तो काम आता ही है, साथ ही अनाज पछोरने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। कहा जाता है कि जिस घर में सूप न हो वह घर गृहस्थी अधूरी मानी जाती है। देवोत्थानी एकादशी के दिन सूप बजाकर महिलाएं घर की दरिद्रता को भी भगाने का काम करती है।

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