बीआरडी के पूर्व डिपार्टमेंट हेड ने कहा, मुझे नहीं लगता ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुईं, दाल में कुछ काला है

बीआरडी के पूर्व डिपार्टमेंट हेड ने कहा, मुझे नहीं लगता ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुईं, दाल में कुछ काला हैडॉ. वाईडी सिंह।

आशुतोष ओझा/दीपांशु मिश्रा

गोरखपुर। “कहीं ऐसा प्रतीत नहीं होता कि आॅक्सीजन की कमी से मौतें हुईं। क्योंकि ज्यादातर बच्चों में आक्सीजन की कमी से मौत के लक्षण नहीं दिखे। इसकी जांच अधिकारियों से नहीं टेक्निकल लोगों से होनी चाहिए, क्योंकि दाल में कुछ काला जरुर है।” बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. वाईडी सिंह सवाल उठाते हैं।

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गोरखपुर में रहने वाले डॉ. वाईडी 16 साल तक अध्यक्ष रहे हैं, जिसके अंतर्गत आने वाले इंसेफ्लाइटिस वार्ड में इऩ बच्चों की मौत हुई है और डॉक्टर कफील जिस वार्ड के प्रभारी थे। गांव कनेक्शन के रिपोर्टर आशुतोष ओझा से फेसबुक लाइव पर डॉ. सिंह ने कई सवाल उठाए। वो कहते हैं, “देखिए इंसेफ्लाइटिस वार्ड के प्रभारी डॉ. कफील खान पर का काम संदेह के घेरे में है। जब उस दिन अस्पताल में 52 सिलेंडर थे तो 3 सिलेंडर लेने के लिए वो अपने अस्पताल क्यों गए। फिर तीन बजे पत्रकार कैसे वहां पहुंचे ? अगर आक्सीजन की कमी थी तो उन्हें किसी और को भेजना चाहिए था, उन्हें वहां रहकर जूनियर डॉक्टरों को गाइड करना चाहिए था।”

डॉ वाईडी सिंह की बातें इस लिए भी वजनदार हैं क्योंकि वो बीआरडी की नस-नस से वाकिफ हैं। 1975 में बीआरडी मेडिकल कॉलेज में लेक्चरर पद से जॉब की शुरुआत की और बाद में यहीं पर बाल रोग अध्यक्ष बने। 2004 में स्वेक्षा से इस्तीफा देकर अपना क्लीनिक चलाते हैं।

बीआरडी अस्पताल के अंदर का एक दृश्य।

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पूर्व प्रिंसिपल और डॉ. कफील को अपना शिष्य बताते हुए वाईडी सिंह आगे कहते हैं, “हादसे के बाद मैं अस्पताल गया था, डिपार्टमेंट हेड, प्रिंसिपल, कर्मचारी, डॉक्टर सबसे बात की और पूछा कि बच्चे में सिमटम (लक्षण क्या थे)। क्योंकि मृत बच्चों के शव जा चुके थे, लेकिन आॅक्सीजन की कमी पर मौत होने पर कई लक्षण दिखते हैं, जैसे होंठ और जीभ का नीला पड़ जाना। लेकिन ज्यादातर बच्चों में ऐसा नहीं था। य़ानी सभी मौत की वजह आक्सीजन की कमी नहीं।”

10-11 अगस्त की रात हुए कोहराम को लेकर विस्तार से बात कहते हुए डॉक्टर सिंह कहते हैं, “एक बारगी देखने में ऐसा लगता है जैसे किसी ने फैसला लेने में या तो जल्दबाजी की या फिर कुछ उसके दिमाग में रहा होगा। हर मरीज के लिए आक्सीजन इतनी जरुरी नहीं होती, निमोनिया और ब्लाकेज की बाज छोड़कर। और फिर जब आक्सीजन नहीं थी तो एम्बु बैग क्यों बांटा गया।”

वो कहते हैं, “ 2-3 दसक पहले एक-एक दिन में 200-250 मरीज आते थे उस वक्त संसाधन कम थे तब भी 10-20 फीसदी मौतें होती थी और अब जब इतने संसाधऩ हैं फिर भी वही रेसियो है। कहीं ऐसा तो नहीं 10-11 तरीख को इतनी ज्यादा मौतों के पीछे कोई आंकडों का गेम हो ?”

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डॉ. कफील के साथ वो पूर्व प्रिंसिपल राजीव मिश्रा पर भी सवाल उठाते हैं। “मैं एक जागरूक नागरिक हूं और मैंने राजीव को कई बार बताने की कोशिश की जो बातें समाज तक पहुंच रही हैं वो ठीक नहीं, आपकी पत्नी का इतना दखल आपकी कुर्सी की बदनामी करवा रहा है। हां ये मेरी चूक थी कि मैने शासन में किसी से लिखित में ऐसी कोई शिकायत नहीं थी।”

डॉ. वाईडी सिंह कहते हैं मैंने कल डॉ.कफील को भी समझाने के लिए कई बार कॉल किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। अस्पताल में चल रह कार्यों की सही तरीके से जांच होनी ही चाहिए। अगर मैं चांच करुंगा तो प्रशासन की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठेंगे, डीएम महोदय के पास भी 2 करोड़ का इमरजेंसी कोष होता है, भुगतान उससे क्यों नहीं कराया गया।”

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