मौत से लड़कर इस लड़की ने लिखी एक नई इबारत

मौत से लड़कर इस लड़की ने लिखी एक नई इबारतगाँव की किशेरियों से चर्चा करती गीता।

लखनऊ। ‘’कोई भी लड़की नहीं चाहेगी कि उसके चेहरे पर एक भी दाग हो, एक समय था जब एक सड़क दुर्घटना ने मेरी जिंदगी तहस-नहस कर दी, मैं पूरी तरह से टूट चुकी थी, सोचती थी आत्महत्या कर लूं ।’’

ये है 20 वर्षीय गीता की दास्ताँ, इस उम्र में लड़कियां जहां सजती संवरती हैं, अपना करियर चुनती हैं, अपने भविष्य के लिए हजारों सपने संजोती हैं।

29 अक्टूबर 2015 की एक शाम को जब गीता अपने दफ्तर से साइकिल पर सवार अपने घर जा रही थी, तो एक सड़क दुर्घटना में 20 वर्षीय गीता के सभी अरमान चकनाचूर हो गये । एक ट्रक ड्राइवर की लापरवाही ने गीता को एेसे रौंदा जिससे उसके सिर का ऊपरी हिस्सा गायब हो गया और वो बेहोश हो गई, जैसे ही गीता के घरवालों को खबर हुई तो नज़दीकी अस्पताल ले जाया गया। लेकिन हुआ वही जिसका सबको डर होता है।

डॉक्टरों ने मना कर दिया कि हम नहीं बचा सकते आप ले जाइये । इस हालत में गीता को जल्दी से जल्दी हॉस्पिटल में भर्ती करने के लिए गीता के बूढ़े पिता और छोटे-छोटे भाई जद्दोजहत करते रहे पर किसी ने भर्ती नहीं किया। ग्रामीण इलाके में साधन मिलना और समय पर अस्पताल पहुंचना कितना मुश्किल होता है भला ये बात इस परिवार से बेहतर कौन जान सकता है ।

आखिरकार बनारस के एक हॉस्पिटल में भर्ती कराया, और 1 महीने के लम्बे ट्रीटमेंट के बाद वो ठीक तो हो गई पर चेहरे पे लगे वो दाग उसके लिए कई सवाल छोड़ गए।

इस हादसे के बाद पूरी तरह से टूट चुकी थी वो, आत्महत्या करना चाहती थी, क्योंकि हर नजर उसकी तरफ बहुत गंदे से घूर कर देखती थी । पर कहते हैं ना साहस ही जीवन की धुरी होती है और यही हुआ उसने साहस दिखाया और लिख दी एक नई इबादत ।

गीता की इस मुश्किल घड़ी में वरुण संस्था के साथियों ने उसे बहुत सपोर्ट किया, बनारस की वरुण संस्था वहां के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य, किशोरी स्वास्थ्य,और बच्चों के स्वास्थ्य पर पिछले 5 वर्षों से काम कर रही है। गीता स्नातक की पढाई करने के बाद इस एनजीओ में काम करने लगी थी, सड़क हादसे के बाद उसकी संस्था के साथियों ने उसे हौसला दिया और बेहतर काम करने का और उन लड़कियों की आवाज़ बनने का, जो कम पढ़ी-लिखी थी, जो अपने बारे में कुछ सोच नहीं पाती थी, उनकी मंजिल कहां हैं और उन्हें जाना कहां हैं, कुछ पता ही नहीं था ।

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गीता इन लड़कियों के बीच जाती हैं, उन्हें समूह में एकत्र करती, और उनसे खूब सारी बातें साझा करती हैं ,कुछ महीने के बाद ही 200 से ज्यादा लड़कियां गीता की बहुत अच्छी दोस्त बन गयी , इस दोस्ती के बाद उनके बीच किशोरियों के स्वास्थ्य को लेकर खूब चर्चा होने लगी। जहां शुरुआती दौर में ये लड़कियां बोलने से कतराती थी पर अब ये माहवारी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर खुल कर चर्चा करती हैं ।

गीता बताती हैं कि इनका बोल पाना आसान नहीं था, पर उसने छोटे -़2 समूह में लगातार माहवारी जैसे विषय पर चर्चा जारी रखी , जिसका नतीजा ये हुआ यहां की लड़कियां अब खुद बताती हैं की इन दिनों साफ़ धुले सूती कपड़े का इस्तेमाल करना चाहिए, हर 5 घंटे में कपड़े बदलना, और इस कपड़े का गढ्ढे में निस्तारण करना उन्हें अच्छे से पता है ।

गीता आज उस ग्रामीण अंचल की किशोरियों की सबसे अच्छी दोस्त बन गयी हैं,और कई उनकी हम उम्र लड़कियों की प्रेरणा स्त्रोत भी, जो मुश्किल घड़ी में जिदगी से हार जाती हैं ।

गीता की जिन्दगी का ये सफ़र इतना आसान नहीं था,उसकी जिन्दगी की अपनी एक दर्द भरी कहानी थी पर उसने कभी अपने काम पर दर्द भरी दास्ताँ को हावी नहीं होने दिया,और उन तमाम लड़कियों के लिए एक मिसाल कायम की, तो अभी मिलते है गीता कि उस जिन्दगी से जिसने उसे काम करने की प्रेरणा दी।

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