'मेरे अंदर मेरा छोटा सा गांव रहता है'… टटोल कर देखिए, आपके अंदर भी आपका गांव है

सुनिए नीलेश मिसरा की कविता मेरे अंदर मेरा छोटा सा गाँव रहता है, सुनकर आप भी महसूस करिए अपने गाँव को

नीलेश मिसरा आज आपको सुना रहे हैं, एक कविता, जिससे सुनकर आपको भी याद आएगा आपका गाँव, वहां की गलियां, बाग और पगडंडियां, क्योंकि आपका भी तो है गांव कनेक्शन...

बात बे बात पे अपनी ही बात कहता है मेरे अंदर मेरा छोटा सा गाँव रहता है

ऐसा लगता है न कि गाँव कहीं भुला आए गाँव कहीं रख के छोड़ आए

गाँव की बोली भूल आए गाँव की रस्में तोड़ आए

गलत लगता है आपको टटोल के देखिए न

अपने अंदर ढूंढिए अपने अंदर गाँव के पगडंडर पे आई मोच है आम के पेड़ से गिरने वाले दिन की खरोंच है।

दांत में फंस गया गन्ने का रेशा है मट्ठा खत्म होने के पहले अम्मा के आने का अंदेशा है

गरम गुड़ से जल गई जबान है मोड़ पर दस पैसे के कंपट की दुकान है

बाग में खेले क्रिकेट का पसीना है एक कहानी है सर के नीचे दद्दू का सीना है

खेत की रखवाली करते ऊंघने के लिए खाट है

जी हां ये मेरी और आपकी कहानी है क्योंकि अखबार ये कहते हैं कि हर तीन में से दो हिंदुस्तानी गाँव में रहते हैं।

मैं वो तीसरा ही रह गया

शहर को भीड़ जाती थी उसी में बह गया

अपने गाँव से और गांव के हिंदुस्तान से आइए फिर से रिश्ता जोड़ते हैं

बात बे बात पे अपनी ही बात कहता है मेरे अंदर मेरा छोटा सा गाँव रहता है...

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