अवतार सिंह 'पाश' की कविता 'अब विदा लेता हूँ': नीलेश मिसरा की आवाज़ में

पंजाबी भाषा का वो कवि जिसे हिंदी का भी खूब प्यार मिला। एक कवि जिसे उसके शब्दों के चलते जान गंवानी पड़ी। पंजाब के जलंधर में 9 सितंबर 1950 को जन्मे अवतार सिंह संधु मात्र 38 साल की उम्र में ये दुनिया छोड़ गए। पाश 23 मार्च 1988 में खालिस्तान आतंकियों ने उनकी हत्या कर दी। लेकिन उनके विद्रोही शब्द नहीं मरे.. वो अमर हैं पाश की तरह।

उनकी की कविताएं विचार और भाव के सुंदर संयोजन से बनी गहरी राजनीतिक कविताएं हैं जिनमें लोक संस्कृति और परंपरा का गहरा बोध मिलता है। आम जनता की परेशानियों को पाश बाहरी व्यक्ति की तरह नहीं लिखते थे बल्कि उनकी कविताओं में गुस्सा, दुख और निराशा ऐसे नज़र आती है जैसे वो उनके अंदर की बात हो।



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मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

गद्दारी, लोभ की मुट्ठी

सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है

सहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो है

पर सबसे ख़तरनाक नहीं होती

सबसे ख़तरनाक होता है

मुर्दा शांति से भर जाना

ना होना तड़प का

सब कुछ सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर

और काम से लौट कर

घर आना सबसे ख़तरनाक होता है

सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना

सबसे खतरनाक वो आँखें होती है

जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है..

जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है जो चीज़ों से उठती अन्धेपन कि भाप पर ढुलक जाती है

जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई

एक लक्ष्यहीन दुहराव के उलटफेर में खो जाती है

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है

जिसमे आत्मा का सूरज डूब जाए

और उसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा

आपके ज़िस्म के पूरब में चुभ जाए


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