देखिए गेहूं बुवाई से पहले कैसे करें बीजोपचार, होगी ज्यादा पैदावार, कम लगेंगे रोग

Divendra SinghDivendra Singh   31 Oct 2018 5:19 AM GMT

इस समय गेहूं की बुवाई का सही समय है, जानकारी के आभाव में किसान गेहूं की बुवाई बीजोपचार किए बिना ही कर देते हैं, जिससे उसमें कई तरह के मृदा जनित रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है, ऐसे में किसान ट्राईकोडर्मा से बीजोपचार करके नुकसान से बच सकते हैं।


कृषि विज्ञान केन्द्र बदायूं में किसानों को ट्राइकोडर्मा दिया जाता है, जिससे किसान नुकसान से बच सकते हैं। कृषि विज्ञान केन्द्र के फसल सुरक्षा अधिकारी डॉ. संजय कुमार बताते हैं, "ट्राईकोडर्मा के जैव फफूंद होता है, जो बीमारी फैलाने वाले फफूंद हैं, उसमें माइसिलियम प्रवेश कर जाता है, जिससे हानिकारक फफूंद नष्ट हो जाते हैं। कई सारे बीज जनित व भूमि जनित रोग होते हैं उनके नियंत्रण के लिए ये काफी प्रभावी होता है।"

ये भी पढ़ें: इंजीनियरिंग के फार्मूलों को खेतों में इस्तेमाल कर रहा है महाराष्ट्र का ये युवा किसान


कई सारी फसलें उकठा रोग से प्रभावित हो जाती हैं, जिससे आजकल फसलों को काफी नुकसान हो रहा है, ट्राइकोडर्मा हाइजेनी का प्रयोग करने से उकठा का प्रकोप कम हो जाता है, उकठा अरहर, अमरूद जैसी कई फसलों में फैलती है


इसका प्रयोग दो किग्रा प्रति एकड़ की दर से करते हैं, इसे 15 से 20 किग्रा सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर, 15-20 दिनों के लिए रख दिया जाता है, उसे गीले टाट की बोरी से ढ़क दिया जाता है और पानी का छिड़काव भी करते हैं, क्योंकि ये फफूंद होती है, उसमें नमी जरूरी होती है, कुछ दिनों में पूरी गोबर की खाद फफूंद में बदल जाती है, जिससे इसे खेत में आसानी से मिला सकते हैं। क्योंकि फफूंद को ऐसे नहीं प्रयोग किया जा सकता है, क्योंकि गोबर की खाद फफूंद के लिए भोजन का काम करता है।

ये भी पढ़ें: हल्दी की इस नई किस्म से पूरे साल किसान कर सकते हैं हल्दी की खेती


साथ ही इसका प्रयोग हम बीजोपचार के लिए भी करते हैं, बीजोपचार के लिए पांच ग्राम ट्राइकोडर्मा को प्रति किलो बीज में मिलाकर बीजोपचार कर सकते हैं, जिससे भूमिगत रोगों का प्रकोप कम हो जाता है।

ट्राइकोडर्मा से बीजोपचार करने से नहीं होगा मृदा जनित व बीज जनित रोगों का खतरा

गेहूं में बीजोपचार करने से इसमें कंडुआ रोग का प्रकोप नहीं होता है, क्योंकि कंडुआ बीजजनित बीमारी होती है, बीज में इस बीमारी के स्पोर रहते हैं, पांच ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किग्रा गेहूं के बीज में मिलाकर बीजोपचार करने से कंडुआ रोग नहीं लगता है।

देखिए कैसे होता है ट्राइकोडर्मा से बीजोपचार

एक किग्रा बीज में पांच ग्राम ट्राइकोडर्मा को मिलाकर किसी चौड़े मुंह के बर्तन में डालकर उसमें मिला देते हैं, मिलाने के बाद इसे घुमाएंगे, जिससे इसमें अच्छी तरह से फफूंद मिल जाएगी, इसके बाद हम बुवाई कर सकते हैं। धान, गेहूं, दलहनी, औषधीय, गन्ना और सब्जियों की फसल में प्रयोग करने से उसमें लगने वाले फफूंद जनित तना गलन, उकठा आदि रोगों से निजात मिल जाती है। इसका प्रभाव फलदार वृक्षों पर भी लाभदायक है।

ये भी पढ़ें: फेसबुक और व्हाट्सऐप पर खेती-किसानी का ज्ञान सीख मुनाफे की फसल काट रहे किसान

ट्राईकोडर्मा के जैव फफूंद होता है, जो बीमारी फैलाने वाले फफूंद हैं, उसमें माइसिलियम प्रवेश कर जाता है, जिससे हानिकारक फफूंद नष्ट हो जाते हैं। कई सारे बीज जनित व भूमि जनित रोग होते हैं उनके नियंत्रण के लिए ये काफी प्रभावी होता है।
डॉ. संजय कुमार, फसल सुरक्षा अधिकारी, कृषि विज्ञान केन्द्र, बदायूं

ये भी पढ़ें: कम लागत में अधिक उत्पादन पाना है तो करें वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग

टाइकोडर्मा प्रयोग करते समय सावधानियां

मृदा में ट्राइकोडर्मा का उपयोग करने के चार-पांच दिन बाद तक रासायनिक फफूंदीनाशक का उपयोग न करें।
सूखी मिट्टी में ट्राइकोडर्मा का उपयोग न करें।
ट्राइकोडर्मा के विकास और अस्तित्व के लिए नमी बहुत आवश्यक है।
ट्राइकोडर्मा उपचारित बीज को सीधा धूप में न रखें।
ट्राइकोडर्मा द्वारा उपचारित गोबर की खाद (फार्म यार्ड मैन्योर) को लंबे समय तक न रखें।

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top