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द नीलेश मिसरा शो : देश के युवा मुसलमान अपनी कम्युनिटी के बारे में क्या सोचते हैं ?

वो कौम जिसकी हदीसों में फरमाया गया है कि “इल्म हासिल करने के लिए अगर चीन भी जाना पड़े तो जाओ। वो कौम इल्म के मामले में सबसे पीछे है। मुस्लिम समाज की ये हालत कैसे हुई? किसने की? क्या सिर्फ सरकारों ने? या मुसलमानों के अपने रहनुमा, अपने लीडर्स भी इसके लिए जिम्मेदार थे? द नीलेश मिसरा शो का ये एपिसोड इसी पर आधारित है...

अगर मेरा नाम ..नील मोहम्मद होता… तो इस दुनिया को देखने का मेरा नज़रिया शायद कुछ अलग होता, है न? क्या वो नज़रिया गलत होता? नहीं बिलकुल नहीं। हम जिस गली, जिस शहर, जिस धर्म, जिस देश में पैदा होते हैं वो हमें पैदा होते ही एक नज़रिया दे देता है। हाँ -- जैसा मैं अक्सर कहता हूँ-- हम आज की नाराज़गी भरी, एक तरफ़ा, वन साइडेड दुनिया में.. दूसरा बन कर नहीं देख पाते। वी कैन नॉट बिकम दि अदर। हम इंट्रोस्पेशन, आत्म निरीक्षण.. नहीं कर पाते। औरों की ख़ामियाँ निकालने में इतने मसरूफ रहते हैं, कि अपने बारे में ऑब्जेक्टिव हो कर तथस्ट होकर सोच ही नहीं पाते। तो मैंने एक मिनट के लिए नील मोहम्मद बन कर सोचा और मेरे मन में कुछ सवाल थे…

हिंदुस्तान में लगभग 14 फीसदी जनसंख्या--14%-- मुस्लिम नागरिकों की है। आज से कई साल पहले मुस्लिम समुदाय के इर्द-गिर्द एक मशहूर रिपोर्ट आई, सच्चर कमेटी रिपोर्ट।

उसके हिसाब से हिंदुस्तान में मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर थी… ये चौंकाने वाली बात थी-- दलित समुदाय को तो छुआ-छूत, अनटचबिलिटी जैसी भयंकर ज्यादतियों का सामना करना पड़ा, शिक्षा से अक्सर दूर रहना पड़ा-- मुस्लिम समाज की ये हालत कैसे हुई? किसने की? क्या सिर्फ सरकारों ने? या मुसलमानों के अपने रह नुमा, अपने लीडर्स भी इसके लिए ज़िम्मेदार थे?

मेरा नाम है नीलेश मिसरा और मैं चल पड़ा हूँ एक सफर पर, कुछ सवाल लेकर कुछ जवाबों की तलाश में। मैं जानना चाहता था कि आज का युवा मुसलमान अपनी कम्युनिटी के बारे में, अपने रहनुमाओं के बारे में, अपने मुद्दों के बारे में किस तरह से आत्मनिरीक्षण या इंट्रोस्पेशन करता है… मैं जानना चाहता हूँ कि क्या नया हो रहा मुस्लिम समुदाय में जो शायद अखबार की हेडलाइनों में और टीवी के शोर शराबे में नेताओं की तकरीरों में दिख नहीं पाता.....वीडियो में देखिए आैर सुनिए, आगे की कहानी