देश में 6 करोड़ महिला किसान हैं, लेकिन वो दिखती क्यों नहीं हैं

हिंदुस्तान की असली वर्किंग वुमन यानि कामकाजी महिलाएं ये भी हैं जो घर से रोज काम पर जाती हैं...अपने घर और काम के बीच एक मुश्किल संतुलन बिठाती महिलाएं। दिनभर मेहनत करतीं महिलाएं…

द नीलेश मिसरा शो के इस एपिसोड में बात कुछ उन कामकाजी महिलाओं की जो दिन रात घर और खेत के बीच जुटी रहती हैं, वो जो पुरुषों से ज्यादा काम करती हैं, लेकिन...

हमने सुना है कि ललितपुर की गुड्डी और ऐसी करोड़ों महिलाओं की जिंदगी में नौ घंटो के अलावा घर का काम, बच्चे संभालना, जानवरों की देखभाल, वो अलग है। आज मैं आपसे बात करने जा रहा हूं वर्किंग वूमेन, कामकाजी महिलाओं के बारे में। घर से रोज काम पर जाती महिलाएं, अपने घर और काम के बीच एक मुश्किल संतुलन बिठाती महिलाएं...दिनभर मेहनत करतीं महिलाएं।

ये ख्याल आने पर आने आपको शायद आफिस जाती कुछ महिलाएं, दुकानों, फैक्ट्रियों पर काम करती कुछ महिलाएं जहन में आएं लेकिन ये उस बड़ी आबादी का सिर्फ एक छोटा हिस्सा भर है। हिंदुस्तान की असली वर्किंग वुमन यानि कामकाजी महिलाएं ये भी हैं जो घर से रोज काम पर जाती हैं...अपने घर और काम के बीच एक मुश्किल संतुलन बिठाती महिलाएं। दिनभर मेहनत करतीं महिलाएं…

लेकिन खेतों में दिन रात हड्डियां गलाती ये महिला सरकारों को दिखाई नहीं देती...ना पॉलिसी मेकर्स को, ना अधिकारियों को, ना ही लोन देने वाले बैंकों को…क्योंकि महिलाएं किसान कैसे हो सकती हैं?

गुड्डी।

जो आप खाते हैं वो महिला किसान भी उगाती है...लेकिन कहीं गिनीं नहीं जाती हैं। द नीलेश मिसरा शो के इस एपिसोड में हम ऐसी ही महिलाओं की बात कर रहे हैं, जो इनविजिबल, अदृश्य वर्किंग वुमेन हैं, ये हैं तो करोड़ों में हैं लेकिन दुनिया को नहीं दिखती हैं और हमारे देश की विशाल अर्थव्यवसथा, हमारी खेती, का एक बड़ा बोझ अपने कंधों पर उठाए चुपचाप चल रही हैं।

मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का किसान, मैथली शरण गुप्त की कविताओं का किसान, ग्रीन रिवोल्यूशन...हरित क्रांति का किसान, सरकारी नीतियों का किसान, मीडिया का किसान...वो किसान ऐसा दिखता है, ऐसा नहीं ये इत्तेफाक़ नहीं है कि गूगल इमेज में जब किसान (Farmer) लिख कर सर्च करें, तो सिर्फ पुरुष किसानों की तस्वीरें नज़र आती हैं।

ये मान लिया जाता है कि वो किसान की पत्नी हो सकती है, किसान की मां हो सकती है, किसान की बेटी हो सकती है पर वो ख़ुद किसान ???

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महिला किसान के नाम पर योजनाएं नहीं बनती, किसी दस्तावेज़ में उनका नाम नहीं होता, आंकड़े दुनिया को नहीं बताते कि जीडीपी, सकल घरेलू उत्पाद में उनका कितना योगदान है, इकनॉमिक ग्रोथ में उनकी भूमिका नापने का कोई स्केल नहीं...क्योंकि वो हैं ही नहीं, क्योंकि वो एग्ज़िस्ट ही नहीं करतीं… वो अदृश्य हैं।

ऐसी ही एक महिला किसान हैं यूपी के बुंदेलखंड वाले हिस्से यानि ललितपुर में रहने वाली 40 साल की गुड्डी जो पिछले उन्नीस साल से किसान हैं। तीन एकड़ की खेती है, दो बच्चे हैं और वो खुद अपना परिवार चलाती हैं।

2011 की जनगणना के मुताबिक देश में छह करोड़ से ज्यादा औरतें खेती के काम से जुड़ी हैं, पर ज़मीन पर हक कितनी औरतों का है?

गुड्डी बताती हैं, "लोग जैसे खेती करते हैं तो देखते थे कि कैसे पानी खेत में लगाते हैं कैसे काम करते हैं उसी से देख-देख कर सब सीख लिया। 19 सालों से हम अकेले ही खेती करते आ रहे हैं और ट्रैक्टर चलाते रहे अब हम 40 साल के हो गए। अब हमारा एक लड़का बड़ा हो गया है और अब वो ट्रैक्टर चलाने लगा है।"

गुड्डी आगे बताती हैं, "खेती से नुकसान भी हो जाता है जैसे कि इस बार हुआ है लेकिन मैंने ये मान लिया है कि हमें खेती किसानी ही करनी है फिर चाहे मुनाफा हो या घाटा। जो भी खेतों में पैदा करते हैं उसे मंडी भी हम ले जाते हैं। मंडी में कई तरह की दिक्कतें होती हैं अब जब अनाज अच्छा होता है तभी मंडी ले जाते हैं वरना घर में ही रखते हैं।"

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2011 की जनगणना के मुताबिक देश में छह करोड़ से ज्यादा औरतें खेती के काम से जुड़ी हैं, पर ज़मीन पर हक कितनी औरतों का है? संयुक्त राष्ट्र कि संस्था यूनएडीपी की एक रिपोर्ट कहती है कि खेती के काम में महिलाओं की हिस्सेदारी 43 प्रतिशत है, लेकिन खेती की ज़मीन सिर्फ 13 प्रतिशत महिलाओं के नाम पर ही है...खेती करने वाली ये बाकी 87 प्रतिशत महिलाएं मज़दूर कहलाती हैं, किसान नहीं।

एक रिसर्च के अनुसार बिहार, नागालैंड, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में खेती में महिलाओं की सबसे अधिक भागेदारी है...केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल में महिलाएं खेती में कम हिस्सा लेती हैं।

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में , जहां के छोटे से गांव रामनाथ पुर में रहती हैं लल्ला देवी। खेती करती हैं, अनाज उगाती हैं, पर किसान नहीं हैं...कम से कम कुछ साल पहले तक नहीं थीं। खेत ससुर के नाम थे...उनकी मौत के बाद पट्टे पर पति का नाम चढ़ गया...पति और बेटे नौकरी की तलाश में मुंबई में भटक रहे थे, और लल्ला देवी उन बंजर हो चुके खेतों पर हल चला रही थीं।

अपने किसान बनने कहानी बताते हुए लल्ला देवी कहती हैं, "महिला को शुरू से दबा के रखा गया है लेकिन अगर पहले से महिलाओं को दबाया नहीं गया होता तो महिलायें पुरुष से बिलकुल कम नहीं होती। जबसे मेरी थोड़ी तबियत खराब हुई है तबसे ट्रैक्टर से काम करवा लेते हैं वरना मैं अपने से ही सब काम कर लेती थी। हम दूसरों के खेत में भी काम करने जाते हैं। गेहूं, धान, आलू, धनिया, लहसुन, मटर, चना और सरसों ये सब अपने खेत में उगाते हैं।'

लल्ला देवी

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लल्ला देवी किसान थीं, किसान ही कहलाना चाहती थीं…खेती से मिली मजदूरी से उन्होंने अपने खेत खरीदे, फिर महिलाओं को एकजुट किया और उन्हें मज़दूर से किसान बनाने के मिशन में जुट गई-

लल्ला देवी महिलाओं के कंधों पर पड़ने वाले काम के बोझ को कुछ इस तरह बताती हैं, "जितनी जिम्मेदारी महिला के ऊपर रहती है उतनी पुरुष के ऊपर नहीं होती है। जैसे पुरुष को किसान पुरुष बनाया जाता है वैसे महिला का भी हो। जब कोई सामान लेने पुरुष जाता है तो पैसे कहीं और खर्च कर देता है लेकिन ऐसा महिला नहीं करती है। जिस महिला के पास खेती नहीं होती है वो खेती करने चाहती है तो वो दूसरों के खेत में खेती कर लेती है। जब खेती में कोई समस्या आती है तो हम किसी से कोई मदद नहीं मांगते हैं क्योंकि जब हम किसान में हैं ही नहीं तो मदद कहां से मिलेगी।"

महिला किसानों की लिस्ट बहुत लंबी है, लगभग हर जिले ब्लॉक और गांव में ऐसी महिलाएं मिल जाएंगी, बस उनके काम को सम्मान देने वाली नजर चाहिए।

रामरती देवी जिन्हें हजारों लोग किसान चाची कहते हैं, गोरखपुर से चालीस किलोमीटर दूर सरपतहा गांव में रहती हैं। रोज़ सुबह 4 बजे उठती हैं। जानवरों को चारा-पानी देती हैं, घर के काम निपटाती हैं, फिर काम पर निकल जाती हैं...काम, यानी खेती। ज़रा सी ज़मीन पर एक साथ 35 फसलें बोकर नाम कमा चुकी हैं, अवॉर्ड्स जीत चुकी हैं।

ज़्यादातर सरकारी सब्सिडीज़ के लिए, लोन के लिए, गवर्नमेंट स्कीम्स का फायदा लेने के लिए अपनी ज़मीन होना ज़रूरी है, बस यही ज़मीन औरतों के नाम नहीं होती।

रामरती का गणित सहफसली और मिश्रित खेती पर निर्भर है। कम जमीन है लेकिन वो मुनाफे की खेती करती हैं। रामरती देवी बताती हैं, " कई प्रकार की सब्जी की खेती करती हूं। खाने के बाद जो सब्जियां बच जाती हैं उसे मैं मंडी में ले जाती हूं। घर के सभी सदस्य मेरी मदद करते हैं। केंचुआ की खाद ज्यादा प्रयोग करती हूं। देशी खाद सबसे अच्छी होती है। मेरे अलावा कई लोग और भी इस तरह की खेती करते हैं। बच्चे भी अब खेती करने लगे हैं। खेती से कई फायदे हुए मुझे। खेती से मैंने बहुत पैसे भी कमाए। लोगों में मेरी पहचान भी खेती से ही हुई।" वो आगे बताती हैं, फसल के हिसाब से मुनाफा होती है। तुरंत कोई लाभ नहीं मिलता है। मेरी बहू भी मेरी खेती में मदद करती है।

महिला किसान रामरती

देखिए बात सीधी सी है। ज़्यादातर सरकारी सब्सिडीज़ के लिए, लोन के लिए, गवर्नमेंट स्कीम्स का फायदा लेने के लिए अपनी ज़मीन होना ज़रूरी है, बस यही ज़मीन औरतों के नाम नहीं होती। 2005 में सरकार ने पैरेंटल प्रॉपर्टी (पैतृक संपत्ति) में बेटी को अधिकार देने का कानून बना ज़रूर दिया, पर परंपरा अब भी यही है कि बाप की विरासत पर बेटे का हक़ होता है। खेती की पुश्तैनी ज़मीन, जो बाप-दादा के नाम थी, उनके बाद बेटे नाम हो जाती है, फिर पोते के...पत्नियां, बेटियां और बहुएं उन खेतों में काम करने वाली मज़दूर भर बन कर रह जाती हैं, जिनको मालिकाना हक़ तो दूर उनकी मज़दूरी भी नहीं मिलती।

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पिछली, यानी 2011 की जनगणना के आंकड़े कहते हैं कि देश में 32.8 प्रतिशत महिलाएं और 81.1 फीसदी पुरुष खेती से जुड़े हैं...पर ये आंकड़े ये नहीं बताते कि इन 81.1 फीसद पुरुष किसानों के घर की औरतें, वो औरतें जो किसान नहीं कहलातीं...वो खेत तैयार करने से लेकर, बुआई से लेकर, निराई, फिर फसल काटने से लेकर उसे संभालने तक में पूरा हाथ बंटाती हैं...पर इनके ये काम कहीं गिने ही नहीं जाते।

रामरती देवी कहती हैं, "खेती से मुनाफा कमाने के लिए खुद खेती करनी होगी। मजूदरों को लगाने से कोई फायदा नहीं होगा। कभी दो घंटे तो कभी कभी पूरे दिन खेत में बिताना पड़ता है।"

इनके कामकाजी घंटे (वर्किंग ऑवर्स) लंबे हैं, इनका मूल्यांकन (अप्रेजल) नहीं होता, इन्हें प्रोन्नति (प्रमोशन) नहीं मिलता, इन्हें 6 महीने की (मातृत्व लीव) मैटरनिटी लीव नहीं नसीब है...ये कामकाजी महिलाएं हिंदुस्तान की खेती की रीढ़ की हड्डी हैं। उम्मीद है कि इनकी भी कहीं गिनती होगी, इन्हें भी सम्मान मिलेगा, इनके नाम भी जमीन होगी...उम्मीद है आप और हम समझेंगे इन कामकाजी महिलाओं को.. इन महिला किसानों का देश को योगदान।

और उम्मीद है कि अगली बार जब आप फेसबुक पर 'मां के हाथ का खाना' याद करके कोई प्यारी सी पोस्ट डाल रहे होंगे, तो उस गुमनाम महिला महिला किसान को याद कर लेंगे, जो किसी कि मां है, और जिसने आपकी मां के हाथों तक वो खाना पहुंचाया है।

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