थियेटर को पेशा न बनाएं, नाटक में पेशेवर बनें: डॉ. अनिल रस्तोगी

थियेटर को पेशा न बनाएं, नाटक में पेशेवर बनें: डॉ. अनिल रस्तोगीसात अप्रैल को रिलीज होगी फिल्म मुक्ति भवन।

लखनऊ। पिछले 50 साल से भी अधिक समय से थियेटर में सक्रिय डॉ. अनिल रस्तोगी टेलीविजन और फिल्मों का भी जाना-माना नाम है। यहूदी की लड़की, सखाराम बाइंडर, रुस्तम सोहराब, फैंडो एंड लिस, ताजमहल का टेंडर और शाहजहां जैसे नाटकों के माध्यम से उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया।

इन दिनों वे अपनी आने वाली फिल्म मुक्ति भवन को लेकर चर्चा में हैं। हमसे बातचीत में डॉ. अनिल रस्तोगी बताते हैं कि मुक्ति भवन एक नॉन कमर्शियल फिल्म है हालांकि फुल लेंथ फीचर ‍फिल्म है। इसमें मेरी भूमिका केयर टेकर की है जो मुक्ति भवन में आने वाले लोगों को वहां की दिनचर्या और सामान की जानकारी देता है।

अपने किरदार के लिए रिसर्च पर वे बताते हैं कि अपने किरदार को अच्छे से निभाने के लिए मुझसे कहा गया कि मैं बनारस को मोक्ष भवन के मैनेजर से मिल लूं लेकिन मैंने उनसे बोला कि किसी की नकल क्यों करूं, मैं अडॉप्शन नहीं करूंगा और जो किरदार की मांग है और डायरेक्टर जैसा उम्मीद करते हैं उसे पूरी शिद्दत से निभाऊंगा।

फिल्म का हिट या फ्लॉप होना उसकी पब्लिसिटी पर निर्भर करता है

नॉन कमर्शियल फिल्म से उम्मीद के बारे में अनिल रस्तोगी का मानना है कि फिल्म का चलना न चलना फिल्म की पब्लिसिटी पर भी निर्भर करता है। मैंने यशराज बैनर की इशकज़ादे में भी काम किया था, फिल्म कमर्शियल थी और प्रमोशन भी अच्छा हुआ था इसलिए हिट हुई। वहीं मैंने डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म जेड प्लस में काम किया, कहानी अच्छी थी किरदार अच्छा था लेकिन उतना प्रमोशन नहीं हो पाया तो लोगों तक ठीक तरह से नहीं पहुंची। मुक्ति भवन के बारे में मैं यह कहूंगा कि फिल्म सोशल मीडिया पर चर्चा में आ चुकी है इसलिए अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद है।

विज्ञान से मुझे मिला अनुशासन और पावर ऑफ एक्सप्रेशन

सेंट्रल ड्रग्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के रिटायर्ड साइंटिस्ट डॉ. अनिल रस्तोगी एक साइंटिस्ट से कलाकार तक के अपने सफर को कुछ यूं बयां करते हैं, मेरे लिए दोनों ही चीजें खास हैं। एक दूसरे के पूरक हैं। जब मैंने थियेटर शुरू किया था तो वहां कोई अनुशासन नहीं था, मैंने साइंस से अनुशासन सीखा। समय पर आना और समय पर नाटक शुरू करना, चाहे दर्शक पूरे आएं न नहीं। विज्ञान ने मुझे पावर ऑफ एक्सप्रेशन दिया। साइंटिस्ट के तौर पर करियर शुरू हुआ तो हर रिसर्च के इंटरव्यू में मैंने रिसर्च पेपर की अच्छे से व्याख्या की। यही बात थियेटर में मेरे लिए फायदेमंद साबित हुई।

थियेटर की क्वालिटी घट रही है

हाल ही में विश्व रंगमंच दिवस मनाया गया। इस दौरान थियेटर की बदहाली पर कई लोगों ने अपनी-अपनी राय दी। इस पर डॉ. अनिल रस्तोगी कहते हैं कि थियेटर अब प्रोफेशनल नहीं रहा। पहले न्यू एलफ्रेक कंपनी, ग्रेट थियेटर कंपनी, आग़ा हसहर कश्मीरी के नाटक हों, या शेक्सपीयन कंपनी ये सब प्रोफेशनल नाटक करते थे लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं है। आज के समय में एक अमेचर क्रियेटर ग्रुप ही पेशेवर नाटक करता है। आज लोगों ने इसे अपनी रोजी-रोटी बना ली है। इससे थियेटर की क्वालिटी घट रही है। पहले 10 में से आठ नाटक नेशनल-इंटरनेशनल स्तर पर भाग नॉमिनेट होते थे तो आज 10 में से केवल दो-तीन नाटक ही ऐसे तैयार किए जाते हैं।

नाटक की समीक्षा नहीं लिखी जाती

वहीं थियेटर की बदहाली के लिए डॉ. अनिल रस्तोगी दर्शकों और मीडिया को भी दोष देते हैं। वह कहते हैं कि लोग पैसा देकर नाटक देखना कम पसंद करते हैं तो इसकी वजह है कि उसकी पब्लिसिटी इतनी अच्छी नहीं होती। बात लखनऊ की करें तो यहां की मीडिया नाटक की समीक्षा तक ठीक से नहीं लिखती।

हाल ही में नादिरा बब्बर एक नाटक के लिए लखनऊ आई थीं। नाटक के बाद सेमिनार में मैंने नादिरा से पूछा कि आप इतने दर्शक कैसे ढूंढ लाती हैं? तो उन्होंने जवाब दिया कि मुझे हिंदी नाटक की ऑडियंस नहीं मिलती जितनी गुजराती ऑडियंस मिलती है। दक्षिण और महाराष्ट्र में भी इसके दर्शक अधिक है। यहां पब्लिसिटी की कमी है।

यूपी सरकार से सांस्कृतिक कार्यक्रम को बढ़ावा देने की उम्मीद

अनिल रस्तोगी यूपी में बीजेपी सरकार से उम्मीद रखते हैं कि बीजेपी पिछली सरकार की तरह फिल्म विकास की नीतियों को बढ़ावा देगी। इसी के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी बढ़ावा देने की उम्मीद है।

वे कहते हैं कि यहां संस्कार भारती जो संस्था है उसे बीजेपी का सपोर्ट मिला है। पहले की सरकारों ने तो थियेटर या सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए कोई पॉलिसी नहीं बनाई। 10-12 साल पहले यहां रिटायर्ड रंगकर्मियों के लिए पेंशन और बाहर नाटक करने वालों के लिए ग्रान्ट की सुविधा थी लेकिन बाद की सरकारों ने वह भी बंद करा दिया।

शिद्दत और लगन के साथ थियेटर करिए

74 वर्षीय डॉ. अनिल कहते हैं कि मैं हमेशा एक्टिंग में समर्पित रहा हूं और मरते दम तक इसे कायम रखना चाहता हूं। वहीं नए कलाकारों को राय देते हुए उन्होंने कहा कि थियेटर बेसिक शिक्षा देता है पूरे डेडिकेशन और लगन के साथ करना चाहिए। इसको फिल्म और टेलीविजन के लिए सीढ़ी नहीं बनाइए। मैं आज फिल्मों मैं जो कुछ पा रहा हूं उसमें थियेटर का योगदान है। राज बिसारिया, चित्रा मोहन, पुनीत अस्थाना, ललित पोखरिया, सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ व उर्मिल कुमार थपलियाल आज के दौर में भी क्वालिटी थियेटर कर रहे हैं।

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